लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी
1. सत्ता की साझेदारी की एक उपयुक्त परिभाषा दें। उत्तर- सत्ता में साझेदारी के कारण लोकतंत्र को 'जनता का शासन' कहा जाता है। अर्थात, "जनता द्वारा सरकारी काम-काज में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेने • की क्रिया को सत्ता में साझेदारी कहते हैं।"
2. सामाजिक विभेद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- जन्म, भाषा, जाति तथा धर्म के आधार पर प्रत्येक समाज के लोगों में विभेद = होना स्वाभाविक है। इन आधारों पर जब लोग अलग-अलग समुदायों में बँट जाते हैं तब उसे हम सामाजिक विभेद कहते हैं।
3. सामाजिक विभेद के चलते किस देश को विखंडन का सामना करना पड़ा?
उत्तर - सामाजिक विभेद के चलते यूगोस्लाविया का विखंडन हुआ।
4. सामाजिक विभेद की उत्पत्ति का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर - सामाजिक विभेद की उत्पत्ति का मुख्य कारण जन्म है।
5. विविधता राष्ट्र के लिए कब घातक बन जाती है?
उत्तर - एक सीमा का उल्लंघन होते ही सामाजिक विभाजन या विविधता राष्ट्र के लिए घातक बन जाती है। 6. लोकतंत्र में विविधता का एक कुपरिणाम बताएँ। उत्तर - लोकतंत्र में विविधता का एक कुपरिणाम सामाजिक विभेद है।
7. सामाजिक विभेद का कुपरिणाम क्या है?
उत्तर- सामाजिक विभेदों के कारण संघर्ष और हिंसा की स्थिति बनी रहती है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होती है।
8. सामाजिक विभेद का एक अच्छा परिणाम बताएँ। उत्तर- सामाजिक विभेद बने रहने से सामाजिक विभेदों की राजनीति चलती है और वह लोकतंत्र को सशक्त बनाने में सहायक सिद्ध होती है।
9. सामाजिक विभेद की राजनीति का परिणाम हमेशा अच्छा हो, इसके लिए शासन को कौन-सी सावधानियाँ रखने की आवश्यकता है?
उत्तर- सरकार को आपसी सौहार्द उत्पन्न करते रहना चाहिए तथा संभावित गड़बड़ियों की पहचान करके उपयुक्त कदम उठाते रहना चाहिए।
10. बँधुआ मजदूर किसे कहते हैं?
उत्तर- जो मजदूर अपना श्रम किसी खास व्यक्ति (संस्था) को उसी के शर्त पर बेचने के लिए बाध्य हो, बंधुआ मजदूर कहलाता है।
11. संपूर्ण भारत में लगभग कितनी प्रतिशत महिलाएँ हैं? उत्तर- 48.53% (2011 की जनगणना के आधार पर)
12. 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में कितनी प्रतिशत महिलाएँ शिक्षित हैं?
उत्तर- 64.6 प्रतिशत
13. भारत में एक हजार पुरुष पर महिलाओं की संख्या कितनी है?
उत्तर-943
14. महिलाओं की समाज में दयनीय अवस्था का एक कारण वताएँ।
उत्तर - शिक्षा का अभाव
15. लैंगिक विभेद से आप क्या समझते हैं? लिंग के आधार पर पुरुषों और महिलाओं में विभेद करना
16. रंगभेद क्या है?
उत्तर- मनुष्यों में गोरे और काले रंग के आधार पर विभेद करना और काले रंगवालों को गोरे रंगवालों की अपेक्षा कई अधिकारों से वंचित रखना
17. 2009 की लोकसभा के चुनाव में महिलाओं की राजनीतिक साझेदारी कितनी थी ?
उत्तर -10.68 प्रतिशत
18. भारतीय समाज पर जातिवाद के किन्हीं दो कुप्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- भारतीय समाज पर जातिवाद के दो कुप्रभाव हैं- (i) असमानता एवं फूट की भावना तथा
(ii) तिलक-दहेज की प्रथा।
19. दो सामाजिक बुराइयों के नाम वताएँ जो अभी तक भारतीय समाज में मौजूद हैं।
उत्तर - जातिवाद एवं दहेज प्रथा
20. भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, इसके पक्ष में कोई दो तर्क दें।
उत्तर - (i) भारत में धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं है तथा (ii) राज्य का अपना कोई धर्म 9 नहीं है।
21. सांप्रदायिकता क्या है?
उत्तर - अपने धार्मिक हितों के लिए राष्ट्रहित का बलिदान कर देना सांप्रदायिकता है।
22. 1931 में सांप्रदायिकता का शिकार किस व्यक्ति को होना पड़ा?
उत्तर- गणेशशंकर विद्यार्थी को
23. भारत में संप्रदाय के नाम पर 'फूट डालो और शासन करो' की नीति किसने अपनाई ?
उत्तर- ब्रिटिश सरकार ने, जब भारत परतंत्र था।
24. धार्मिक संप्रदायवाद भारतीय लोकतंत्र के लिए किस प्रकार खतरनाक है?
उत्तर- इससे हिंसा और संघर्ष की स्थिति बनी रहती है जिससे राष्ट्रीय एकता पर कुठाराघात होता है और भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा उत्पन्न हो जाता है। 25. महिला सशक्तीकरण से आप क्या समझते हैं? उत्तर - महिला सशक्तीकरण आर्थिक एवं राजनीतिक अवसरों तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की सहभागिता की ओर ध्यान आकृष्ट करता है।
26. भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है?
उत्तर - सोलहवीं लोकसभा में पहली बार सर्वाधिक 65 महिलाएँ निर्वाचित होकर आईं और उनके प्रतिनिधित्व का प्रतिशत 11.93 हो गया है। विकसित देशों में भी विधायिकाओं में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। लेकिन, भारत में तो विधायिकाओं में इनकी स्थिति विकसित देशों की तुलना में भी कम है। राज्य विधानसभाओं में उनके प्रतिनिधित्व का प्रतिशत इससे भी कम है।
27. भारत में लैंगिक विभेद जैसी समस्या का समाधान कैसे हो सकता है?
उत्तर - महिला सशक्तीकरण से लैंगिक विभेद को समाप्त किया जा सकता है।
28. जीवन के विभिन्न पहलुओं का जिक्र करें जिनमें भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव है या वे कमजोर स्थिति में हैं।
उत्तर - लड़के और लड़कियों के पालन-पोषण के क्रम में ही लड़कियों को गृहस्थी तक सीमित किया जाता है। उनका काम खाना बनाना एवं बरतन साफ करना माना जाता है। खान-पान, स्वास्थ्य, शिक्षा में लड़कों पर अधिक व्यय किया जाता है, लड़कियों के प्रति उपेक्षा का दृष्टिकोण होता है।
लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी
लघु उत्तरीय प्रश्न
1. सत्ता में साझेदारी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर - सत्ता में साझेदारी का अर्थ है - सरकारी क्रियाकलापों में जनता की भागीदारी तथा सरकार के निर्णयों एवं नीति-निर्माण में भाग लेना। इस प्रक्रिया को जनता द्वारा प्रभावित किया जाना चाहिए, ताकि नीतियाँ जनता की इच्छा के अनुरूप हों, नीतियों के क्रियान्वयन में जनता की भागीदारी सुनिश्चित हो एवं शासन जनोन्मुखी, उत्तरदायी तथा जनइच्छा से संचालित हो। इस तरह, सत्ता में जनता की भागीदारी के ये मुख्य पहलू हैं।
2. लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी क्या महत्त्व रखती है? उत्तर - सत्ता में जनता की साझेदारी लोकतंत्र का आधार है। जब जनता को राज्य के काम-काज में भागीदारी मिलती है तो जनता राज्य के मामले में अधिक रुचि लेती है। इससे राजनीतिक सत्ता को जनसमर्थन और सहयोग प्राप्त होता है। राजनीतिक व्यवस्था अधिक स्थिर होती है और उसका स्थायित्व बढ़ जाता है। इससे क्रांति, विरोध और संशय की जगह जनसंतुष्टि, सहयोग और विश्वास बढ़ता है। इससे राष्ट्र को एकजुटता प्राप्त होती है।
3. सामाजिक विभेद किस प्रकार सामाजिक विभाजन के लिए उत्तरदायी है?
उत्तर - वास्तव में सामाजिक विभेद सामाजिक विभाजन और सामाजिक संघर्ष के लिए मूल रूप से उत्तरदायी होता है। प्रत्येक समाज में विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के लोग निवास करते हैं। सामाजिक विभेद का मूल कारण जन्म को माना जाता है। विविधता अच्छी चीज है. परंतु यह राष्ट के लिए घातक भी है। धर्म, क्षेत्र, भाषा, संप्रदाय आदि के नाम पर आते है। अलखना राष्ट्र को कमजोर बनाना है। इससे सामाण, संप्रदाय आदि खतरे बढ़ जाते हैं। अतः, सामाजिक विभेद को मिटाकर ही सामाजिक विभाजन के रोका जा सकता।
4. सामाजिक विभेदों में तालमेल किस प्रकार स्थापित किया जाता है?
उत्तर - सामाजिक विभेदों में तालमेल स्थापित कर ही राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखा जा सकता है। सामाजिक विभेदों में तालमेल बनाए रखने के लिए भारत में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाया गया है। इस सिद्धांत से यह धारणा विकसित होती है कि उनके धर्म अलग-अलग अवश्य हैं, परंतु उनका राष्ट्र तो एक ही है। दूसरी बात यह भी है कि आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य में सत्ता के बंटवारे में अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक दोनों का खयाल रखा जाता है ताकि सामाजिक विभेदों में तालमेल स्थापित किया जा सके।
5. परिवारवाद और जातिवाद बिहार में किस तरह लोकतंत्र को प्रभावित करते हैं?
उत्तर - बिहार की राजनीति में जातिवाद और परिवारवाद एक स्थापित तथ्य बन गया है। 20वीं सदी के सातवें दशक में जातियाँ राजनीति की धुरी बनकर सामने आई। जातियों को गोलबंद कर जातीय भावना फैलाई जाती है। इस भावना का इस्तेमाल कर राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति की कोशिश की जाती है। जाति के आधार पर चुनाव में प्रत्याशी चुने जाते हैं। मंत्रिमंडल के गठन में जाति का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। फलतः, बिहार की राजनीति जातियों के इर्द-गिर्द घूमती है। परिवार के लोगों को आगे लाने की कोशिश में जाति का तत्त्व सहायक होता है। यह प्रवृत्ति राजनीति की छवि और लोकतंत्र की पारदर्शिता को प्रभावित करती है।
6. जातिवाद के किन्हीं चार कुप्रभावों का उल्लेख करें। उत्तर - जातिवाद के निम्नांकित चार कुप्रभाव हैं।
(i) समाज में रूढ़िवाद और सामाजिक कुरीतियों का विकास
(ii) विभिन्न जातियों के लोगों द्वारा एक-दूसरे को घृणा की दृष्टि से देखने के कारण लोगों के बीच असमानता एवं फूट की भावना में वृद्धि
(iii) जातिवाद के कारण राष्ट्र का अनेक समूहों और टुकड़ों में बँट जाने के कारण राष्ट्रीय एकता पर कुठाराघात
(iv) लोगों के व्यक्तित्व का स्वतंत्र रूप से विकास नहीं होने के कारण राष्ट्र की आर्थिक प्रगति में रुकावट ।
7. भारतीय संदर्भ में सत्ता में साझेदारी का एक उदाहरण देते हुए इसका एक युक्तिपरक और एक नैतिक कारण बताएँ।
उत्तर - अन्य लोकतांत्रिक राज्यों की तरह भारत में भी सत्ता में साझेदारी के दो कारण हैं- युक्तिपरक एवं नैतिक। भारत में विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, संप्रदाय एवं क्षेत्र के लोग निवास करते हैं और इस आधार पर उनमें विभेद बना रहता है। सत्ता में उचित साझेदारी इस विभेद को कम कर देती है और आपस में टकराव की संभावना कम हो जाती है। इसी उद्देश्य से भारत में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। सत्ता में साझेदारी का नैतिक कारण भी है। शक्ति के विभाजन और जनमत पर ही लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था आधृत है। सरकार की नीतियों और कानूनों पर जनता का मत अवश्य लिया जाता है। जनमत के विरुद्ध जाने का साहस लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में शासक को नहीं होता है।
8. भ्रूणहत्या क्या है? क्या कानून इसे रोकने में सफल हुआ है?
उत्तर- आज भी पुत्री का जन्म शोक का विषय बना हुआ है। अत्याधुनिक उपकरणों की सहायता से गर्भ में ही शिशु (भ्रूण) के लिंग की जानकारी प्राप्त हो जाती है। पुत्री के जन्म की संभावना के कारण गर्भ में ही उसकी हत्या कर दी जाती है। इसे ही भ्रूणहत्या कहते हैं। इसे रोकने के लिए कानून बन चुके हैं, परंतु अभी तक आशातीत सफलता नहीं मिली है। इसपर रोक के लिए कानून के साथ-साथ लोगों की सोच भी बदलनी होगी।
9. लैंगिक असमानता क्या है?
उत्तर- लिंग के आधार पर पुरुषों और स्त्रियों में भेद करना, स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में दोयम दर्जे का और हीन समझने की भावना लैंगिक असमानता है। लड़कियों को लड़कों की तुलना में कम महत्त्व दिया जाना, शिक्षा, खान-पान, पालन-पोषण में अंतर करना, लड़की को घर की चहारदीवारी में कैद रखना और घर के काम-काज तक सीमित - रखना, स्त्रियों पर पुरुषों का नियंत्रण आदि लैंगिक असमानता के उदाहरण है।
10. समाज में स्त्रियों की दयनीय स्थिति के लिए उत्तरदायी किन्हीं चार कारणों का उल्लेख करें।
उत्तर - समाज में स्त्रियों की दयनीय स्थिति के चार कारण हैं-
(i) पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में शिक्षा का अभाव है।
(ii) स्त्रियों के बीच पर्दाप्रथा कायम है।
(iii) बालविवाह, - सतीप्रथा जैसी कुरीतियाँ इसके लिए अधिक जिम्मेवार हैं।
(iv) दहेज प्रथा भी स्त्रियों की दशा खराब करने में मदद पहुँचा रही है।
11. राष्ट्रीय प्रगति में महिलाओं का क्या योगदान है? उत्तर - राष्ट्र का जीवन महिला और पुरुष दोनों के योगदान पर टिका होता है। आधी आबादी की मानवीय और बौद्धिक शक्ति के बिना कोई राष्ट्र विकास और प्रगति में दूसरे राष्ट्र की तुलना में पिछड़ जाता है। विकसित राष्ट्र इसलिए विकसित हैं कि वे अपने मानव संसाधन का शत-प्रतिशत उपयोग करने में सक्षम है। पुरुष-प्रधानतावाले विकासशील समाजों में भी महिलाएँ प्रगति और विकास के केंद्र में है। अंतर केवल यह है कि यहाँ महिलाओं के श्रम की कोई कीमत नहीं दी जाती है और उनके कार्य को महत्त्व नहीं दिया जाता है। घरेलू काम-काज में अपनी संपूर्ण क्षमता से दिनभर श्रम करनेवाली महिलाओं के बिना पुरुष न तो स्वतंत्र उपार्जन कर सकेंगे, न ही संतति की परवरिश। कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग के क्षेत्रों में महिलाएँ आगे बढ़कर योगदान कर रही हैं। आज महिलाएँ ओलंपिक प्रतिस्पर्द्धा में हैं। ये वकील, चिकित्सक, इंजीनियर, प्रबंधक, वैज्ञानिक हैं एवं संचार, कंप्यूटर के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दे रही हैं।
12. भारतीय संविधान में लैंगिक समभाव के लिए किए गए विभिन्न प्रावधानों का उल्लेख करें।
उत्तर - भारतीय संविधान में लैंगिक समभाव के लिए निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं।
(i) लिंग के आधार पर भेदभाव करने की मनाही की गई है।
(ii) रोजगार पाने के लिए पुरुष एवं नारी के साथ एक जैसे व्यवहार की व्यवस्था है।
(iii) नारियों को पुरुषों के समान ही मताधिकार दिया गया है।
(iv) राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व के अंतर्गत कहा गया है कि राज्य अपनी नीति का संचालन इस प्रकार करेगा जिसमें पुरुष एवं नारी को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले।
13. सांप्रदायिक सद्भाव के लिए आप क्या करेंगे?
उत्तर- लोगों के दिल में यह भावना लानी होगी कि भारत उनका है और हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी सभी भारतवासी हैं। देशहित सर्वोपरि है और हम सबको मिल-जुलकर रहना है। मिल-जुलकर रहने से ही सद्भाव कायम रह सकता है। पर्व-त्योहार में भी हम दूसरे संप्रदाय के लोगों से मिलते रहें।
14. भारत में किस तरह अव भी जातिगत असमानताएँ जारी हैं? स्पष्ट करें।
उत्तर - भारतीय संविधान में कहा गया है कि भारत में लिंग, जन्मस्थान, जाति, धर्म इत्यादि के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा। इसी उद्देश्य से अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया है। इतना होने पर भी भारत में आज भी कई जातिगत असमानताएँ विद्यमान है।
(i) जाति का आधार कर्म न होकर जन्म हो गया है।
(ii) जाति-पॉति का भेदभाव समाप्त नहीं हुआ है। अस्पृश्यता जैसे आचरण आज भी प्रचलित हैं।
(iii) राजनीतिक दलों द्वारा टिकट का बँटवारा भी जाति के आधार पर ही हो रहा है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी
1. सामाजिक विभेद क्यों उत्पन्न होते हैं? कारण वताएँ। उत्तर - सामाजिक विभेदों की उत्पत्ति के जिम्मेवार अनेक कारण होते हैं। प्रत्येक समाज में विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, संप्रदाय एवं क्षेत्र के लोग निवास करते हैं। इन विभिन्नताओं के चलते उनमें विभेद की स्थिति पैदा होती है। जन्म सामाजिक विभेदों की उत्पत्ति का सबसे प्रमुख कारण माना जाता है। जहाँ भी किसी व्यक्ति का जन्म होता है वह किसी-न-किसी परिवारविशेष का सदस्य होता है। उस परिवार का संबंध किसी-न-किसी जाति, धर्म, संप्रदाय, समूह, भाषा तथा क्षेत्र से जुड़ा होता है। इसके चलते उस व्यक्तिविशेष का संबंध उसी जाति, धर्म, समूह, भाषा एवं क्षेत्र से जुड़ जाता है। यहीं से विभेद की उत्पत्ति स्वतः हो जाती है। उपर्युक्त कारकों के अलावे भी कुछ ऐसे कारक हैं जो सामाजिक विभेद उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लिंग, रंग, नस्ल, धन इत्यादि भी कुछ ऐसे कारक हैं जो सामाजिक विभेद बढ़ाने में सहयोग करते हैं। व्यक्ति के जन्म लेते ही ये कारक सामाजिक विभेद का रूप ग्रहण कर लेते हैं। स्त्री-पुरुष, गोरे-काले, लंबे-नाटे, अमीर-गरीब, शक्तिशाली कमजोर जैसे विभेद भी सामाजिक विभेद में बदल जाते हैं। कभी-कभी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से भी सामाजिक विभेद का जन्म होता है। ऐसा भी होता है कि अनेक व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तित करके एक अलग समुदाय अथवा समूह बना लेते हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो कभी-कभी अंतरजातीय विवाह कर अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। कुछ व्यक्ति अपने परिवार अथवा जाति की परंपराओं को छोड़कर भिन्न कार्यक्षेत्रों का चयन, पेशे, उद्योग-धंधे तथा सांस्कृतिक गतिविधियों को अपनाकर अपनी अलग पहचान बनाते हैं और अलग सामाजिक समूहों के सदस्य हो जाते हैं। इन सब कारणों से सामाजिक विभेदों का जन्म होता है।
2. 'विविधता में एकता' का वर्णन करें।
उत्तर- विविधता लोकतंत्र का एक स्वाभाविक गुण है। जब सभी जाति वर्ण धर्म संप्रदाय, भाषाभाषी और अलग-अलग रीति-रिवाजों के लोग आपस में मिल-जुलकर एक राष्ट्र की भावना से मौलिक प्रश्नों पर एकजुटता प्रदर्शित करते हैं तो यह विविधता में एकता का सूचक है। 'विविधता में एकता' भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक खास विशेषता है। बेल्जियम भी इसका एक उत्कृष्ट नमूना है। जब भी भारत की अखंडता खतरे में पड़ी वैर-भाव को भुलाकर एक साथ मिलकर आई तो सभी जाति एवं धमाका साथ मिल-जुलकर सामना किया। यह 'विविधता में एकता' का एक आदर्श उदाहरण है।
3.'महिला आरक्षण विधेयक' क्या है? आपके अनुसार, यह विधेयक विधान (कानून) क्यों नहीं बन पा रहा है? उत्तर- जनता की प्रातिनिधिक संस्थाओं में सत्ता की साझेदारी में महिलाओं को अधिक स्थान देने के उद्देश्य से कई कदम उठाए जा चुके है। भारतीय संविधान के 73वें और 74वें संशोधन द्वारा देशभर में ग्रामीण एवं नगरीय स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित कर दिए गए है। बिहार में पंचायती एवं नगरीय संस्थाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। लोकसभा और राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने के लिए संसद में विधेयक उपस्थित किया जा चुका है। इसे ही 'महिला आरक्षण विधेयक' कहते हैं। इस विधेयक के विधान बनने के रास्ते में अनेक बाधाएँ हैं। कई पुरुष राजनीतिज्ञों को अपनी सीट से वंचित होने की आशंका है, अतः ऐसे पुरुष राजनीतिज्ञ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष ढंग से इसका विरोध कर रहे हैं। कुछ राजनीतिज्ञों ने इस विधेयक के विधान बनने के रास्ते में यह अड़ंगा लगा दिया है कि दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था की जाए। इसका अर्थ यह हुआ कि ऐसे लोग 'आरक्षण के अंदर आरक्षण' के पक्ष में हैं।
4. सामाजिक विभेद की राजनीति के परिणाम तय करनेवाले किन्हीं तीन कारकों का उल्लेख संक्षेप में करें। उत्तर - सामाजिक विभेद की राजनीति के परिणाम इन तीन कारकों पर निर्भर करते हैं।
(i) स्वयं की पहचान की चेतना- यदि लोग अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अत्यधिक सचेष्ट हैं और इस क्रम में यदि उन्हें दूसरे की परवाह नहीं है तो ऐसी स्थिति में सामाजिक विभेद की राजनीति का परिणाम सुखद हो ही नहीं सकता। अतः, यदि अपनी पहचान की चेतना के साथ दूसरे की पहचान की भी कोशिश की जाए तो सामाजिक विभेद के परिणाम सुखद हो सकते हैं।
(ii) विभिन्न समुदायों की माँगों को राजनीतिक दलों द्वारा उपस्थित करने का तरीका - समुदायविशेष की कुछ माँगें राष्ट्रहित में नहीं होती और यदि उनकी माँगों को माने जाने के लिए शासन पर दवाव पड़ता है तो ऐसी स्थिति में विभेद की राजनीति का परिणाम कभी सुखद नहीं हो सकता, जैसे 'श्रीलंका सिर्फ सिंहलियों के लिए' की मान्यता का दुष्परिणाम किसी से छिपा नहीं है।
(iii) माँगों के प्रति सरकार की सोच सामाजिक विभेद की राजनीति के परिणाम सरकार के विभिन्न समुदायों की माँगों के प्रति सोच पर भी निर्भर करते हैं। विभेद की राजनीति के अच्छे परिणाम के लिए यह आवश्यक है कि सरकार विभिन्न समुदायों की उचित माँगों का खयाल रखे। साथ-ही-साथ, वैसी माँगें जिनसे दूसरे समुदायों के हितों पर चोट न पहुँचे, सरकार द्वारा मान लेने का परिणाम सदैव अच्छा ही होता है।
5. सांप्रदायिकता क्या है? इसके प्रमुख तत्त्व कौन-कौन-से हैं?
उत्तर- अपने धर्म को अन्य धर्मों से ऊँचा मानना और अपने धार्मिक हितों के लिए राष्ट्रहित का भी बलिदान कर देना सांप्रदायिकता है। यह धर्म के नाम पर घृणा फैलाती है और मानव को मानव से घृणा करना सिखाती है। इसके चलते एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के दुश्मन हो जाते हैं। अतः, सांप्रदायिकता एक संकीर्ण विचारधारा है जो एक विशेष समुदाय को अन्य समुदायों के साथ दुश्मन जैसा व्यवहार करने का निर्देश देती है। सांप्रदायिकता के प्रमुख तीन तत्त्व निम्नांकित है।
(i) एक धर्म के अनुयायियों के हित एकसमान होते हैं।
(ii) एक धर्म के अनुयायियों के हित दूसरे धर्म के अनुयायियों से भिन्न होते है।
(iii) उनके हित एक-दूसरे से भिन्न ही नहीं, बल्कि परस्परविरोधी भी होते हैं।
6. लैंगिक असमानता के लिए उत्तरदायी महत्त्वपूर्ण कारकों का वर्णन करें।
उत्तर- लैंगिक असमानता भारत के विकास के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती है। पुरुष और नारी दोनों के पारस्परिक सहयोग पर ही विकास संभव है। परंतु, भारत में लैंगिक असमानता की समस्या गंभीर है। लैंगिक असमानता के लिए उत्तरदायी महत्त्वपूर्ण कारक निम्नांकित है।
(i) महिलाओं में शिक्षा का अभाव है। शिक्षा के अभाव के कारण ही महिलाओं के बीच अंधविश्वास अधिक है। महिलाएँ शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों से पीछे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, जहाँ 80.9 प्रतिशत पुरुष शिक्षित है, वहीं शिक्षित महिलाओं का प्रतिशत 64.6 है।
(ii) पर्दाप्रथा भी लैंगिक असमानता का बहुत बड़ा कारक है।
(iii) भारत में प्रचलित सतीप्रथा एवं बालविवाह की प्रथा भी लैंगिक असमानता के लिए बहुत हद तक उत्तरदायी हैं।
(iv) दहेज की प्रथा भी लैंगिक असमानता का एक महत्त्वपूर्ण कारक है।
(v) जनसंख्या की दृष्टि से भी लैंगिक असमानता बनी हुई है। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या कम है। 1901 में भारत में एक हजार पुरुष पर 972 महिलाएँ थीं, वहीं 2011 की जनगणना के समय एक हजार पुरुष पर महिलाओं की संख्या 943 रह गई है। केरल और पुदुचेरी को छोड़कर अन्य राज्यों में लगभग यही स्थिति बनी हुई है।
(vi) पुरुषप्रधान समाज, कन्या भ्रूणहत्या, उच्च मातृ-मृत्यु दर, कन्या-शिशु की उपेक्षा, पुरुष-शिशु के लिए प्राथमिकता, स्त्री-प्रताड़ना आदि भी लैगिक असमानता के मुख्य कारक हैं।
7. सामाजिक विभेदों का लोकतंत्र पर पड़नेवाले प्रभावों का वर्णन सोदाहरण करें।
उत्तर- सामाजिक विभेदों का प्रभाव लोकतंत्र पर अवश्य पड़ता है। यह प्रभाव प्रायः खतरनाक ही सिद्ध होता है। सामाजिक विभेदों का लोकतंत्र पर दुर्भाग्यपूर्ण प्रभाव यह है कि किसी-किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामाजिक विभेद व्यवस्था को इतना प्रभावित कर देता है कि वहाँ सामाजिक विभेदों की ही राजनीति हावी हो जाती है। जब सामाजिक विभेद राजनीतिक विभेद में परिवर्तित हो जाता है तब लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक हो जाता है। ऐसा होने पर लोकतांत्रिक व्यवस्था का ही विखंडन हो जाता है। इसे उदाहरण के साथ समझाया जा सकता है। यूगोस्लाविया में धर्म और जाति के आधार पर सामाजिक विभेद इस हद तक बढ़ गया कि वहाँ सामाजिक विभेद की राजनीति हावी हो गई। यह यूगोस्लाविया के लिए खतरनाक सिद्ध हुआ। यूगोस्लाविया कई खंडों में बॅट गया। यूगोस्लाविया के उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक विभेद लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है। परंतु, इसे अक्षरशः स्वीकार नहीं किया जा सकता। अनेक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सामाजिक विभेद रहते हुए भी देश के विघटन की स्थिति नहीं आती है। सत्य तो यह है कि अधिकांश लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सामाजिक विभेद रहते ही हैं। यह खतरनाक नहीं बने, इसके लिए कुछ सावधानियाँ बरतने की आवश्यकता है। भारत और बेल्जियम में सामाजिक विभेद रहते हुए भी यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं है।
8. भारत में जातिवाद के विकास के किन्हीं चार कारणों का वर्णन करें।
उत्तर- भारतीय समाज की विभिन्न समस्याओं में जातिवाद भी एक है। भारत में जातिवाद पनपने के चार मुख्य कारण हैं।
(i) प्रारंभ में कर्म के आधार पर जाति का निर्माण हुआ था जिससे एक जाति की निर्भरता दूसरी जाति पर रहती थी। इसके चलते जातिवाद पनप नहीं पाया था। जब से जन्म के आधार पर जाति का निर्धारण होने लगा, आपसी भाईचारे का संबंध समाप्त हो गया। इससे जातिवाद को बढ़ावा मिला।
(ii) प्रत्येक जाति का अपनी ही जाति में विवाह करने की प्रथा चल पड़ी जिससे लोगों का अपनी जाति के हितों का विशेष ध्यान रहने लगा। इससे भी जातिवाद को प्रोत्साहन मिला।
(iii) प्रत्येक जाति अपने सदस्यों पर दूसरी जाति के सदस्यों के साथ रहने तथा खाने-पीने पर कुछ-न-कुछ प्रतिबंध लगाने लगी। इससे अपनी जाति के प्रति लगाव बढ़ता गया। (iv) एक जाति के रीति-रिवाज दूसरी जाति के रीति-रिवाज से भिन्न होने के कारण भी लोगों में अपनी जाति के प्रति प्रतिबद्धता बढ़ती गई। सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली ।