वैज्ञानिक डा. जेम्स सी वाटसन और 36 वर्षीय ब्रिटेन के वैज्ञानिक डा. फ्रासिंस एच क्रिक ने 2 अप्रैल 1953 को डी.एन.ए. की संरचना को रेखांकित किया था। प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका 'द नेचर' के संपादक को 900 शब्दों में लिखे गये संक्षिप्त पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया कि डी.एन.ए. एक द्वि- कुंडलीनुमा रचना है। बाद में डी.एन.ए. जैविक जगत का सर्वाधिक चर्चा का केन्द्र बिन्दु बन गया। डा. वाटसन और डा. क्रिक को इस खोज के लिये 1962 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार में उनके एक और सहभागी लंदन के किंग्ज कालेज के डा. मोरिस विल्किन्स थे जिन्हें डी.एन.ए अणु का एक्स-रे चित्र खींचने में सफलता मिली थी। पृथ्वी पर मानव जीवन के इतिहास में यह खोज महत्वपूर्ण घटना थी क्योंकि जीवन की मूल भूत इकाई न्युक्लिक एसिड पृथ्वी पर अरबों वर्षों से विद्यमान था। दो कुंडलियों की संरचना वास्तव में जीवन का कुंडलाकार सोपान है। यह दो कुंडलाकार सोपान ग्लूकोज और फास्फेट के होते हैं और इस सोपान के स्तंभ नाइट्रोजन क्षार के होते हैं जिन्हें प्यूरीन्स एवं पाइरीमिडिन्स कहते हैं। ये क्षार हाइड्रोजन बांड्स से बंधित होते हैं। प्यूरीन, एडेनाइन (ए) केवल थाइमीन (टी) से जोड़ा बनाते हैं। दूसरा प्यूरीन गुआनीन (जी) दूसरे पाइरीमिडिन माइटोसी (सी) से जोड़ा बनाता है। इस प्रकार के विशिष्ट रसायनिक टेप पर आधारित अक्षरों के जोड़े इंगित करते हैं कि अगर इन्हें एक श्रृंखला का क्रम दिया जाये तो दूसरी श्रृंखला का क्रम स्वतः ही निश्चित किया जा सकता है। डी.एन.ए की पुनरावृत्ति के दौरान, जो कि सभी जीवित प्राणियों के विकास और पुनर्जीवन की मूलभूत प्रक्रिया है, डी.एन.ए के दो तंतु गुच्छ अकुंडलित होकर दो अलग पट्टियों में हो जाते हैं और प्रत्येक पट्टी के सम्मुख नये तंतु गुच्छ बन जाते हैं जो विद्यमान के संपूरक होते हैं। डी.एन.ए की पुनरावृत्ति प्रक्रिया के दौरान यदि किसी त्रुटि से विकृति या परिवर्तन आ जाते हैं तो यह आने वाली पीढ़ियों में भी स्थानांतरित होते रहते हैं। डी.एन.ए की रचना के प्रकाश में आने से रासायनिक संदर्भ में जीन के क्रिया-कलापों को समझने का मार्ग प्रशस्त हुआ। डी.एन.ए. के द्वि- कुंडलीनुमा मॉडल ने जैव-रासायनिक विज्ञान में क्रांति ला दी और जैव रसायन, आनुवंशिकी व दवाओं के क्षेत्रों में आश्चर्यजनक विकास हुए।
जेनेटिक कोड
प्रजनन के माध्यम से मां-बाप के विशेष गुण उनकी संतानों में पहुंचते हैं। ये गुण माता-पिता और उनकी संतानों में विशेष प्रोटीन संरचनाओं द्वारा सुनिश्चित किये जाते हैं। हालांकि माता-पिता विभिन्न गुण निर्धारित करने वाले इन प्रोटीनों को संतानों में नहीं भेजते बल्कि उनके द्वारा प्रदत्त डी.एन.ए. का कूटबद्ध संदेश जो कि आनुवांशिक अणु है, यह कार्य सम्पन्न करता है।
डी.एन.ए के न्यूक्लियोटाइड क्षार में, जो एक विशेष क्रम में डी. एन. ए. में स्थित होते हैं, जीवों की आनुवंशिक सूचनाएं संग्रहीत रहती हैं। ये विशिष्ट रूप में पंक्तिबद्ध अमीनो अम्लों की लंबी पंक्तियों के रूप में स्थित प्रोटीन की विशिष्ट भाषा में कूटबद्ध किये जाते हैं। प्रोटीन की विशिष्टताएं अमीनो अम्लों की व्यवस्था के अनुसार एक क्रम में रहती है और इन क्रमों का निर्धारण डी.एन.ए में स्थित न्यूक्लियोटाइड द्वारा होता है। आर.एन.ए. और अन्य एन्जाइम प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जीन की कार्य विधियों की जैव-रासायनिक प्रकृति डी.एन.ए., आर.एन.ए. और जीव-पोषण के प्रोटीनों की सहभागिता को रेखांकित करती है। वाटसन और क्रिक के कार्य को डा. हरगोविंद खुराना, डा. नीरेनबर्ग और डा. हॉल्ली ने आगे बढ़ाया। 1960 में इन्होंने कोशिकीय रसायन शास्त्र को विभिन्न संदर्भों में डी.एन.ए. द्वारा नियन्त्रण की भूमिका का खुलासा किया। माता-पिता से उत्तराधिकार में जिन जीनों को हम प्राप्त करते हैं, वे हमारे आनुवंशिक विशेषकों का निर्धारण करते हैं। उत्तराधिकार में प्राप्त विभिन्न विशेषकों के लिये विभिन्न जीन उत्तरदायी होते हैं। इस मामले में प्रत्येक जीन अन्य जीनों से अलग स्वाधीन रूप से कार्य करता है। किसी विशिष्ट विशेषक हेतु जीन, गुण-सूत्रों में विशेष स्थानों पर पाये जाते हैं। गुण-सूत्र धागे के समान होते हैं और वे कोशिका के नाभिक में पाये जाते हैं। वे सदैव जोड़े में होते हैं। गुण-सूत्रों की संख्या स्पीशीज के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। उदाहरणार्थ फल-मक्खी में कुल मिला कर 4 जोड़े या 8 गुण-सूत्र, हरी मटर में 7 जोडे. (कुल 14), चुहिया में 20 जोड़े (40) और मानव में 23 जोड़े (46) गुण-सूत्र होते हैं। नाभिक दो प्रकार के न्युक्लीक अम्ल राइबो न्युक्लीक अम्ल (आर.एन.ए.) और डिआक्सी राइबो न्युक्लीक अम्ल (डी.एन.ए.) से भरा होता है। डी.एन.ए. गुण-सूत्र में केन्द्रित होता है, जबकि आर.एन. ए. न्युक्लिओली में संकेन्द्रित होता है। ये दोनों नाभिक में होते हैं। कोशिका के प्रधान प्रकार्यों में से एक प्रकार्य प्रोटीन का विनिर्माण करना है। मानव शरीर को विभिन्न प्रकार के हजारों प्रोटीनों की आवश्यकता होती है। इन सभी का निर्माण 20 अमीनो अम्लों से होता है। प्रत्येक जीन या डी.एन.ए. (तंतुगुच्छ के सुस्पष्ट खंड) में विशिष्ट प्रोटीन का निर्माण करने हेतु अनुदेश होते हैं। ये अनुदेश न्युक्लिओटाइड के नियमनिष्ठ अनुक्रम में कूट-संकेत में होते हैं। चौंकाने वाली है। किसी प्रोटीन के निर्माण के समय कोड में दिये गये अनुक्रम में अमीनो अम्ल आपस में जुड़ जाते हैं और उस विशेष प्रोटीन का संश्लेषण हो जाता है। प्रत्येक कोशिका, स्पीशीज़ के पूर्ण वयस्क का निर्माण करने की सामग्री और जानकारी से परिपूर्ण होती है। यदि किसी जीव के किसी अंग से कोई जीवित कोशिका उपलब्ध हो तो उस जीव का निर्माण संभव है। यही क्लोनिंग है। क्लोनिंग या एक पुंजन अलैंगिक प्रजनन है। इसमें संतान उत्पन्न करने के लिये नर और मादा के सम्मिलन की जरूरत नहीं होती, किंतु क्लोनिंग में नर से ली गई कोशिका केवल नर पैदा करेगी और मादा की कोशिका मादा। इस कमी का प्रतिकार इस तथ्य से हो जाता है कि संतान दाता की हूबहू प्रतिकृति होगी। जीन क्लोनिंग कोशिका के स्तर पर तथा आणविक स्तर पर हमारा शरीर किस प्रकार काम करता है, यह समझने में डी.एन.ए. की रचना की खोज से सहायता मिली। इससे रोगाणु के प्रतिरोध की आवश्यक क्षमता मनुष्य में बढ़ सकी। मलेरिया, कोद इन्फ्लुएन्जा तथा एड्स तक की रोकथाम के लिए विशेष प्रकार के वैक्सीन आज बाजार में उपलब्ध हैं। बैक्टीरिया जैसी कोशिका में किसी अन्य डी.एन.ए. के छोटे तंतु को प्रविष्ट करा देने पर उस तंतु को कई गुना बढ़ाने की प्रक्रिया जीन क्लोनिंग है। इस प्रक्रिया के अनुसार इन्सुलिन तथा कई प्रकार की अन्य दवाएं बनाने योग्य बैक्टीरिया की सृष्टि करने की क्षमता आज विज्ञान में है। औद्योगिक तथा दवायें बनाने वाली कई संस्थायें इस कारण से विकसित हुई हैं। भ्रूणों में अन्य जीन को क्लोन करके उससे मिश्रित जीनवाले जीव बनाये गये, यह विज्ञान की बहुत बड़ी उपलब्धि है।
डी.एन.ए की अंगुलि-छाप
जीनों की पहचान में डी.एन.ए. सहायक है, यह जीवों के कूट संकेत की जानकारी हमें देता है। अर्थात् हर एक जीव को अलग पहचानने का आधिकारिक तथा विश्वसनीय तरीका है। एक व्यक्ति में ही असाधारण रूप में दिखाई देनेवाले आनुवंशिक लक्षणों की पहचान के लिए अंगुलिछाप विद्या का प्रयोग होता है। दो अलग-अलग व्यक्तियों के डी.एन.ए का पार्श्वचित्र एक प्रकार का नहीं होता। 1985 में डा. अलक जफ्री नामक वैज्ञानिक ने इस विद्या को विकसित किया। करीब दो वर्षों के बाद ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में इसको वैधानिक स्वीकृत मिली। 1988 में डा. वी. के कश्यप (सेंट्रल फोरेंसिक प्रयोगशाला, हैदराबाद) ने भारत में सर्वप्रथम इसकी कानूनी स्वीकृति के लिए प्रयत्न किया। पितृत्व सिद्ध करने के लिए 1989 में तलशेरी (केरल) के एक प्रसिद्ध मुकद्दमे में यह रीति सफल हुई। मद्रास हाईकोर्ट के एक मुकद्दमे में इस तकनीक को अपनाया गया। सैद्धान्तिक रूप से डी.एन.ए. अंगुलिछाप तकनीक सरल जान पड़ने पर भी प्रयोग में बहुत जटिल है। अपराध संबंधी बातों में डी.एन.ए. अंगुलिछाप बहुत ही संवेदनशील तकनीक है। लेकिन शोध कार्य तथा बीमारी के निर्णय में आर.पी.एल.एफ. विश्लेषण बहुत ही साधारण तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। डी.एन.ए. परीक्षण में प्राप्त एक्स-किरण फिल्म को ऑटो रेडियोग्राफ कहते हैं। उसमें समूह रूप में दिखाई पड़नेवाले भागों को डी.एन.ए. छाप कहते हैं। यदि दो नमूनों के यू. एन.टी. आर. की लंबाई एक समान है तो वे एक ही व्यक्ति से प्राप्त हैं। इस प्रकार अधिकाधिक नमूनों के विश्लेषण से सही निर्णय पर पहुंचा जा सकता है।
जीन चिकित्सा
जीन चिकित्सा आनुवांशिकी इंजीनियरी की एक शाखा है। जीन चिकित्सा हेतु व्यक्ति की सफेद रक्त कोशिकाओं को शरीर से निकालकर उपचारित जीनों से युक्त कोशिका उसके शरीर में प्रविष्ट कराई जाती है। इसमें व्यक्ति के शरीर से श्वेत रक्त कोशिकाओं को अलग कर उनमें सामान्य जीनों को प्रविष्ट कराते हैं। निरोग अथवा बीमारी से मुक्त कोशिकाओं को व्यक्ति के शरीर में वापस सन्निविष्ट करते हैं। किसी विशेष जीन के अभाववाली बीमारियों में उन नष्ट जीनों को प्रदान करने का सिद्धान्त इस चिकित्सा में मौजूद है। कोशिका के केन्द्र में जीन को प्रविष्ट करा देना, जीन चिकित्सा की प्रथम प्रक्रिया है। इस हेतु विषाणुओं का इस्तेमाल किया जाता है। विषाणुओं के रोगकारक जीनों को हटाकर आवश्यक जीन लगाकर मानव कोशिका में स्थानांतरित कर दिए जाते हैं। विषाणुओं द्वारा कोशिका में प्रवेश करने तथा अपने साथ लाये गये आनुवंशिक पदार्थ को कोशिका के केन्द्र में प्रतिष्ठित करने पर जीन चिकित्सा की प्रक्रिया संपन्न हो जाती है। आज जीन चिकित्सा के अनेक नए आयाम आ गए हैं। अब तो जीन कोड से गर्भ में ही बच्चे की बीमारियों के बारे में जानकर उनका निदान किया जा सकता है।