हेनरी लोपेज (1937)
अफ्रीकी देश कांगो में जन्मे हेनरी लोपेज हमारे समय के अत्यंत समर्थ लेखक हैं। वे कांगो के शिक्षा मंत्री, वित्त मंत्री एवं प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वर्तमान में वे यूनेस्को में संस्कृति और संचार विभाग के महानिदेशक हैं । अतिव्यस्त दिनचर्या एवं सक्रिय राजनीतिक जीवन के साथ-साथ लोपेज ने अपने लेखकीय कर्म को भी उतनी ही गंभीरता से निभाया है। उनका लेखन विकसित या विकासशील दुनिया तथा अविकसित अफ्रीका के बीच की दूरी को दिखाता है। इस तरह उनका लेखन न केवल अफ्रीका बल्कि दुनिया की वृहत्तर आबादी, उसके जीवन और उसकी पीड़ा का रचनात्मक साक्ष्य बनकर प्रस्तुत होता है । 'अच्छा नहीं है", छोटी बच्ची ने मुँह बिचकाते हुए कहा । “हाँ है, फ्रैंक्वा, देखो ।" यह कहते हुए कारमेन ने खुद संतरे का एक चीरा मुँह में डाल लिया । फिर उसने आँखें मूंद लीं। छोटी लड़की उसे स्थिर भाव से देखती रही । " पूरा खा लो ।" कारमेन ने उसे संतरे का चौथाई भाग दे दिया। ऐसा लगा जैसे पुरोहित अपने जजमान को अर्पित कर रहा हो। लेकिन छोटी बच्ची ने गुस्से से अपना मुँह फेर लिया। अब तक सात बज चुके थे। कारमेन को काम निपटाने की जल्दी थी क्योंकि वह मालकिन से अब तक नहीं पूछ पाई थी वह अधिक तेज आवाज में बोलने लगी और कठोर दिखने लगी । "फ्रैंक्वा ! अब खाती हो या तुम्हारी माँ से जाकर बताऊँ ।" पर बच्ची ने एक नहीं माना । घर की मालकिन अपने पति के साथ बैठक में थी। वह ब्रिज खेलने के लिए आमंत्रित मित्रों का मनोरंजन कर रही थी। वह पहले ही कई बार कारमेन को मना कर चुकी थी कि जब वह 'अपनी कंपनी' में होती है, तो उसे तंग नहीं करे। ऐसे में कारमेन भला यह साहस जुटा पाती कि उन लोगों की मौज-मस्ती में खलल डाले ! उसे फटकार सुनने का डर नहीं था। वह मानती थी कि लोग ऊँची आवाज में बोलकर खुद का तनाव दूर करते हैं। और चौकीदार फर्डिनांड के अनुसार, चूँकि मैडम का पति उसे पीटता था,
वह अपना गुस्सा नौकरों पर उतारती थी। इसमें नाराजगी क्यों ? शांतचित्त से इसे स्वीकार करना ही कहीं बेहतर था । लेकिन अपरिचितों एवं अन्य लोगों के सामने डाँट सुनना, थप्पड़ खाने से भी ज्यादा बुरा थाः । इसलिए कारमेन ने रुकना मुनासिब समझा । और फिर, मैडम को एक बुरी आदत थी । वह बच्ची के साथ इस तरह बात करती मानों वह वयस्क हो । "फ्रैंक्वा, मेरी प्यारी बच्ची, तुमने आज खाने में क्या लिया ?" और छोटी फ्रैंक्वा एक-एक कर सुनाती । उसे यह बताने में मजा आता कि उसने तो 'डेजर्ट' में कुछ लिया ही नहीं क्योंकि जो संतरे कारमेन ने दिए थे वे सड़े थे । और मैडम इस बात के लिए कारमेन को डाँटती कि उसे बताया क्यों नहीं । वह भी खासकर तब जबकि उसने पहले ही चेतावनी दे रखी थी कि 'डेजर्ट' के बिना बच्चों का आहार पूर्णतया संतुलित नहीं होता, आदि-आदि। आमतौर पर कारमेन इन सब बातों को गंभीरता से सुन लेती । उसके गाँव एवं पूरे माकेलेकेले में सिर्फ इस बात की अहमियत थी कि बच्चे का पेट भर जाए और वह भूखा नहीं रहे। इसके अतिरिक्त यदि उन्हें संतुलित आहार को होता पर कार का हरगिल भूलना नहीं कहिए कि मालकिन से नहीं पूछ पाई थी..... उसके सामने सिर्फ एक चारा था। वहीं करना जो उसे खिलाने के लिए उसकी माँ करती वी सो एक हाथ से उसने बच्ची का मुँह खोला और दूसरे से फल का वह टुकड़ा उसमें ठूंस दिया । फ्रैंक्वा चीख पड़ी । इसका अंदाजा तो था ही। वह चिल्लाती रही, गुस्से से उसका गला बैठ गया । गलियारे में टाइल से बने फर्श पर धम-धम हथौड़े पीटने सी आवाज आ रही थी । यह आवाज मैडम के कदमों की थी जो दौड़ी चली आई । कारमेन की जीत हुई ।
"यहाँ क्या हो रहा है ?" "ओह जबरदस्ती नहीं करो, बेचारी छोटी सी बच्ची । उसके लिए रेफ्रिजरेटर से कुछ अंगूर ला । उसे अंगूर पसंद है ।" "मैडम यह नहीं खाना चाहती है।" मैडम ने छोटी बच्ची के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और उसे कई बार चूम लिया । कारमेन यूरोपियन तरीके की डेजर्ट लेने चली गई। जब वह वापस आ रही थी तो मैडम से उसकी मुलाकात हॉल में हो गई, वहाँ उसने मन की बात छेड ही दी। पर उसे लगा कि यह बहुत उचित अवसर नहीं था । या मजे में अंगूर खा गई। अंगूर निश्चय ही अच्छे रहे होंगे, क्योंकि यह बातूनी लड़की, चुपचाप शांत होकर उन्हें खा रही थी। उनका स्वाद जानने के लिए एक दिन कारमेन को कुछ अंगूर चुराकर रखने ही होंगे । छोटी लड़की खाने में व्यस्त रही। और इस बीच कारमेन ने अपने गालों पर लुढ़क आए आँसुओं को पोंछ लिया। उसके दिल में इस बच्ची के लिए ममता भरी थी। कारमेन उसके साथ तब से, जब वह सिर्फ दो महीने की थी । व्यवहारतः उसने ही तो बच्ची को पाला था। फ्रैक्वा मैडम की बेटी थी, तो उसकी भी । यहाँ तक कि यदि वह काम छोड़ भी दे या मैडम उसकी छुट्टी भी कर दे तो भी समय-समय पर आकर फ्रैंक्वा को बड़ी होते देखने से वह खुद को नहीं रोक पाएगी ।
कारमेन उस पर आना दो आना तक खर्च कर आई। फिर उसके कपड़े बदले और बिस्तर पर लिटा दिया। तब तक साढ़े सात बज चुके थे। रात हो चुकी थी, माकेलेकेले पहुँचने के लिए उसे अब भी एक घंटा चलना पड़ेगा। लेकिन फ्रैंक्वा नहीं चाहती थी कि उसकी आया उसे छोड़कर जाए । वह झुंझला देनेवाली अपनी जिद्दी आदत पर अड़ी रही। वह चाहती थी कि कारमेन उसे एक लोरी सुनाकर सुला दे । सो जा बच्ची सो जा सो जा बच्ची सो जा... इसके बाद उसे दूसरा गाना होता। वैसे तो दूसरी लोरी सुनते-सुनते बच्ची सो जाती पर उस शाम तीन गानी पड़ीं । कारमेन गाती रही पर उसका ध्यान कहीं और था। वह फ्रैंक्वा के बारे में सोचती रही, जिसे वह अपनी संतान की तरह ही प्यार करती थी। वे दोनों एक ही उम्र के थे, पर कितने भिन्न । फ्रैंक्वा एकदम निडर थी । वह बेहिचक बड़े-बुजुगों के साथ बात करती। नौकरों पर हुक्म चलाती । और अभी से कपड़े पसंद करने में नाक-भौं सिकोड़ती। पर उसके बेटे हेक्टर की बोली नहीं फूटती । वह लजाल था, पर अजनबियों से दूर रहता । अभी से उसकी आँखों में उदासी छाई थी। फिर भी दोनों बच्चे एक ही पीढ़ी के थे । एक ही भाषा बोलते। पर क्या वे एक दूसरे को समझ पाएँगे । कारमेन यह सब ईर्ष्यावश नहीं सोचती । पर वह इतना जरूर चाहती थी कि हेक्टर की 'अच्छी परवरिश' हो। लेकिन यह कैसे संभव हो ? समाज और मानव स्वभाव दोनों को बदलना होगा ।
उस दिन काम पर जाने का उसका भी दिल नहीं था। पूरी रात बेचा छोटा बच्चा रोता रहा। उसके पेट में दर्द था। उसे दस्त लगा था. कम से कम तीन बार ही आई भी पहली बार तो उसे कुछ आराम मिला था। लेकिन अंतिम बार पेट में मरोड़ पढ़ता रहा, पर कुछ भी बाहर नहीं आया। बच्चे का दर्द एकदम झलक रहा था उसे साँस लेने में कठिनाई हो रही थी और माथे पर पसीना आ गया था। वह तो बिलकुल घबरा गई। पहले ही वह अपने दो बच्चों को खो चुकी थी। बदहवाशी में उसने उसी माहौल में सोई अपनी माँ को जगा हो दिया होता पर उसने खुद को संभाला। उसे डर था कि माँ समय गँवाए बिना उसे ओझा के पास ले जाएगी, जैसा कि पहले दोनों बच्चों के साथ हो चुका था। और वे भर गए थे। फिर भी हर बार उसे अपनी आमदनी के बराबर 'चढ़ावा देना पड़ा था और उनकी मौत के बाद स्थिति तो बदतर हो गई थी। तांत्रिक ने तो बच्चों की मृत्यु का कारण उसे हो घोषित कर दिया । अपने माता-पिता द्वारा चुने गए वर से शादी करने से वह पाँच वर्षों तक इनकार करती रही थी। इतना ही नहीं उसे एक के बाद एक आती बूढ़ियों का बकवास भी झेलना पड़ता, मानो बच्चों की मौत का गम कुछ कम हो। वे उसी बात को बार-बार दुहरातीं और अपनी बात मनवाने के लिए दबाव देतीं। वे उस पर दबाव डालती कि या तो भगवान, पूर्वज, आत्माओं की मर्जी को स्वीकार करे या फिर बेचारे बच्चों की नियति । उसे किटोंगा फ्लेवियन से शादी कर लेनी चाहिए। उसके बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा। क्या 'वह' एक अच्छा सौदा नहीं था ? सरकारी ड्राइवर की ड्यूटी के बाद वह खुद अपना मालिक था। क्वेंज इंडोचाइना में उसकी चार टैक्सियों चलती थीं। एक दुकान एवं एक 'बार' भी थे। किटोंगा उसका भार उठा लेगा । उसे और काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पर, हाँ उसे पहले से ही दो बीवियाँ थीं। उनमें से एक बेकांगो में थी तो दूसरी क्वेंज में 'बार' चलाती थी।
वह यह सब सोच ही रही थी कि इतने में उसके बेटे ने बुलाया । वह उसकी चटाई पर सोना BSTBPC-2019 चाहता था । उसे अकेले में डर लगता था । क्या वह सुबह तक बचेगा ? कुछ बच्चे बीमार पड़ते हैं तो उनके माता-पिता तुरंत फोन उठाकर नंबर डायल करते हैं तथा सीधे डॉक्टर के पास पहुँच जाते हैं। डॉक्टर वह सब करता है जो आवश्यक होता है या उन्हें भरोसा दिलाता है। पर गरीब लोग नहीं। सबसे नजदीक वाले दवाखाने रात में बंद रहते हैं। और अस्पताल में जिस नर्स से पाला पड़ता है, वह बदमिजाज होती है । वह हंगामा कर देती है, क्योंकि लोग उसे नींद से उठाने की जुर्रत करते हैं । जहाँ तक किसी डॉक्टर के पास जाने का सवाल है-शहर के अच्छे भाग में रहनेवाले लोग रात में किसी ऐरे-गैरे के लिए दरवाजा भी तो नहीं खोलते । और फिर, वह ख्याली पुलाव ही तो पका रही है। किसी प्राइवेट डॉक्टर से दिखलाने में पैसे भी तो लगते हैं । आखिरकार सुबह होते-होते बच्चा सो गया । जहाँ तक कारमेन का सवाल था, उसे उठकर काम पर जाना था । उसे प्रतिदिन माकेलेकेले से मिपला तक दो घंटे अवश्य चलना पड़ता । चूँकि उसकी मालकिन उसे साढ़े सात से पहले पहुँचने को कहती, समय का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता.... थकान के कारण वह बिस्तर में लेटे रहना नहीं चाहती थी। उस सुबह वह काम पर जाना भी तो नहीं चाहती थी। उसे अच्छा लगता यदि वह अस्पताल जाकर यह पता करती कि हेक्टर को दरअसल बीमारी क्या है । जब भी वह बीमार पड़ता, कारमेन उसे अकेले नहीं छोड़ना चाहती । उसका दिल बेचैन हो जाता । एक बार जब उसे वह काम पर ले गई तो मैडम ने साफ शब्दों में कह दिया कि उसे अपने बेटे को नहीं बल्कि फ्रैंक्वा की देखभाल के लिए पैसा मिलता है । कारमेन को पता था कि उसकी माँ एवं अन्य महिला रिश्तेदार हेक्टर को डॉक्टर के पास ले जाएँगे। उसका कबीलाई परिवार बड़ा है, जहां किसी भी हाल में एक बच्चा कभी अकेला नहीं रहता है । पर फिर भी वह मानती थी कि बच्चों की सबसे अच्छी परवरिश उसकी माँ के द्वारा होती ही हमारी सबसे अधिक आवश्यकता होती है । । जिसे हमने जन्म दिया है, बीमारी की दशा में उसे लेकिन उसने यदि अपना पूरा दिन बेटे को दे दिया होता तो काम से उसकी छुट्टी कर दी जाती । तब वे क्या करती ? पहले ही वह उस महीने में दो बार छुट्टी कर चुकी थी। पहली बार वह सही में बीमार पड़ गई थी तथा बुखार में तपते हुए दो दिन चटाई पर गुजारे थे । दूसरी छुट्टी एक शवयात्रा के लिए थी । मैडम बहुत गुस्सा हुई थीं, “कारमेन, मैं पहले ही बहुत झेल चुकी हूँ ! मुझे जब भी जरूरत होती है, तुम गायब हो जाती हो। ऐसा लगता है, मानो जान-बूझकर ऐसा करती हो । तुम उन्हीं दिनों घर बैठना पसंद करती हो जब मेरी योजनाएँ तय होती हैं। मेरी प्यारी देवीजी, अब मैं तुम्हें चेतावनी देती हूँ। तुमने इस महीने में यदि अब एक दिन भी छुट्टी की तो तुम्हें कहीं और काम ढूँढ़ना होगा ।" वह कैसे समझाए ? कारमेन ने तो पूरी कोशिश की । पर गोरे लोग... ये तो समझते हैं कि हम जब भी काम पर नहीं आते तो उसकी वजह होती है आलस । हेक्टर के इतने बीमार होने के बावजूद वह आज काम पर आई । दोपहर में उसकी बहन ने कहलवा भेजा कि डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ लिखी हैं। हमेशा की तरह फिर वही बात वह पैसे कहाँ से देगी ? पर हेक्टर का ठीक होना जरूरी है । और उस शाम कारमेन उस छोटी सी लड़की के लिए गा रही थी जिसके पास सब कुछ था ।
उसके माता-पिता 'जेंटलमैन' एंव 'लेडिज' के साथ ताश खेलने में मशगूल थे । फ्रैंक्वा के सो जाने के बाद कारमेन रसोई में चली गई। मेहमानों की ब्रिज का खेल खत्म होने तक उसे प्रतीक्षा करनी थी। वह बूढ़े चौकीदार फर्डिनांड के साथ बात कर समय बिताने लगी। उसे ऐसा करना सामान्यतया अच्छा लगता था। इससे उसका दिल हल्का हो जाता तथा चिंता कुछ कम हो जाती। वे अपने मालिकों की खामियाँ एक दूसरे को सुनाते । फर्डिनांड आम तौर पर आँखों देखी सुनाते वक्त मालिकों की नकल भी उतारता । कारनेन खूब हँसती । पर उस शाम वह गुमसुम रही और फर्डिनांड ने उसे इस पर टोका भी था । मैडम आखिरकार रसोई में आई । "कारमेन, तुम अभी तक गई नहीं ?" यह सबसे कठिन घड़ी थी, "मैडम मुझे कुछ रुपए चाहिए ।" " क्यों, रुपए तो मैंने दस दिन पहले ही दे दिए थे ।"
तो जरा इनका बात सुनो अमेज़न कल्याण कोष बन गए हैं। उन बच्चों की देखभाल तो करती नहीं !" "मैडम गोरे लोगों का मानना है...' "तो तुम्हारा बच्चा बीमार है ? होगा ही, तुम मेरी बात जो नहीं सुनती। मैंने तुम्हें बार-बार कहा है कि उसे सही ढंग से जरूर खिलाओ । तुमने कभी ऐसा किया ?" "नहीं मैडम ।" "नहीं बिलकुल नहीं । तुम्हारे सड़े पुराने 'मेनियक' से उसका पेट भरना आसान जो है ।" कारमेन क्या जवाब देती ? यह कहती कि मैडम द्वारा बनाया गया आहार देने का उसने प्रयास तो किया था परंतु मैडम को इस बात का एहसास ही नहीं था कि कारमेन के मासिक तनख्वाह का तीन गुणा वह अपने पति, बच्ची, स्वयं एवं अपनी बिल्ली को सिर्फ एक सप्ताह खिलाने पर खर्च करती है । यदि वह मैडम को यह बात कहती तो बदतमीजी के लिए उसे काम से हाथ धोना पड़ता । "पर जो कुछ भी हो, शाम के इस वक्त मेरे पास पैसे बिलकुल नहीं हैं। तुम जंगली लोग कब यह समझोगे कि पैसा पेड़ पर नहीं उगता । तुम रुपयों का अलग-अलग मद बनाकर उन्हें बचाना कब सीखोगी ?" और मैडम देर तक इसी तरह बोलती रही । कारमेन उसकी सब बात नहीं समझ पाई। दरअसल जब कोई तेजी से फ्रेंच बोलता है, तब मन ही मन अनुवाद करने के लिए उसे पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है । और वह तालमेल नहीं रख पाती, केवल सिर हिलाए जाती है। इस बार भी उसने वही किया ।शायद इसी से मैडम कुछ नरम पड़ीं ? जो भी हो, उसने कारमेन के कुछ ऐस्पिरित दी और अगले दिन 500 फ्रैंक देने का वादा किया । आखिरकार बेचारी कारमेन वहाँ से चल पड़ी। माकेलेले तक का पूरा सफर उसने पैदल तय किया । माकेलेकेले मिला से दूर था। यह दूरी करीब उतनी ही थी जितनी कि उसके अपने गाँव में