. समाज-सेवा

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समाज-सेवा

 समाज-सेवा

समाज-सेवा अयं निजः परोवति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ 
यही प्राचीनतम् भारतीय आदर्श है। समाजसेवा का अर्थ है— समाज की सेवा। समाज यानी मनुष्यों का वह समुदाय जिसके बीच हम रहते है। इस समाज के अन्तर्गत ही हम जन्म लेते हैं, बढ़ते और अन्त में मृत्यु को प्राप्त करते हैं। हमारे बढ़ने का अर्थ इस समाज के भीतर ही सार्थक होता है। कारण, मनुष्य सामाजिक प्राणी है। इसका आदिम जोवन जैसे भी व्यतीत हुआ हो पर वर्तमान में यह अकेला चलने की कल्पना भी नहीं कर सकता। जैसे अनेक मनुष्यों से जो समाज बना है, उसी के बीच उसे रहना, जीना एक "और बढ़ना है। उसी से उसका सामाजिक परिवेश बनता है। यदि यह सामाजिक परिवेश सुन्दर होगा, भला होगा तो उसका भी जीवन भला होगा। ठीक इसके विपरीत दिशा में उसका जीवन दुखमय होगा और सामाजिक परिवेश उसको सेवा भावना से ही सुन्दर और भला होगा। मनुष्य एक इकाई है और समाज उन जैसी अनेक इकाइयों का समूह। अनेक इकाइयों एक-ब-एक के सामने नहीं आ जाती। पहले ये परिवार के सदस्यों के रूप में हमारे सामने आती है। इससे समाज का सबसे लघु रूप बनता है। हमारे माता-पिता, भाई-बहन, दूर-नजदीक के सगे-संबंधी इसके सदस्य होते हैं। समाज सेवा की पहली सौख हमें यहाँ मिलती है। माँ हमें जन्म देती है, पालन-पोषण करती है। पिता हमारी आर्थिक जरूरतें पूरी करते हैं, रक्षा करते हैं। बड़े भाई-बहन भी हमारी देख-रेख करते हैं और हमे अपने छोटे भाई-बहनों की देखरेख करनी पड़ती है। फिर दूर नजदीक के सगे-सम्बन्धियों का यथा योग्य स्वागत सत्कार करना पड़ता है। परिवार को सुख शान्ति के लिए कुछ व्यावहारिक नियम भी होते हैं, जिनका हमें पालन करना पड़ता है। यही हमारी परिवार-भावना है। समाज सेवा इसी का और उदात्त रूप है। कारण, समाज परिवारों का परिवार है, परिवार में तो हमारे बहुत कुछ छोटे-मोटे स्वार्थ एक-दूसरे से बचे रहते है। समाज में इस स्तर से ऊपर उठने की जरूरत होती है। यहाँ हमें कर्त्तव्यों का पालन कष्ट सहकर भी करना होता है ताकि एक विशाल मानव समुदाय का जीवन सुखी हो सके, इसके लिए कई बार अपने सुखों को भी बलि देनी पड़ती है। समाज में रहनेवाले अपने पास पड़ोस के लोगों को जरूरत के क्षणों में यथासंभव मदद करना समाज सेवा है। किसी निर्धन परिवार के साधन विपन्न बालक को पढ़ने में मदद देना, किसी निर्धन रोगों को निःशुल्क दवा एवं उपचार मुहैया करना समाज सेवा है। शादी-विवाह या अन्य वैसे अवसरों पर जब अनेक व्यक्तियों का काम आ पड़ता है, हाथ बंटाना समाज सेवा है। समाज के दलित और आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्गों में शिक्षा का आलोक फैलाकर उनमें सही ढंग से जीवन जीने की चाह जगाना समाज सेवा है। इन उद्देश्यों को बल देने वाला लेखन करना भी समाज सेवा ही है। हमारे देश में समाज सेवको को बड़ी ही ऊँची दृष्टि से देखा जाता रहा है। मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम, योगीराज श्रीकृष्ण, बुद्ध, तीर्थंकर महावीर स्वामी दयानन्द राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी जैसे अनेक नाम है, जो समाज सेवा के क्षेत्र में अमर है, इन्होंने भारतीय समाज को सुखी बनाने के लिए अपने सुखों की बलि दे दी। ये समाज के निर्वतों की रक्षा करते रहे. अत्याचारियों से लोहा लेते रहे, उनको कुरीतियों को दूर करने के लिए दिए के प्याले पीते रहे और स्वयं एवं अपने परिवार के सुख-कल्याण का होम करते रहे। समाज सेवा का मार्ग इन्हीं महापुरुषों का मार्ग है, जिस पर सभी नहीं चल पाते, पर जो चलते हैं, वे अमर हो जाते हैं।