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पृथ्वी

पृथ्वी के संबंध में प्रारम्भिक व्यवस्थित सिद्धांत भूकेन्द्रित  था। यूनानी दार्शनिक कलाडियस टॉलमी ने सन 140 ई. के लगभग खगोलिकी पर एक विश्वकोश बनाया। इसका अरबी भाषा का संक्षिप्त संस्करण 'अल्मगेस्त' नाम से 1,400 सालों तक खगोलिकी का बाइबिल बना रहा। 1543 में कापरनिकस ने 'डी रिवोलुशनिबस आरबियम सोयलेसटियम' पुस्तक प्रकाशित कर सूर्य-केन्द्रित सिद्धान्त की स्थापना की और बताया कि सूर्य ब्रह्मांड का केन्द्र है और पृथ्वी तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की रचना के संबंध में आधुनिक सिद्धान्त कापरनिकस पर आधारित है। 
   भूकम्पों के अध्ययन से हमें पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का बोध होता है। इन अध्ययनों से मालूम होता है कि पृथ्वी का केन्द्र ठोस आन्तरिक क्रोड है जिसका घनत्व लगभग 13 ग्राम प्रति घन सेन्टीमीटर है। आन्तरिक क्रोड लगभग 1,370 कि.मी. मोटा है और लगभग 2,080 कि.मी. के बाहरी क्रोड से घिरा है। बाहरी क्रोड पिघला हुआ लगता है।
    बाहरी क्रोड मैंटल से घिरा हुआ है जिसकी मोटाई लगभग 2,900 कि.मी. है। मैंटल का ऊपरी भाग पृथ्वी की परत से ढका है जिसकी मोटाई 12 से 60 कि.मी. की है। आन्तरिक क्रोड के केन्द्र में - अर्थात लगभग 6,370 कि.मी. की गहराई में तापमान लगभग 4,000° से. तक है और दबाव लगभग 40 लाख वायुमंडलों तक पहुंचता है।
    मैंटल कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यह पृथ्वी के व्यास का लगभग आधा (2,900 कि.मी.), आयतन का 83 प्रतिशत और द्रव्यमान का 67 प्रतिशत है। ऊपरी परतों की गति का निर्धारण जिस गतिशील प्रक्रिया से होता है उसका संचालन इस मैंटल के द्वारा होता है। पृथ्वी की ऊपरी सतह के नीचे 45 से 56 कि.मी. तक की औसत गहराई से शुरू कर मैंटल 2,900 कि.मी. की गहराई तक फैला है जहां - यह बाहरी क्रोड से मिलता है। मैंटल लाल गरम - चट्टान का खोल है और पृथ्वी की धातु संबंधी और अंशतः गलित क्रोड (आन्तरिक और बाहरी दोनों क्रोडों) को पृथ्वी की परतों की ठंडी चट्टानों से अलग करता है। मैंगनेशियम और लौह धातुओं से समृद्ध सिलिकेट धातुओं से यह मैंटल बना है। बाहरी क्रोड के पास मैंटल का घनत्व 3.5 ग्राम प्रति घन सेंटी मीटर से लेकर 5.5 ग्राम तक गहराई के अनुसार बढ़ता है।
      मैंटल का ऊपरी हिस्सा जो लगभग 250 कि.मी. मोटा है एस्थिनोस्फेयर कहलाता है। यहां चट्टानें आंशिक रूप से पिघली हुई होती हैं और धातु- कणों के बीच द्रव की एक पतली झिल्ली होती है। नीचे के मैंटल के लाल गर्म होने और ऊपरी मैंटल (एस्थिनोस्फेयर) के आंशिक गलित रूप दोनों के मिलने से पूरा मैंटल लचीला बन जाता है। इस लचीलेपन के ऊपर पृथ्वी की ऊपरी सतह (महाद्वीप और महासागर समेत) लिथोस्फेयर टिका है। लिथोस्फेयर एस्थिनोस्फेयर से इस बात में भिन्न है कि यह अपेक्षाकृत ठंडा और अधिक कड़ा है।

लिथोस्फेयर 

लिथोस्फेयर का ऊपरी हिस्सा जो पृथ्वी की सतह है जो एस्थिनोस्फेयर पर एक तरह से तैरता रहता है। अन्य तैरनेवाले पदार्थों की तरह, सतह एक संतुलन की खोज करती है। अर्थात गहराई में जाने पर वह भारी और ऊपर आने पर हल्की होती जाती है। सतह पर पहाड़ों में हल्के पदार्थों की घनी गहरी जड़ें हैं जिनसे वे सहारा पाते हैं। जब सतह के किसी भाग का भार बदलता है तब सतह संतुलन बनाए रखने के लिए या तो ऊपर उठती है या नीचे डूबती है। पृथ्वी की बाहरी सतह चार भागों में बांटी गयी है:
 (1) लिथोस्फेयर का मतलब है स्थल यानी पृथ्वी की पूरी बांहरी ऊपरी सतह जिसमें न केवल जमीन की सतह है बल्कि समुद्र का तल भी है। 
(2) हाइड्रोस्फेयर का अर्थ है जलमंडल यानी पानी की सतह जिसमें समुद्र, झील और नदियां शामिल हैं। 
(3) एटमोस्फेयर अर्थात् वायुमंडल हवा की चादर है जो पृथ्वी को ढके हैं। इसमें स्थल और जल दोनों मंडल शामिल हैं। 
(4) बायोस्फेयर अर्थात् जैवमंडल जीवन का क्षेत्र है जो ऊपर के सभी क्षेत्रों, स्थल, जल और वायुमंडलों में फैला हुआ है।

 महाद्वीपों का बहाव

 महाद्वीपीय बहाव के सिद्धांत की कल्पना यह है कि महाद्वीप, सागर में अति विशाल जहाज की तरह तैरते हैं।     35 करोड़ वर्ष पूर्वः प्रारम्भिक भूगर्भ काल के समय में उत्तर में लौरेशिया के बड़े-बड़े महाद्वीपीय समूह और दक्षिण गोंडवानालैंड के द्वीप समूह एक दूसरे की तरफ बहने लगे। ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोप के अधिकांश भाग भूमध्यवर्ती अक्षांश में पड़ गये। 
    20 करोड़ वर्ष पूर्वः उत्तर भूगर्भ काल में लौरेशिया और गोंडवानालैंड आपस में टकराये, जिसके कारण विशाल महाद्वीप पैंजिया और विशाल सागर (जिसे पंथालासा कहा जाता है) का जन्म हुआ। ये अन्तिम ट्रायसिक युग तक विशाल रूप में सुरक्षित बचे थे। उस क्षेत्र में एक विशाल खाड़ी बन गयी, जिसे टेथिस सागर कहा जाता है। उसे आज हम भूमध्य सागर और एल्पाइन हिमालयन पर्वत श्रृंखला के नाम से जानते हैं। 
      5 करोड़ वर्ष पूर्वः आदिनूतन काल में पैंजिया का विखण्डन चरम सीमा पर पहुंच गया। महाद्वीप और महासागर उस रूप में आ गये जैसे आज दिखाई देते हैं। अटलांटिक महासागर का विस्तार हुआ और टेथिस सागर संकरा हो गया, जबकि भारतीय महाद्वीप पृथक हो गया और तैरते हुए उत्तर एशिया से टकरा गया। 
        वर्तमान युग मेंः पृथ्वी के अधिकांश महाद्वीप का उत्तर की तरफ खिसकना आज भी जारी है। आदिनूतन काल में हुए परिवर्तन के कारण अटलांटिक महासागर का विस्तार जारी है। भारतीय महाद्वीपों का टकराव दोनों एशियाई द्वीप समूहों और अंटार्कटिका से होकर आस्ट्रेलिया से अलग हो रहा है।


 प्लेट विवर्तनिकी 

महाद्वीपीय विस्थापन के सिद्धान्त का समर्थन करते हुए भू-विज्ञानियों ने 19 वीं सदी के छठे दशक में भू-विज्ञान की एक नवीन संकल्पना प्लेट विवर्तनिकी को जन्म दिया। प्लेट विवर्तनिकी में पृथ्वी की हलचल के फलस्वरूप बनी चट्टानों का अध्ययन होता है जो प्लेट के रूप में हैं। इस संकल्पना ने भूविज्ञान के अध्ययन में उसी प्रकार से क्रान्तिकारी परिवर्तन किया जैसा कि खगोलिकी में कापरनिकस सिद्धान्त ने किया था। कापरनिकस सिद्धान्त ने पृथ्वी और सौर प्रणाली के संबंध में हमारे विचारों में आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया। प्लेट विवर्तनकी ने स्वयं पृथ्वी के विषय में हमारी संकल्पना में महान परिवर्तन किया। इसने प्रमाणित कर दिया कि पृथ्वी स्थिर नहीं है, बल्कि गत्यात्मक है और सही मायने में जीवित है। जीविद्वीपीय विस्थापन का सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि महाद्वीप विशालकाय जहाजों की तरह सागर में चलते हैं। प्लेट विवर्तनिकी हमें बताती है कि केवल महाद्वीप ही गतिशील नहीं है बल्कि महासागर भी गतिशील हैं। इसका कारण यह है कि पृथ्वी की शीर्ष पपड़ी (जैसा कि हमारा विचार है) ग्रेनाइट या बेसाल्ट का अखंडित, खोल नहीं है, बल्कि प्लेट कहलाने वाले बहुत-से कठोर खंडों का मोजेक है। इन प्लेटों में पृथ्वी की ठोस ऊपरी पपड़ी ही शामिल नहीं है, बल्कि उसके नीचे का सघन मैंटल भी उसी में आता है। उनकी औसत मोटाई 100 कि.मी. है। ये सब पृथ्वी के एस्थिनोस्फीयर नामक ऊपरी मैंटल पर तैर रहे हैं और वृहदाकार जहाज़ों की तरह महाद्वीपों एवं महासागरों को अपनी पीठ पर लादकर ले जाते हैं। ये सभी प्लेटें एक-दूसरे के सापेक्ष में निरंतर गतिशील हैं। महाद्वीपीय विस्थापन और प्लेट विवर्तनिकी के बीच विभेद करने में भ्रांति इस मान्यता से है कि महाद्वीप और प्लेटें समानार्थी हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। महाद्वीप प्लेटों के एक भाग का ही निर्माण करते हैं जबकि आसपास के महासागर प्लेटों के शेष भाग हैं। महाद्वीप ही अकेले विस्थापन नहीं करते। विस्थापन प्लेटों का होता है जिनमें महाद्वीप एवं महासागर दोनों सम्मिलित हैं। इसलिए अब हम महाद्वीपीय विस्थापन के बजाय प्लेटों की गतिशीलता की चर्चा करते हैं। 

स्थलमंडल 

स्थलमंडल पृथ्वी का ऊपरी पटल है जिसके ऊपर हमारे महाद्वीप एवं समुद्री भाग स्थित हैं। महाद्वीपीय क्षेत्रों में यह सर्वाधिक मोटा है जहां इसकी औसत मोटाई 40 कि.मी. है। समुद्री भागों में यह अत्यधिक पतला है जहां इसकी अधिकतम ऊंचाई 10 से 12 कि.मी. तक हो सकती है। यह पृथ्वी के संपूर्ण आयतन का लगभग 1 प्रतिशत और उसके कुल द्रव्यमान का 0.4 प्रतिशत है। यद्यपि स्थलमंडल में तकनीकी दृष्टि से भूमि-भाग और समुद्री तल दोनों को ही शामिल किया जाता है, फिर भी अक्सर इसका प्रयोग केवल भूमि-तल दर्शाने के लिए ही किया जाता है। इस दृष्टि से स्थलमंडल संपूर्ण पृथ्वी का केवल चौथाई भाग है। शेष तीन चौथाई भाग समुद्र ने ले लिया है। भूमि तल पर चट्टानी दृश्यांश वाले भागों को छोड़कर, शेष संपूर्ण भाग बालू या मृदा है। समस्त बालू और अधिकांश मृदा जो हमें आज दिखाई पड़ते हैं, वह प्राचीन चट्टानों से उत्पन्न हुए हैं। मूल-रूप से स्वयं चट्टानें गलित मैग्मा से बनी थीं जो पृथ्वी के भीतरी भाग से फूटकर निकला था। भूवैज्ञानिक दृष्टि से कहा जाए तो वे सभी पदार्थ जिनसे पृथ्वी पटल का निर्माण हुआ है, चट्टानें हैं, चाहे वे ग्रेनाइट गोलाश्म हों, दाह्य कोयला हो, चिकनी मिट्टी हो या बालू-कंकड़ के अदृढ़ खंड हों। स्थलमंडल को बारह जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया जाता है।

 पर्वत 

पर्वतों को पारंपरिक ढंग से उनकी उत्पत्ति की रीति के अनुसार चार प्रकारों में विभाजित किया जाता है' बलन पर्वत, ब्लॉक पर्वत, ज्वालामुखीय पर्वत और अवशिष्ट पर्वत । बलन पर्वतों के उठने का कारण यह है कि प्लेटों के दबाव के जरिए उनके भीतर की चट्टानें मुड़ गई और सिलवटदार हो गईं। जिस प्रकार से एक मेजपोश को जब मेज के साथ-साथ खींचा जाता है  तो उसमें सिलवटें पड़कर तहें बन जाती हैं, उसी प्रकार पृथ्वी की पपड़ी की चट्टानें पार्श्विक दबाव पड़ने पर बलन पर्वत बन जाती हैं। हमारी समस्त बड़ी पर्वत प्रणालियां प्लेटों के संघटन से ही निर्मित हुई हैं। ऐसे ही संघटन क्षेत्र के कारण हिमालय पर्वत का आविर्भाव हुआ। इसी प्रकार ऐंडीज (दक्षिणी अमेरिका), राकी पर्वत (उत्तरी अमेरिका) और आल्प्स (यूरोप) का उदय हुआ। हिमालय, ऐंडीज, राकी और आल्प्स कम उम्र के पर्वत हैं। जिन पर्वतों को प्राचीन वलन पर्वत कहा जाता है, वे पनगेय का निर्माण करने हेतु महाद्वीपीय राशियों के एकत्रित होने के काफी पहले विस्थापन-पूर्व युग में निर्मित हुए थे। प्राचीन वलन पर्वतों में यूरोप का पेनाइन्स, अमेरिका का अपालाचिपन्स और भारत के अरावली पर्वत हैं। ब्लॉक पर्वतः दरारों या भ्रंशों में पृथ्वी की ऊपर की गतियों के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया। जब इस प्रकार पृथ्वी का ऊर्ध्व संचलन होता है, दो निम्न तुंगों के बीच के उन्नत क्षेत्र उसी रूप में रह जाते हैं और वे उच्च क्षेत्र, ब्लॉक पर्वत प्राय इतने ढालू होते हैं कि इन पर चढ़ना मुश्किल होता है, जैसे फ्रांस में वसिगेज पर्वत और पश्चिमी जर्मनी में ब्लैक फारेस्ट पर्वत । ज्वालामुखीय पर्वतः ज्वालामुखीय विस्फोट होने  से जो पदार्थ बाहर निकलता है, वह छिद्र या विवर के आसपास इकट्ठा हो जाता है और एक पर्वत का निर्माण करता है। जापान में फ्यूजीयामा, इटली में वेसूवियस और एंडीज (दक्षिणी अमेरिका) में चिम्बोराजो और कोटोपाक्सी इसी प्रकार के पर्वतों के उदाहरण हैं। 

अवशिष्ट पर्वतः कुछेक पर्वत इतनी गहराई तक विच्छिन्न और मौसम के प्रभाव तथा नदियों के क्रिया-कलाप से प्रभावित होते हैं कि वे कंकाल मात्र रह जाते हैं। न्यूयार्क के कैट्सकिल पर्वत इस प्रकार के पर्वतों के विशिष्ट उदाहरण हैं। 

भूकंप 

भूकंपनीयता की घनी पट्टी का विस्तार हिमालय की सर्वोच्च ऊंचाई वाली चोटियों के समानान्तर है। यहां भूकंप भारत के यूरेशिया के नीचे धंसने के कारण भू-पर्पटी (earth crust) की 20 मी तक की गहराई से आते हैं। विशाल भूकंप तब आते हैं जब पृथ्वी के ऊपरी खोल में 20 किमी गहराई से प्रत्यास्थ ऊर्जा (Elastic Energy) सहसा बाहर निकलती है। अधिकांश ऊर्जा का विमोचन भ्रंशित शैलों के 6 से 10 मी. या कभी 20 मी. तक के विसर्पशा (खिसकाव) के कारण उत्पन्न भूकंपीय तरंगों के रूप में होता है। तरंगित होकर जमीन हिलने-डुलने लगती है जिसका विनाशकारी प्रभाव हम पृथ्वी की सतह पर अनुभव करते हैं। भारतीय महाद्वीप के एशिया के साथ जुड़ने के बाद भी भारतीय प्लेट 50 मिमी प्रतिवर्ष की रफ्तार से उत्तर की ओर अभिसरित हो रही है। यह प्रक्रिया अभी कई लाख वर्षों तक चलती रहेगी। ऐसा अनुमान है कि हिमालय रूपी भारत एशिया प्लेटों की टकराव सीमा बड़े पैमाने के भूकंपों द्वारा भविष्य में आठ या दस बार और फटेगी। पश्चिम से पूर्व तक 2,400 कि मी लंबाई की हिमालयी अधिक्षेपित चाप निरन्तर सक्रिय है जिससे कुछ सौ वर्षों तक बड़े भूकंप आने की आशंका है। 

हिमालय में भूकंप
 हिमालय पर्वत श्रृंखला एक साथ एक ही समय में भूकंपों द्वारा नहीं फटी। क्योंकि वह अनेक भ्रंशों द्वारा कई भागों में विभाजित है। भूकंपों के विश्लेषण से पता चला है कि हिमालय के उन भागों में भविष्य में भूकंपों द्वारा क्षति की आशंका है जहां वह पिछले 30 या अधिक वर्षों से नहीं आए। अंशों के कारण यह पर्वत श्रृंखला एक ही समय, एक साथ नहीं फट सकती। इस कारण बड़े भूकंप इस क्षेत्र में एक ही पुनरावृत्ति अवधि में आएंगे पर एक साथ कभी नहीं।

 मरुस्थल 

मरुस्थल पृथ्वी की सतह का वह हिस्सा है जहां पर सूखे के कारण जीवन मुश्किल है। मरुस्थल को तीन भागों में विभक्त किया गया है' 1. उष्णकटिबंध (गर्म) उदाहरणार्थ - सहारा, अरबियन, अटाकामा, आस्ट्रेलियन एवं थार मरुस्थल। 2. मध्य याम्योत्तर (शीतोष्ण) उदाहरणार्थ गोबी मंगोलिया, ग्रेट बेसिन (संराअ.) पेंटागोनिया (अर्जेंटाइना) और तुर्किस्तान मरुस्थल 3. उच्च याम्योत्तर (ध्रुवीय/ठंडे) उदाहरणार्थ अंटार्कटिका। मरुस्थल में अधिकतम तापमान 58 डिग्री सेल्सियस तक और न्यूनतम तापमान-88 डिग्री सेल्सियस तक होता है यहां औसत वार्षिक वर्षा 250 मि. मी. होती है। 

द्वीप
 द्वीप काफी विशाल भूभाग में व्याप्त हैं। छोटे द्वीपों की संख्या हजारों में है। द्वीप मोटे तौर से तीन प्रकार के होते हैं महादेशीय, महासागरीय और प्रवालीय। 

महादेशीय द्वीप वे हैं जो कि महादेशीय उपतटों से उदित होते हैं, यथा-ब्रिटिश द्वीप समूह, या न्यूफाउन्डलैंड। इन द्वीपों की भूवैज्ञानिक संरचना उन महाद्वीपों के समान होती है जिनसे ये संबंधित होते हैं। महासागरीय द्वीप वे हैं जो महासागर के अन्तःस्थल से उभरते हैं। उनकी भूवैज्ञानिक संरचना का निकटतम तटों से कोई संबंध नहीं होता। वे अधिकांशतः अंतःसमुद्री पर्वतों या अंतःसमुद्री ज्वालामुखियों के शीर्ष होते हैं। उदाहरणार्थ, असेसन और ट्रिस्टान दा कुन्बा मध्य अटलांटिक पर्वत श्रेणी से निकले हैं जबकि सेंट हेलेना और टेनेरिफ समुद्री ज्वालामुखियों से बने हैं।

 प्रवालीय द्वीप प्रवाल पालिप कहे जाते हैं और ये समुद्री जीवों की रचना हैं। ये समुद्री जीव समुद्र में उपनिवेश बना कर उसमें जमा हो जाते हैं। जब जीव मृत हो जाते हैं तो चूना पत्थर जैसे तत्व के बने उनके कंकाल एक बड़ा गुच्छा बना देते हैं जिनमें से कुछ पानी के ऊपर उभर आते हैं। इस प्रकार के प्रवाल की विशिष्टता शैल भित्ति का निर्माण करने में है। शैल भित्ति का निर्माण करनेवाले प्रवाल गर्म उष्ण कटिबंधीय सागरों में फूलते-फलते हैं। क्वीन्सलैंड (आस्ट्रेलिया) के समुद्र तट के समानांतर 1,920 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली द ग्रेट बैरियर रीफ इसी प्रकार से निर्मित सबसे बड़ी ज्ञात प्रवाल भित्ति है। छिछले पानी के केन्द्रीय समुद्रताल (लेगून) सहित निम्न वृत्ताकार द्वीप प्रवाल वलय कहलाते हैं। प्रवाल द्वीप वलय के दो भाग होते हैं - केन्द्रीय समुद्री भाग (जलीय क्षेत्र) और इर्द-गिर्द की भित्ति भूमि। मध्य प्रशांत महासागर के मार्शल द्वीप समूह में कवाजेलिन तथा केन्द्रीय प्रशांत महासागर में लाइन द्वीप समूह में क्रिसमस द्वीप इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

 जलमंडल 

 अनुमान है कि जलमंडल में लगभग 1,46,00,00,000 में घन कि.मी. पानी है। इसमें से 97.3 प्रतिशत महासागरों और अंतर्देशीय सागरों में है। शेष 2.7 प्रतिशत हिम नदों, और बर्फ टोपों, मीठे जल की झीलों, नदियों और भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है। महासागर पृथ्वी के कुल धरातलीय क्षेत्रफल के 70.8 प्रतिशत भाग को आच्छादित किए हुए हैं और इनमें 144.5 करोड़ घन कि.मी. पानी है। सौर ताप महासागर के जल को गतिशील रखता है। भूमध्य रेखीय क्षेत्र में सूर्य पानी को गर्म कर देता है जिससे यह फैलकर कुछ इंच ऊपर उठ जाता है। महासागरों में सबसे बडा. और सबसे पुराना प्रशान्त महासागर है। पृथ्वी के क्षेत्रफल के 35.25 प्रतिशत भाग पर यह फैला है। इसकी सर्वाधिक चौड़ाई 16,880 किलोमीटर और सर्वाधिक गहराई 11,516 मीटर (मिंडानाओ डीप) है। इसमें द्वीपों का सर्वाधिक संगुटीकरण है जो मोटे तौर पर तीन समूहों में है - माइक्रोनेशिया, मेलानेशिया और पालीनेशिया। 

अटलांटिक महासागर दूसरा सबसे बड़ा महासागर - पृथ्वी के क्षेत्रफल के 20.9 प्रतिशत भाग को घेरे है। इसकी सर्वाधिक गहराई 8,381 फीट (मिलवाकी डीप) है।

 हिंद महासागर - तीसरा सबसे बड़ा महासागर भारत में कन्या कुमारी से दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका तक फैला है। यह पृथ्वी के कुल धरातलीय क्षेत्रफल के 14.65 प्रतिशत भाग में है। इसकी सर्वाधिक गहराई 7,725 मीटर (प्लैनेट डीप) है। आर्कटिक सही रूप से महासागर नहीं है। इसमें को जलपोत नहीं चल सकते हैं। यह उत्तरी ध्रुव के चारों ओर फैला है और शीतकाल में पूर्णतया बर्फ से जमा और वर्ष के शेष भाग में अपने ही हिम से ढका रहता है। फिर भी, इसका पृथक अस्तित्व है और 1 करोड़ 30 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक का इसका क्षेत्रफल इसे महासागर कहने के लिए बाध्य करता है।   
         महासागरों की संख्या चार है, सागरों की संख्या सात है। विख्यात सात समुद्रों की रचना पहले तीन महासागरों को भूमध्य रेखा के साथ-साथ उत्तर और दक्षिण में विभाजित करने और उनमें आर्कटिक को जोड़ने से हुई है। इस प्रकार उत्तरी प्रशांत, दक्षिणी प्रशांत, उत्तरी अटलांटिक, दक्षिणी अटलांटिक, उत्तरी हिंद, दक्षिणी हिंद और आर्कटिक सागर हैं। 

नदियाँ 
विश्व की सबसे लंबी दो नदियाँ हैं दक्षिणी अटलांटिक सागर तक बहनेवाली अमेजन (अमेजोनाज) और भूमध्य सागर तक बहनेवाली नील (बहरे-एल-नील)। इनमें से कौन सबसे अधिक लंबी है, यह साधारण माप का मामला न होकर परिभाषा का मामला है। वर्ष 1969 में मापी गई अमेजन नदी की लंबाई 6,447 किलोमीटर है। बाद की गणना में इसे 6,750 किलोमीटर पाया गया। बेल्जियम के एम. डेवराय की माप के अनुसार नील नदी की लंबाई 6,670 कि.मी. है। यदि हम अमेजन के निम्न आंकडे. 6,447 कि.मी. को मानें तो नील नदी 223 किलोमीटर अधिक लंबी है। यदि दूसरे आंकड़े 6,750 कि.मी. पर विचार किया जाए तो अमेजन 80 किलोमीटर अधिक लंबी है। अमेजन में सर्वाधिक लंबा 3,700 कि.मी. नौगम्य जल क्षेत्र है। इसका मुहाना विश्व में सबसे बड़ा 70 लाख वर्ग किलोमीटर का है। इसकी लगभग 15,000 सहायक नदियां हैं, सबसे लम्बी सहायक नदी मेडीरा की लम्बाई 3,200 किलोमीटर है। 

वायुमंडल
 वायुमंडल पृथ्वी की रक्षा करने वाला रोधी आवरण है। यह सूर्य के गहन प्रकाश और ताप को नरम करता है। इसकी ओजोन (03) परत सूर्य से आने वाली अत्यधिक हानिकर पराबैंगनी किरणों को अधिकांशतया सोख लेती है और इस प्रकार जीवों की विनाश से रक्षा करती है। वायुमंडल गुरुत्व द्वारा पृथ्वी से बंधा हुआ है। वायुमंडल में विभिन्न गैसें और जलवाष्प कण होते हैं। पृथ्वी से 50 किलोमीटर की दूरी तक वायुमंडल में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन, 21 प्रतिशत ऑक्सीजन (02) और निम्न प्रतिशत में आर्गन, कार्बन डाइ-आक्साइड, निआन, हीलियम और मीथेन इसी क्रम से विद्यमान हैं। तीस मील से ऊपर, वायुमंडल परमाण्वीय ऑक्सीजन (01), ओजोन (03), हीलियम और हाइड्रोजन से बना हुआ है। निम्न वायुमंडल में लगभग 12 किलोमीटर तक 0.0 से लेकर 1 प्रतिशत तक की सांद्रता में जलवाष्प है। जिस जलवाष्प का पृथ्वी से वाष्पीकरण होता है, उसी से बादल बनता है। वे अत्यधिक सूक्ष्मदर्शीय आकार की नन्हीं सी बूदें होती हैं जो अत्यधिक हल्की होने के कारण वर्षा के रूप में नीचे गिरने में अक्षम होती हैं। इसलिए वे वायु तरंगों पर तैरती रहती हैं जब तक कि वे द्रवित होकर वर्षा के रूप में नहीं गिरतीं। बादलों के अपेक्षाकृत कमजोर वज्रपात की अनुक्रिया में पृथ्वी अत्यधिक सपुंजित, वज्रपात बादल तक भेजती है। जिसके फलसवरूप तड़ित उत्पन्न होता है। तड़ित के समय तापमान लगभग 10,0000 से. तक तापदीप्त हो जाता है। इसी तापदीप्त वायु को हम तड़ित दमक के रूप में देखते हैं। ताप से अचानक हवा फैल जाती है जो ताप के समाप्त होने पर फिर शीघ्रता से संकुचित होती है। इस अचानक फैलाव और संकुचन से मेघ गर्जना उत्पन्न होती है। जैसे-जैसे हम ऊपर चलते जाते हैं, वायुमंडल का स्वरूप और संघटन बदलता जाता है। ऊंचाई के अनुसार व्यवस्थित चार महत्वपूर्ण मंडल हैं:
 1. क्षोभ सीमा सहित क्षोभ मंडल; 
2. समताप सीमा सहित समताप मंडल; 
3. मध्य सीमा सहित मध्य मंडल; और 
4. आयन मंडल या बाह्य वायुमंडल।

 मानसून 

मानसून वायुमंडलीय चक्र से संबंधित है जो मौसम के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। मानसून की व्याख्या विभिन्न सिद्धांतों से की जाती है, जैसे (अ) थल और जल विभिन्न ऊर्जा, (ब) उष्णकटिबन्धीय  और अन्तर उष्णकटिबन्धीय व हवा क्षेत्रों का मौसमी - परिवर्तन, (स) त्वरित, ऊपरी वायुमंडलीय व हवा की गतियां और तेज गर्मी, (द) एल निनो ला निना प्रभाव । भारतीय मानसूनः सच्चे अर्थों में मानसून को - हिन्द महासागर के चारों तरफ देखा जा सकता है। संसार की मानसून व्यवस्था की तुलना में 
       भारतीय मानसून की व्यवस्था, क्रियाशीलता का केन्द्र बिन्दु, वायु राशि और गति पूर्णतया भिन्न है। देश का प्रायद्वीपीय आकार दक्षिणी-पश्चिमी मानसून को बांट देता है और मानसून बगल से उत्तर की तरफ अरब सागर शाखा की तरफ चला जाता है और पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी की तरफ चला जाता है। 
     वर्षाः जब दक्षिणी-पश्चिमी मानसून 1 मीटर  सामान्य वर्षा पूरे देश के मैदानों में करता है तब  इसे सामान्य वर्षा कहा जाता है। लेकिन कई स्थान ऐसे हैं जैसे पश्चिमी घाट के हवा क्षेत्र में 100-250 सेन्टीमीटर तक वर्षा होती है। मेघालय की खासी- जयन्तिया पहाड़ी के ढलान में संसार की सर्वाधिक  965 सेन्टीमीटर वर्षा प्राप्त होती है। 'अनावृष्टि' का प्रयोग तब किया जाता है जब देश में 85% या इससे कम वर्षा होती है। यह तभी होता है जब दक्षिण- पश्चिमी मानसून बहुत कमजोर पड़ जाए। 


भारतीय मानसून की विशेषताएं: 
1. भारतीय उपमहाद्वीप की उष्णकटिबन्धीय स्थिति। 
2. हिमालय, उत्तर से शीत हवाओं का अवरोधक है और मध्य एशिया के उच्च दबाव क्षेत्र की सूखी हवाओं को रोकता है। यह मात्र दक्षिणी-पश्चिमी मानसून को तिब्बती पठारों से पार करने से ही नहीं रोकता बल्कि उन्हें उत्तरी भारतीय क्षेत्रों में फैलाता भी है। 
3. भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र के उच्च और निम्न दबाव के कारण मानसून नियन्त्रित होता है। 4. गर्मी के कारण, तापक्रम बढ़ता है (उत्तर, पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम और मध्य भारत में 40 से 45°C तक तापक्रम होता है।) 
5. सर्वाधिक निम्न दबाव (700 एम वी तक नीचे)। यह उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में होता है जो हवा को हिन्द महासागर से अपनी तरफ खींचता है। 
6. मानसून बड़ी तेजी से अशान्त होकर पूरे भारत में फैल जाता है। 
7. अन्तर उष्ण कटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र उत्तरी भारत के मैदानों में स्थानांतरित हो जाता है। 
8. मानसून अपनी उच्चतम अवस्था में अपनी ताकत वायुमंडलीय दबाव से प्राप्त करता है जो हवा के क्षेत्र परिवर्तन के कारण उत्पन्न होता है। 
9. मानसून 20 मई से आरंभ होता है और 15 जुलाई तक पूरे देश में फैल जाता है। 
10. मानसून उत्तरी क्षेत्रों से पहली सितंबर, मध्य भारत में सितंबर के अंत में और दक्षिणी भाग में नवंबर के प्रथम सप्ताह में पूर्ण रूपेण समाप्त हो जाती है। इसे उत्तरी-पूर्वी मानसून कहा जाता है। 
11. मानसून की वापसी अपने साथ तूफान जैसी मुसीबतें भी लाती है जिससे जन और धन की बड़े पैमाने पर हानि होती है। ऐसा अधिकतर भारत के पूर्वी तट पर होता है। 

जीवमंडल
 जीवमंडल जीवन को आधार प्रदान करता है। अनुमान है कि जीव-मंडल में शैवाल, फंगस और काइयों से लेकर उच्च श्रेणियों के पौधों की साढ़े तीन लाख जातियां हैं तथा एककोशीय प्राणी प्रोटोजोआ से लेकर मनुष्य तक एक करोड़ दस प्रकार की प्राणि-जातियां इसमें सम्मिलित हैं। जीवमंडल इन सभी के लिए आवश्यक सामग्री जैसे प्रकाश, ताप, पानी, भोजन तथा आवास की व्यवस्था करता है। जीव मंडल या पारिस्थितिक व्यवस्था (जैसा कि यह सामान्यतया जानी जाती है) एक विकासात्मक प्रणाली है। इसमें अनेक प्रकार के जैविक और भौतिक घटकों का संतुलन बहुत पहले से ही क्रियाशील रहा है। जीवन की इस निरंतरता के मूल में अन्य संबंधों का एक सुगठित तंत्र काम करता है। वायु, जल, मनुष्य, जीव-जंतु, वनस्पति एवं प्लवक, मिट्टी और जीवाणु ये सब जीवन-धारण प्रणाली में अदृश्य रूप से एक दूसरे से गुंथे हुए हैं। यह व्यवस्था पर्यावरण कहलाती है। सौर ऊर्जा जीवमंडल को बनाए रखती है और जीवमंडल को मिलने वाली कुल ऊर्जा का 99.88 प्रतिशत भाग इसी से प्राप्त होता है। सूर्य सतत् रूप से सौर-ताप के रूप में अपनी ऊर्जा को उड़ेलता रहता है। जीवमंडल में सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रकाश- रासायनिक क्रिया-कलाप, पौधों में होने वाला प्रकाश संश्लेषण है। प्रकाश संश्लेषण एक जटिल प्रक्रिया है। इसमें ऑक्सीकारक और अपचायक कार्बन डाई ऑक्साइड और पानी के अणुओं से कार्बोहाइड्रेट और ऑक्सीजन उत्पन्न करने में पौधों की सहायता करते हैं। पौधे ऑक्सीजन बाहर निकालते हैं, लेकिन उस कार्बोहाइड्रेट को बनाए रखते हैं जो ऊर्जा में बदल जाते हैं और रासायनिक बांड के रूप में संचित हो जाते हैं, जिसमें एडीनोसिन ट्राइफास्फेट  (एटीपी) उल्लेखनीय है जो सभी जीवित कोशिकाओं के लिये आधारभूत ऊर्जा का काम करता है।

 ऊष्मा चक्र
 ऊष्मा जीवन की प्राथमिक जरूरतों में से एक है। इसकी आपूर्ति सौर विकिरण द्वारा होती है। गणना की गई है कि पृथ्वी की कक्षा तक (वायुमंडल के ठीक ऊपर) पहुंचने वाला सौर ताप प्रति मिनट प्रति वर्ग सेन्टीमीटर लगभग दो कैलोरी होता है। लेकिन पृथ्वी वायुमंडल के शीर्ष तक पहुंचने वाले विकिरण का आधे से कम भाग प्राप्त कर पाती है। वायुमंडल तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा में से लगभग 47% पृथ्वी को प्राप्त होती है। उष्मा के अवशोषण और पुनः विकिरण के बीच संतुलन का नियमन मुख्यतया वायुमंडल में जलवाष्प द्वारा होता है। वायुमंडल में लगभग 0.001 प्रतिशत जल है। यह जल ऊष्मा के अवशोषण और विकिरण के बीच संतुलन बनाए रखने के अलावा, आवर्तन को नियंत्रित रखता है और हमारी जलवायु संबंधी दशाओं का निर्धारण करता है।


 कार्बन चक्र 

जीवमंडल में कार्बन तथा उसके यौगिकों का जटिल मिश्रण, निर्माण, रूपांतरण तथा वियोजन की हर स्थिति में विद्यमान है। व्यावहारिक रूप से सभी जैव पदार्थ प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में उत्पन्न होते हैं। पौधे कार्बन डाइऑक्साइड और जल को कार्बोहाइड्रेट में बदलने के लिए सूर्य की विकिरण ऊर्जा का उपयोग करते हैं और इस प्रक्रिया में वायु से कार्बन डाइऑक्साइड खींचते हैं और जल को विभक्त करके हाइड्रोजन पाते हैं। जबकि पौधे प्रकाश संश्लेषण के दौरान कार्बन डाईऑक्साइड का अवशोषण करते हैं, वहीं सभी जीवित प्राणी सांस छोड़कर कार्बन डाइऑक्साइड का विमोचन करते हैं और मृत पदार्थ के अपघटन में बैक्टीरिया भी यही काम करते हैं। 

आक्सीजन चक्र 
ऑक्सीजन केवल जीवन को ही आधार प्रदान नहीं करती बल्कि जीवित तत्वों के अंदर व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण चौथाई भाग के लगभग परमाणुओं के इमारती खंड के रूप में आधारभूत भूमिका भी निभाती है। ऑक्सीजन चक्र को प्रभावित करने वाला घटक स्वयं मनुष्य है जो पृथ्वी में सबसे नवीन प्राणी है।
न और प्रौद्योगिकी - वह श्वसन की प्रक्रिया में ऑक्सीजन खींचता है कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालता है और इस प्रकार ऑक्सीजन का भंडार कम करके कार्बन - डाइऑक्साइड की आपूर्ति में वृद्धि करता है। इससे भी आगे बढ़कर वह अतिरिक्त ईंधनों को जलाता है और ऑक्सीजन आपूर्ति को और भी कम कर देता है। वह वनों को काटकर और उन पर शहर बसाकर प्रकाश संश्लेषण क्रिया को कम कर देता है। जिसका असर अब दिखाई दे रहा है। 

नाइट्रोजन चक्र 

भूमि पर 'वायुमंडलीय नाइट्रोजन' का स्थिरीकरण राइजोट्राफ नामक जीव करते हैं जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण को उत्प्रेरित करनेवाले एन्जाइम नाइट्रोजिनेस के संश्लेषण के लिए आनुवंशिक कूट रखते हैं। ये जीव मोटे रूप से दो वर्गों में रखे जा सकते है - सहजीवी और गैर-सहजीवी। सहजीवी राइजोट्राफ शिंबी जैसे पौधों की कुछेक प्रजातियों के सहयोग से क्रियाशील होते हैं। वे भूमि पर नाइट्रोजन स्थिरीकरण के सर्वाधिक भाग (83 प्रतिशत) का योगदान करते हैं। शेष (17 प्रतिशत) का योगदान करनेवाले गैर-सहजीवी एजेन्ट में नीले हरे शैवाल, ऑक्सीजन की अपेक्षा रखनेवाले वायुजीवी अवायवीय तथा बैक्टीरिया शामिल हैं। जीवमंडल द्वारा वांछित कुल वार्षिक नाइट्रोजन की मात्रा का अनुमान 105 करोड़ मीट्रिक टन लगाया जाता है। इसमें से डाइजोट्राफ 14 करोड़ मीट्रिक टन पूरा करते हैं। तड़ित् या अग्नि जैसे गैर-जै


 जल चक्र 
जल, जीवमंडल के प्रकार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह जीवन के सभी रूपों, पौधों, प्राणियों और मनुष्य के लिए आवश्यक है। जल चक्र में पेड़ों का बड़ योगदान है। हम अपनी नदियों और मीठे पानी की झीलों और अवमृदा में समाविष्ट जल के छोटे भंडार - एक प्रतिशत से कम - पर निर्भर हैं। क्योंकि इस भंडार में नुकसान न हो और वर्षा का पानी को बाढ़ के रूप लेने से बचाने में पेड़ों की जड़ों का बहुत बड़ा योगदान होता है। पानी का यह छोटा भंडार चलते जल के इससे भी छोटे स्टाक 0.01 प्रतिशत द्वारा फिर से भरा जाता है जो जलवाष्प के रूप में वायुमंडल में प्रवाहित रहता है और जिसका अधिकांश भाग वर्षा के रूप में पृथ्वी पर गिरता है। जीवमंडल का जल चक्र वाष्पन व वर्षण के अन्योन्य विनिमय पर निर्भर करता है।



चन्द्रमा 

चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र विशिष्ट उपग्रह है क्योंकि पूरे सौर मंडल में यही एक उपग्रह है जो सामान्य उपग्रह से बहुत बड़ा है। प्रायः सभी उपग्रह अपने मूल ग्रह के आकार का आठवां भाग होते हैं जबकि चन्द्रमा पृथ्वी का चौथाई है। चन्द्रमा का व्यास 3,475 किलोमीटर है। परन्तु इसकी सतह अटलांटिक महासागर की आधी जितनी भी नहीं है। इसलिए इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के छठे भाग के बराबर है। चन्द्रमा की पृथ्वी से अधिकतम दूरी 4,06,000 किलोमीटर और न्यूनतम दूरी 3,64,000 किलोमीटर है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर 27.5 दिन (27 दिन 7 घंटे 43 मिनट और 11.47 सेकंड) में और अपनी ही धुरी पर एक चक्कर इतने ही समय में लगाता है। हमें दिखाई देने वाला चन्द्रमा का चमकने वाला भाग पहाड़ों और ऊंचे पठारों का है जो सूर्य से प्रकाश पाते हैं। गहरा दिखने वाला भाग नीची भूमि है जिसको कभी समुद्र समल्ला गया था और उसी के अनुसार उसके नाम भी दिए गए थे, यद्यपि चन्द्रमा में पानी नहीं है। उल्का नक्षत्रों से होने वाले दाब के कारण इसमें गड्ढे बने हैं। इन गर्तों का आकार अलग-अलग है। समुद्रों की कमी को पूरा करने के लिए चन्द्रमा में ऊंची-ऊंची चोटियों वाले पहाड़ हैं जिनमें से अधिकांश 6000 मीटर तक ऊंचे हैं। इनमें सबसे ऊंचा है लिवनिज पहाड़ जो चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास है और जिसकी ऊंचाई 10,660 मीटर है यानी एवरेस्ट से भी ऊंची। चन्द्रमा पर वायुमंडल नहीं है क्योंकि इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति गैसों को बनाए रखने में असमर्थ है। इससे बड़ी विचित्र घटनाएं होती हैं। वहां कोई संध्या या गोधूलि-वेला नहीं, दिन एकाएक निकलता है क्योंकि ऐसा कोई वायुमंडल नहीं है जो सूर्योदय के पूर्व जल कर प्रकाशित हो। चन्द्रमा में कोई ध्वनि भी नहीं है क्योंकि ध्वनि वायु के माध्यम से संचारित कम्पन है। चन्द्रमा पर तापमान बहुत अधिक होता है। दिन में तापमान 100° से. तक बढ़ जाता है और रात में घट कर - 180° से. हो जाता है। सूर्य के साथ-साथ चन्द्रमा भी पृथ्वी पर समुद्र में आने वाले ज्वार के लिये उत्तरदायी है। यह सूर्य की अपेक्षा अधिक निकट होने के कारण ज्वार पर अधिक प्रभाव डालता है। पृथ्वी तल तक पहुंचने के लिए चन्द्रमा के प्रकाश को केवल 1.3 सेकंड लगते हैं जबकि सूर्य की किरण को 8 मिनट 16.6 सेकंड। ज्वार के उठने के लिए अपेक्षित सौर एवं चन्द्र शक्तियों में अनुपात 11:5 का है। जुलाई 1969 में अपोलो-11 ने दो व्यक्तियों को चन्द्रमा की धरती पर उतारकर मानव की अन्तरिक्ष यात्रा में नया अध्याय खोला था। इसने मानव को चन्द्रमा की धरती पर उतरने की संभावना दी जिसे पुरानी पौराणिक कथाओं में असंभव माना गया था। अमरीका ने इस आरम्भिक सफलता को अपोलो-12, अपोला-14, 15, 16 और 17 के माध्यम से जारी रखा है। रूस ने लूना-16 (12 सितम्बर, 1970) और लूना-17 (19 नवम्बर, 1970) को बिना मानव के भेजा। लूना-16 ने चांद की मिट्टी के नमूने इकट्ठे किए और पृथ्वी पर 24 सितम्बर, 1970 को वापस आ गया। लूना- 17 अपने साथ चांद-बग्घी 'लूनोखोड-1' को ले गया जिसे चांद की धरती पर चलाया गया। चांद पर मानव के उतरने और इन सभी मानव संचालित तथा लूना जैसे बिना मानव के भेजे गए अन्तरिक्ष वाहनों ने चांद की पहेली को अब भी हल नहीं किया है। चांद की उत्पत्ति तथा पृथ्वी के साथ उसका संबंध-दम्पति, पुत्री, बहन अब भी प्रश्न बने हुए हैं। फिर भी अपोलो के अन्तरिक्ष यात्रियों द्वारा लाई गई पुरानी से पुरानी चट्टानों और मिट्टी के नमूनों ने ने स्पष्ट कर दिया है कि चांद भी उतना ही पुराना है जितनी पृथ्वी और यह लगभग 460 करोड़ वर्ष पूर्व बना था। चांद के रूप की सबसे अधिक उल्लेखनीय विशेषता उसकी सतह पर पाए जाने वाले गड्ढों की है। ये कई आकार के हैं- 1,000 कि.मी. व्यास के गोलाकार विशाल बेसिनों से लेकर कुछ मीटर व्यास वाले गड्ढे युगों से चली उल्का-तारों की वर्षा से बने हैं। 
      पहले-पहल अपोलो 11 और 12 जहां उतरे वह जगह थी मेर-क्षेत्र। यहां से मिली चट्टान पृथ्वी पर पाई जाने वाली ज्वालामुखी चट्टानों की तरह बेसाल्टी लावा है। आश्चर्यजनक बात तो इनमें टाईटेनियम की मात्रा का अत्यधिक प्रतिशत में पाया जाना है। पृथ्वी की आग्नेय चट्टानों में केवल एक प्रतिशत टाईटेनियम पाया जाता है जबकि चांद की चट्टानों में इससे दस गुना अधिक टाईटेनियम है। इस मेर बेसाल्ट में पृथ्वी के लिये अज्ञात धातु भी मिली है। इनमें से एक का नाम आर्मलकोलाइट रखा गया है और यह नाम अंतरिक्ष यात्रियों - आर्मस्ट्रांग, एल्ड्रिन और कोलिन्स के नाम पर रखा गया है। क्षेत्र का नाम है ट्रॅक्वि-लिटाइटिस ।