उत्तर प्रदेश में प्राचीन इतिहास के स्रोत आज भी उपलब्ध हैं। इन्हीं सभी ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर राज्य के इतिहास को प्रागैतिहासिक, आद्य-ऐतिहासिक एवं ऐतिहासिक काल में विभाजित किया गया।
प्रागैतिहासिक काल
प्रागैतिहासिक काल की घटनाओं का कोई लिखित विवरण नहीं मिलता है, अपितु इस काल से सम्बन्धित जानकारी पाषाण निर्मित वस्तुओं एवं उपकरणों से प्राप्त होती है। अतः इस काल को पाषाणकाल भी कहा जाता है। पाषाणकाल को निम्न तीन भागों में विभक्त किया जाता है
(i) पुरा पाषाणकाल
(ii) मध्य पाषाणकाल
(iii) नव पाषाणकाल
पुरा पाषाणकाल
राज्य में पुरा पाषाणकालीन सभ्यता के साक्ष्य बेलन घाटी (प्रयागराज या इलाहाबाद), सिंगरौली घाटी (सोनभद्र) एवं चकिया (चन्दौली) से प्राप्त हुए हैं।
बेलन घाटी के पुरास्थलों की खुदाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. जी. आर. शर्मा के निर्देशन में की गई। बेलन घाटी के लोहदा नाला क्षेत्र से पाषाण उपकरणों के साथ-साथ एक अस्थि निर्मित मातृ देवी की प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। इस काल के अधिकतर उपकरण क्वार्टजाइट पत्थरों से निर्मित हैं।
इस काल में लोगों को आग, कृषि कार्य तथा गृह कार्य आदि का ज्ञान नहीं था, परन्तु पशुपालन से परिचित होने के साक्ष्य मिलते हैं।
मध्य पाषाणकाल
मध्य पाषाणकाल के साक्ष्य राज्य में मिर्जापुर, सोनभद्र (मोरहना पहाड़, लेखहिया, बघरीखोर), (मेजा, बारा, फूलपुर, कोराँव, करछना) और प्रतापगढ़ (सरायनाहर, महदहा, दमदमा) से प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाणकाल के सर्वाधिक साक्ष्य सरायनाहर से प्राप्त हुए हैं।
मध्य पाषाणकाल में शव दफनाने के प्रमाण सरायनाहर से मिले हैं। यहाँ से 15 शवाधान प्राप्त हुए हैं, जिनमें मृतक का सिर पश्चिम की ओर है।
चोपनीमाण्डो प्रयागराज (इलाहाबाद) से झोंपड़ियों तथा मिट्टी के बर्तनों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
महदहा (प्रतापगढ़) स्थल से उपकरणों के साथ-साथ गर्त, चूल्हे, अस्थि एवं सींग के आभूषणों के साक्ष्य मिले हैं।
पुरा पाषाणकाल की अपेक्षा इस काल का मानव कृषि एवं पशुपालन करने, मृतक की अन्त्येष्टि करने तथा आग पर भोजन पकाने से परिचित था।
नव पाषाणकाल
राज्य में नव पाषाणकालीन सभ्यता के साक्ष्य प्रयागराज (कोल्डिहवा, महगड़ा तथा पंचोह), प्रतापगढ़, मिर्जापुर तथा सोनभद्र जिलों से प्राप्त हुए हैं।
कोल्डिहवा से धान की खेती के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इसकी अवधि लगभग 7000-6000 ई. पू. के बीच है। यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों पर धान के दाने तथा भूसी एवं पुआल के अवशेष चिपके हुए मिले हैं।
इस काल का मानव कृषि कर्म के साथ-साथ पशुपालन करने, मिट्टी के बर्तन बनाने तथा उस पर चित्रकारी और पॉलिश करने, आवास बनाने, जानवरों की खालों से बस्व बनाने आदि क्रियाओं से परिचित थे।
आद्य ऐतिहासिक काल
इस काल में धातुओं का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। मानव ने सर्वप्रथम ताँबे का, इसके पश्चात् काँसे का तथा अन्त में लोहे का प्रयोग किया। इस संस्कृति को ताम्र पाषाणिक संस्कृति भी कहा जाता है।
ताम्र पाषाणकालीन संस्कृति के साक्ष्य उत्तर प्रदेश के मेरठ तथा सहारनपुर जिलों से प्राप्त हुए हैं। ऊपरी गंगा घाटी व गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र तथा विभिन्न स्थलों से गेरूवणी मृद्भाण्ड व अनेक ताम्रनिधियों भी प्राप्त हुई हैं।
ताम्र पाषाणिक सभ्यता के बाद ताम्र-कांस्य सभ्यता का उदय हुआ। यह सभ्यता 2500 के पू. के आस-पास अपनी पूर्ण विकसित अवस्था में प्रकट हुई। सैन्धव सभ्यता ताम्र-कांस्य सभ्यता का ही प्रतिनिधित्व करती है।
सैन्धव (सिन्धु घाटी) सभ्यता
लगभग 2350-1750 ई. पू. के मध्य सैन्धव सभ्यता का अस्तित्व था। यह एक नगरीय सभ्यता थी।
इस नगरीय सभ्यता के साक्ष्य पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान, सिन्ध एवं पंजाब प्रान्तों तथा भारत के पंजाब, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मिलते हैं।
सैन्धव सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) के साक्ष्य राज्य के पश्चिमी भाग में आलमगीरपुर (मेरठ), बड़ागाँव (बागपत) एवं हुलास (सहारनपुर) आदि स्थलों से प्राप्त हुए हैं।
हिण्डन नदी के तट पर अवस्थित आलमगीरपुर की खोज सर्वप्रथम भारत सेवक समाज द्वारा की गई तथा इसका उत्खनन कार्य यज्ञदत्त शर्मा के निर्देशन में वर्ष 1958 में किया गया।
नई खोजों के अनुसार सैन्धव सभ्यता के साक्ष्य बुलन्दशहर के भटपुरा एवं मानपुरा तथा मुजफ्फरनगर के माण्डी गाँव एवं शामली के कैराना क्षेत्र से भी प्राप्त हुए हैं।
सैन्धव सभ्यता के बाद और वैदिक सभ्यता के पूर्व की सभ्यता को उत्तर सैन्धव सभ्यता कहा जाता है।
आलमगीरपुर के उत्तर सैन्धवकालीन लोग कपास की खेती करते थे। इस सभ्यता के लोग गाँव में निवास करते थे। ऐतिहासिक काल
लौहयुगीन संस्कृति
लौहयुगीन संस्कृति के साक्ष्य राज्य के अहिच्छत्र, हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा, मथुरा, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि स्थलों से प्राप्त हुए हैं।
हस्तिनापुर व अतरंजीखेड़ा की खुदाई से लौह धातु तथा भट्टियाँ प्राप्त हुई हैं, जो यह स्पष्ट करती हैं कि यहाँ के निवासी लोहे को गलाकर इससे विभिन्न प्रकार के उपकरणों का निर्माण करने में निपुण थे।
सैन्धव और उत्तर सैन्धव सभ्यता के पश्चात् भारत में जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ, उसे वैदिक अथवा आर्य सभ्यता के नाम से जाना जाता है।
वैदिक सभ्यता
वैदिक सभ्यता का कालखण्ड लगभग 1500-600 ई. पू. था और इसका फैलाव सिन्धु नदी क्षेत्र (पाकिस्तान) से बंगाल (भारत) तक रहा। इस सभ्यता को दो भागों में विभक्त किया गया है
ऋग्वैदिक काल (1500-1000 ई. पू.)
इस काल में आर्य सभ्यता केवल पंजाब तथा सिन्ध क्षेत्र तक ही सीमित थी, यहाँ पंचजनों का निवास था। पंचजनों में अनु, द्रुह्य, यदु, पुरु तथा तुर्वस सम्मिलित थे।
इस काल के इतिहास को जानने का मुख्य स्रोत केवल ऋग्वेद संहिता है।
उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई. पू.)
ऋग्वेद संस्कृति की पृष्ठभूमि पर ही उत्तर वैदिककालीन संस्कृति का विकास हुआ। इस समय तक वैदिक संस्कृति का विस्तार उत्तर प्रदेश सहित लगभग समस्त उत्तरी भारत से लेकर पूर्वी बंगाल तक हो चुका था।
उत्तर वैदिककालीन सभ्यता का मुख्य केन्द्र उत्तर प्रदेश का सरस्वती-गंगा दोआब क्षेत्र या, जो उस समय मध्य देश कहलाता था। इसके अन्तर्गत कुरु एवं पांचाल जैसे विशाल राज्य शामिल थे।
कुरु राज्य मेरठ, दिल्ली व थानेश्वर तक विस्तृत था तथा इसकी राजधानी आसन्दीवत् (हस्तिनापुर) थी। पांचाल राज्य का विस्तार बरेली, बदायूँ, फर्रुखाबाद आदि क्षेत्रों तक था तथा इसकी राजधानी काम्पिल्य थी।
• उत्तर वैदिककाल में पांचाल सबसे विकसित राज्य था।
कुरु, पांचाल क्षेत्रों में ही भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मीकि आदि महान् ऋषियों की तपस्थली रहीं।
• इस काल में विद्यमान चार प्रकार के मृद्भाण्डों (काला, लाल, लेपयुक्त चित्रित धूसर और लाल मृद्भाण्ड) में से लाल मृद्भाण्डों के अवशेष सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुए हैं।
महाकाव्य काल
उत्तर वैदिककाल के अन्तिम चरणों में उत्तर प्रदेश में दो अति विशिष्ट महाकाव्यों रामायण एवं महाभारत का प्रणयन हुआ, जो तत्कालीन इतिहास के मुख्य स्रोत हैं।
इस युग के विशाल राज्यों में कौशाम्बी, कोसल, काशी, विदेह, मगध, अंग आदि थे।
• रामायण की कथा कोसल (अयोध्या) राज्य के इक्ष्वाकु वंश से सम्बन्धित है। इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि थे।
• महाभारत की कथा हस्तिनापुर के कुरु वंश से सम्बन्धित है। महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास थे।
महाजनपद काल
• बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तरनिकाय के अनुसार, छठी शताब्दी ई. पू. में सम्पूर्ण उत्तरी भारत 16 बड़े राज्यों (महाजनपद) में विभाजित था।
• इन 16 महाजनपदों में से 8 महाजनपद वर्तमान उत्तर प्रदेश में अवस्थित थे।
• ये महाजनपद थे-कुरु, पांचाल, शूरसेन, वत्स, कोसल, मल्ल, काशी और चेदि।
• ये राज्य उत्तर वैदिककालीन राज्यों की अपेक्षा अधिक विस्तृत तथा शक्तिशाली थे।
नवीन धर्मों का उदय
छठी शताब्दी ई. पू. में उदित जैन एवं बौद्ध धर्म का तत्कालीन उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। जैन धर्म
• पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे, इनका जन्म वाराणसी में हुआ था।
• जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म वैशाली (बिहार) में हुआ था, परन्तु उत्तर प्रदेश राज्य में उनके अनुयायियों की संख्या अत्यधिक थी।
• राज्य में चन्द्रप्रभा तथा सम्भरनाथ आदि प्रसिद्ध तीर्थंकरों का जन्म भी हुआ था।
• उत्तरी भारत में जैन धर्म के दो प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक मथुरा में व दूसरा उज्जैन में अवस्थित था।
मथुरा से जैन धर्म के अनेक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यह कुषाणकाल में जैन धर्म का समृद्ध केन्द्र था।
बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतमबुद्ध का जन्म कपिलवस्त गणराज्य के लुम्बिनी (नेपाल) नामक स्थान पर 563 ई. पू. हुआ था। इनके पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के राजा थे, जो वर्तमान उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में अवस्थित है। इनकी माता माया देवी, रामग्राम (गोरखपुर) के कोलिय गणराज्य की थीं।
महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (ऋषिपत्तन या मृगदाव) में दिया। जिसे धर्मचक्रप्रवर्तन कहा गया।
महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन के सर्वाधिक उपदेश श्रावस्ती (कोसल की राजधानी) में दिए। बुद्ध की मृत्यु (महापरिनिर्वाण) 80 वर्ष की अवस्था में कुशीनारा (वर्तमान कुशीनगर) 483 ई. पू. में हुई थी।
उत्तर प्रदेश को बौद्ध धर्म का पालना कहा जाता है, क्योंकि महात्मा बुद्ध के संन्यासी जीवन का अधिकांश भाग यहीं व्यतीत हुआ।
• बुद्ध काल में उत्तर प्रदेश में सात मुख्य गणराज्य कपिलवस्तु के शाक्य, सुमसुमार पर्वत (चुनार) के भग्ग, केलपुत्त के कालाम, रामग्राम के कोलिय, कुशीनारा के मल्ल, पावा के मल्ल तथा पिप्पलिवन के मोरिय थे।
अन्य धर्म
• जैन और बौद्ध धर्म के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण धर्म के देवी-देवताओं; जैसे-विष्णु, वासुदेव, सूर्य, कार्तिकेय, वाराह, दुर्गा, लक्ष्मी आदि की प्राचीन मूर्तियाँ मथुरा से प्राप्त हुई हैं। इसलिए मथुरा को भारतीय मूर्तिकला का जन्म स्थान कहा जा सकता है।
• ब्राह्मण धर्म से सम्बद्ध विभिन्न कालों में निर्मित अन्य मन्दिर प्रयागराज, वाराणसी, बलिया, गाजीपुर, झाँसी और कानपुर में थे।
• उत्तर प्रदेश में मथुरा के सोंख नामक स्थल की खुदाई से कुषाणकालीन मन्दिर मिला है, जो ब्राह्मण धर्म का प्रतीक माना गया है।
मगध साम्राज्य
• मगध प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली राज्य था। मगध साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक बिम्बिसार था। बिम्बिसार के पश्चात् उसके पुत्र अजातशत्रु ने बिहार के साथ-साथ आधे उत्तर प्रदेश पर भी आधिपत्य स्थापित कर लिया था।
मगध साम्राज्य पर हर्यक वंश, शिशुनाग वंश तथा नन्द वंश के शासकों ने शासन किया। मगध साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली राजा नन्द वंश का संस्थापक महापदमनन्द था।
मौर्यकाल
322 ई. पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु कौटिल्य की सहायता से नन्द वंश के धनानन्द को पराजित करके मगध में मौर्य वंश की स्थापना की।
चन्द्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में ईरान-सौराष्ट्र से लेकर पूर्व में बंगाल तथा उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक किया था।
चन्द्रगुप्त मौर्य के पश्चात् विन्दुसार तथा उसके बाद बिन्दुसार का पुत्र अशोक मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। अशोक के इतिहास के स्रोत उसके अभिलेख हैं।
अशोक के टोपरा एवं मेरठ के स्तम्भलेख को फिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली में तथा कौशाम्बी के स्तम्भलेख को अकबर द्वारा प्रयाग के किले में स्थापित करवाया गया था। सारनाथ स्तम्भलेख के शीर्ष पर बने सिंह की आकृति को भारत सरकार ने अपना राजकीय चिह्न बनाया।
अशोककालीन पाषाण कलाकृतियों तथा अभिलेखों का निर्माण चुनार (मिर्जापुर) के बलुआ पत्थर से किया गया।
सारनाथ के धर्मराज स्तूप का निर्माण भी अशोक द्वारा कराया गया था।
प्राचीनकालीन प्रमुख राजवंश
प्राचीनकाल के प्रमुख राजवंशों का विवरण निम्न है
शुंग वंश
• शुंग वंश की स्थापना पुष्यमित्र शुंग द्वारा 185 ई. पू. में अन्तिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या करके की गई। उसने पाटलिपुत्र के स्थान पर विदिशा को अपनी राजधानी बनाया था।
• अयोध्या से प्राप्त शिलालेख के अनुसार, पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था तथा उसने पतंजलि की अध्यक्षता में दो अश्वमेघ यज्ञ कराए थे।
• यह काल उत्तर प्रदेश में संस्कृत भाषा, स्थापत्य कला तथा ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान का काल था। कण्व वंश
• कालान्तर में शुंग राजवंश की नींव पर कण्व वंश की शासन सत्ता स्थापित हुई। इस वंश का प्रथम राजा वासुदेव था।
• उत्तर भारत पर इस वंश का शासन 75 ई. पू. से लगभग 30 ई. पू. तक रहा।
शक वंश
• 'शक' मध्य एशिया सीरदया की एक खानाबदोश व बर्बर जनजाति थी।
• शकों ने भारत में यवनों के आधिपत्य को समाप्त कर एक वृहत भू-भाग पर अधिकार कर लिया।
मथुरा, तक्षशिला, महाराष्ट्र, उज्जयिनी आदि स्थानों पर इनकी विभिन्न शाखाएँ स्थापित हुईं।
मथुरा शाखा का प्रथम क्षत्रप राजूल था, जिसका उल्लेख मोरा (मथुरा) से प्राप्त ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण लेख में हुआ है।
कुषाण वंश
कुषाण वंश की स्थापना कुजुल कडफिसेस ने की थी। इसके पश्चात् इसके पुत्र विम कडफिसेस ने सत्ता सँभाली थी। इसके सिक्के राज्य के मथुरा जिले से प्राप्त हुए हैं, जिन पर शिव, त्रिशूल व नन्दी की आकृति उत्कीर्ण हैं।
• विम कडफिसेस का उत्तराधिकारी कनिष्क प्रथम था, जो सभी कुषाण राजाओं में श्रेष्ठ था।
• कनिष्क ने 78 ई. से शक संवत् प्रारम्भ किया। यह वर्तमान में भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लिया जाता है। कनिष्क के काल में कुषाण साम्राज्य गान्धार से अवध और वाराणसी तक विस्तृत था एवं इसकी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी।
• मथुरा से कुषाणकाल के प्राप्त सिक्कों, अभिलेख और मूर्तियों से स्पष्ट होता है कि मथुरा भारत में कुषाणों की द्वितीय राजधानी थी। इस समय मथुरा व्यापार और संस्कृति का केन्द्र था।
• कनिष्क के समय में कला के क्षेत्र में दो स्वतन्त्र शैलियों (गान्धार एवं मथुरा) का विकास हुआ। तीसरी सदी के पूर्वार्द्ध में कुषाणों का प्रभुत्व मध्य देश से समाप्त हो गया।
गुप्त वंश
• कुषाण साम्राज्य के विघटन के उपरान्त गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ।
• मगध में गुप्त राजवंश की स्थापना 275 ई. में महाराज श्रीगुप्त द्वारा की गई, लेकिन इस वंश का वास्तविक संस्थापक घटोत्कच था।
• घटोत्कच के बाद उसका पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम मगध का शासक बना। इसने मगध की सीमा को काशी तथा कोसल तक बढ़ाया एवं 319-20 ई. में गुप्त संवत् का प्रवर्तन किया।
चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने मगध साम्राज्य की बागडोर सँभाली। इसे भारत का नेपोलियन भी कहा जाता है।
समुद्रगुप्त के उत्तरापथ एवं दक्षिणपथ अभियानों का उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति (प्रयागराज) स्तम्भ पर दरबारी कवि हरिषेण ने किया है।
• उत्तरापथ के 12 राज्यों में से 4 राज्य उत्तर प्रदेश में अवस्थित थे। अतः सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश गुप्त साम्राज्य का अंग था।
समुद्रगुप्त के बाद उसका पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) गद्दी पर बैठा। इसके शासनकाल को गुप्तकाल का स्वर्ण युग कहा जाता है।
• मन्दिर कला का विकास गुप्तकाल में ही हुआ। उत्तर प्रदेश में कानपुर के भीतरगाँव, गाजीपुर के भितरी तथा झाँसी के देवगढ़ में निर्मित ईंट के मन्दिर गुप्तकालीन वास्तुकला के सुन्दर उदाहरण हैं।
• प्रसिद्ध गुप्तकालीन दशावतार मन्दिर कौशाम्बी में स्थित है। गुप्तकाल में सारनाथ एवं मथुरा में उत्कृष्ट बौद्ध प्रतिमाओं का निर्माण हुआ।
गुप्तकालीन अभिलेख/शिलालेख / स्तम्भलेख
गुप्तकालीन अभिलेख/शिलालेख/स्तम्भलेख का वर्णन निम्न प्रकार है
• बिलसड़ अभिलेख यह अभिलेख राज्य के एटा जिले में स्थित है, जहाँ से कुमारगुप्त के शासनकाल का प्रथम अभिलेख प्राप्त हुआ है। इसमें कुमारगुप्त प्रथम तक की गुप्त वंशावली का विवरण है।
गढ़वा अभिलेख यह राज्य के प्रयागराज जिले की करछना तहसील में स्थित है, जहाँ से कुमारगुप्त के दो अभिलेख प्राप्त हुए हैं। यहीं से स्कन्दगुप्त का अन्तिम अभिलेख भी प्राप्त हुआ है।
करमदण्डा अभिलेख यह राज्य के अयोध्या जिले में स्थित है। यह शिव प्रतिमा के अधोभाग में उत्कीर्ण है। इस प्रतिमा की स्थापना कुमारगुप्त के मन्त्री पृथ्वीसेन ने की थी।
• मनकुँवर अभिलेख यह राज्य के प्रयागराज जिले में स्थित है, जो बुद्ध प्रतिमा के निचले भाग पर उत्कीर्ण है। इस मूर्ति की स्थापना बुद्धमित्र नामक बौद्ध भिक्षु द्वारा करवाई गई थी।
मथुरा शिलालेख इसमें एक मूर्ति के अधोभाग में लेख उत्कीर्ण हैं।
• भितरी स्तम्भलेख यह राज्य के गाजीपुर में भितरी नामक स्थान पर है। इसमें पुष्यमित्रों व हूणों के साथ स्कन्दगुप्त के युद्धों का उल्लेख है। इसमें स्कन्दगुप्त के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को भी प्रस्तुत किया गया है।
गुप्तोत्तर काल
• गुप्तकाल के पतन के बाद भारत में लगभग 1000 वर्षों तक अनेक घटनाएँ घटित हुईं।
• 7वीं सदी आते-आते पाटलिपुत्र की जगह कन्नौज (उत्तर प्रदेश) उत्तर भारत का राजनीतिक केन्द्र बन गया था।
• 484 ई. में तोरमाण और मिहिरकुल के नेतृत्व में उत्तर-पश्चिमी चीन के श्वेत हूणों ने मथुरा, कन्नौज और कौशाम्बी पर हमला किया और इन नगरों को जला दिया गया। इसी समय कन्नौज के मौखरिवंशीय शासक ईसान वर्मा ने हूणों को पराजित कर उत्तर भारत को हूणों से मुक्त कराया। कन्नौज पर मौखरिवंश का शासन कुछ ही समय तक रह पाया और इस पर पुष्यभूति (वर्धन) वंश की सत्ता स्थापित हो गई।
पुष्यभूति (वर्धन) वंश
• वर्धन वंश का संस्थापक पुष्यभूति था। इस वंश का सर्वाधिक योग्य शासक हर्षवर्धन था।
• हर्ष ने थानेश्वर के स्थान पर कन्नौज को राजधानी बनाया।
• हर्षवर्धन का साम्राज्य थानेश्वर से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के तट तक तथा पूर्व में गंजाम से लेकर पश्चिम में बल्लभी तक विस्तृत था।
• हर्षकालीन शासन में कन्नौज की समृद्धि का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसांग के वर्णनों में मिलता है।
• कन्नौज की समृद्धि के कारण उसे महोदय श्री भी कहा गया है।
• हर्षवर्धन ने 643 ई. में राज्य के प्रयाग एवं कन्नौज में दो विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन कराया था।
गुर्जर-प्रतिहार वंश
• वर्धन वंश के पश्चात् कुछ समय तक कन्नौज में यशोवर्मन नामक शासक का आधिपत्य रहा। कन्नौज पर आधिपत्य को लेकर लगभग 200 वर्षों तक तीन वंशों राष्ट्रकूटों, पाल व प्रतिहारों के मध्य त्रिकोणीय संघर्ष चलता रहा, जिसमें गुर्जर-प्रतिहार कन्नौज पर अपना आधिपत्य स्थापित करने में सफल रहे।
ग्वालियर से प्राप्त एक अभिलेख के अनुसार प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज के चक्रायुध को हराकर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया था।
मिहिरभोज, महिपाल, महेन्द्रपाल आदि इस वंश के प्रमुख शासक थे। राजा भोज इस वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली राजा थे।
राजा भोज के शासनकाल में सुलेमान भारत आया था।
• महमूद गजनवी ने कन्नौज पर 1018-19 ई. में आक्रमण कर प्रतिहारों को पराजित किया।
महोबा का चन्देल वंश व गहड़वाल वंश
• गुर्जर-प्रतिहारों के पतन के पश्चात् राज्य में दो नए राजवंशों चन्देल वंश व गहड़वाल वंश का उदय हुआ।
महाबा के चन्देलों ने लगभग 400 वर्षों तक शासन किया। इनके साक्ष्य खजुराहों में आज भी विद्यमान हैं।
गहड़वाल वंश की स्थापना कन्नौज में चन्द्रदेव ने की थी। इस वंश के सबसे प्रमुख राजा गोविन्द चन्द्र व जयचन्द्र थे।
1194 ई. में हुए चन्दावर (फिरोजाबाद) के युद्ध में मोहम्मद गौरी ने गहड़वाल वंश के अन्तिम शासक जयचन्द्र को पराजित कर उसकी हत्या कर दी थी।
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