छात्र जीवन का आदर्श
छात्र या विद्यार्थी ही किसी देश के भविष्य होते है, क्योकि ये ही देश को भावी पीढ़ी के अगुआ या प्रतिनिधि होते हैं। उन्हीं के हाथों में देश की बागडोर आनेवाली होती है। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक ही है कि किसी देश के विकास में यहाँ के छात्रों को भूमिका महत्त्वपूर्ण हो इसके साथ हो यह प्रश्न भी जुड़ा हुआ है कि किस प्रकार के छात्रों को भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है? छात्रों के वंश में जो दिग्भ्रमित युवक है, जो तरह- तरह को मानसिक ग्रंथियों, निराशा और बेकारों जैसी कुमवृत्तियों के शिकार हैं, जो थोथे प्रदर्शन, हिंसा, तोड़ फोड़ और अश्लील व्यवहार को नौतियों में विश्वास करते हैं. वैसे छात्र किसी भी देश के क्यों न हो, वहाँ के विकास में अपनी महत्त्वपूर्ण रचनात्मक भूमिका अदा नहीं कर सकते। कारण उनके पास न तो ज्ञान को पूंजी है और न चरित्र को, न अपनी संस्कृति और गौरवमयी परम्पराओं का ज्ञान है और न वर्तमान समस्याओं और आने वाले भविष्य का। ऐसे तथाकथित छात्रों को संख्या अपवादत: हो है, यद्यपि राजनीतिक दुष्चक्र के प्रभाव से यह निरन्तर बढ़ती जा रही है। हमारे देश में छात्रों के समानान्तर दो और भी शब्द है विद्यार्थी और शिष्या इन सबमे 'छार' शब्द का विशेष अर्थ है – शील जिसका छत्र या आवरण हो, वह छात्र कहलाता है। विद्यार्थी का अर्थ है 'विद्या या ज्ञान की प्राप्ति हो जिसका चरम अर्थ या लक्ष्य हो।' शिष्य शब्द का अर्थ है, 'वह जो गुरु के अनुशासन में रहता है।' उपयुक्त तीनों ही शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। ये छात्र जीवन के तीन महत्त्वपूर्ण पक्षों— (1) शील या चरित्र-निर्माण (2) विद्योपार्जन और (3) अनुशासन पालन की ओर संकेत करते हैं। वस्तुतः जिन युवकों के जीवन में ये तीनों विशेषताएँ मिलती है, वे ही सच्चे अर्थ में छात्र कहे जा सकते हैं, और ऐसे ही छात्र अपने राष्ट्र के विकास में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। विश्व के जो देश अपनी प्राचीनतम सभ्यता और संस्कृति के मामले में अग्रणी माने जाते हैं, उनमें भारत वर्ष तो एक है ही, कई दृष्टियों में प्राचीनतम् भी माना जाता है। सभ्यता और संस्कृति दोनों ही क्षेत्रों में इसकी उपलब्धियाँ बहुत बड़ी और विचित्र रही है। लोक कल्याण के लिए त्याग, ज्ञान, तपस्या आदि के क्षेत्र में इस देश को भूमि पर एक से एक महापुरुष अवतरित हुए हैं, महनीय घटनाएं घटी है और युगान्तरकारी रचनाएँ भी की गई हैं. पर लगभग पूरी तरह से पाश्चात्य साये में चलने वाला इस देश का युवा वर्ग अपनी इन महती परम्पराओं से न केवल अपरिचित है, बल्कि इसका यह अपरिचित भाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता हो जा रहा युवा वर्ग के सही चरित्र निर्माण के लिए शिक्षाकाल में हमेशा रचनात्मक कार्यक्रमों में उसका व्यस्त रहना भी आवश्यक है। पर प्रायः देखा यहाँ जा रहा है कि किताबी अध्ययन के अतिरिक्त छात्र को किसी प्रकार को न तो रचनात्मक व्यस्तता है और न उसके विषय में उन्हें सम्यक दिशा निर्देश ही मिल पाता है। इस समय चारों ओर का वातावरण अत्यधिक दूषित है। सामाजिक जीवन में सभी तरह के अपराधों का अनायास घटित होना आज आम बात है। पूँजीपति वर्ग के हाथों में पड़े सिनेमा जैसे मनोरंजन भी अपराध . करने और कदाचारिता अपनाने के मुख्य स्रोत बन गये हैं। इन सबसे ऊपर देश में चल रही आज की घटिया राजनीति है। परन्तु, आज वही प्रेरणा का सबसे बड़ा क्षेत्र बन गया है। वस्तुतः राष्ट्रहित में समर्पितः बुद्धिजीवियों के आगे आने का यही सबसे अच्छा अवसर है। उनके मार्ग निर्देशन से हो छात्र की समस्याएँ सही दिशा पकड़ सकती है और फिर से इस पुरातन राष्ट्र का कायाकल्प हो सकता है। आज इस बात की जरूरत है कि छात्र की समस्याओं एवं उनके प्रेरक कारणों का व्यापक अध्ययन हो और उसके समाधान के लिए लक्ष्योन्मुखी कदम उठाये जायें। ऐसा किये जाने पर ही छात्र राष्ट्र का सरदर्द सिद्ध न होकर उसके सर्वांगीण विकास का संवाहक सिद्ध होगा और इसका स्वर्णिम भविष्य साकार हो सकेगा, भारत की प्राचीन गरिमा पुनः विश्व में स्थापित हो सकेगी।