. साइबर अपराध

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साइबर अपराध

 आप अगर अपने मेल पर निगाह डालें तो कभी न कभी आप रूबरू हुए होंगे कि कभी आपको रिजर्व बैंक की तरफ से मेल है कि आपको लाखों रुपये बैंक दे रहा है लेकिन आपको पेपर वर्क के लिए पहले 10-15 - हजार रुपये देने होंगे। कभी नौकरी वह भी मारुति जैसे प्रतिष्ठान से वहां भी लिखा होगा कि 15 हजार रुपये आप भेजें जिससे वे आपका हवाई टिकट भेज सकें। दरअसल अब साइबर क्राइम का दायस दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। आप ठगे भी जा सकते है मानसिक रूप से आहत भी किए जा सकते हैं, आप ब्लैक मेल भी हो सकते हैं। जरूरत है सावधान रहने की। साइबर शब्द सबसे पहले विलियम गिप्सन ने अपने उपन्यास न्यूरोमेंसर में 1984 में गढ़ा था। भारतीय कानून में साइबर अपराध की कोई परिभाषा नहीं है। भारतीय दंड संहिता में तो इसका जिक्र भी नहीं है। किन्तु कैम्ब्रिज एडवांस्ड लर्नर्स डिक्शनरी के अनुसार साइबर अपराध यह अपराध है जो कम्प्यूटर, खासकर इंटरनेट के जरिये या उससे जुड़ा होता है। सीधी सरल जानकारी का अभाव भाषा में कहें तो साइबर अपराध एक अवैध कृत्य है जिसमें कम्प्यूटर साधन या लक्ष्य अथवा दोनों है। आईटी अधिनियम 2000 भारत में साइबर कानून की बुनियाद है जिसमें आईटी संशोधन अधिनियम 2008 के जरिये संशोधन किया गया। इसमें साइबर अपराधों के लिये दीवानी अदालतों में मुकद्दमा चलाने और दंड का प्रावधान है। साइबर अपराध में साइबर नियमों का उल्लंघन और साइबर अपराध दोनों शामिल हैं। दोनों के बीच आपराधिक गतिविधि की डिग्री और हद का अंतर है। यह अधिनियम राष्ट्रीयता के भेदभाव के बिना किसी व्यक्ति द्वारा भारत से बाहर किये गये अपराधों भारत में स्थित कंप्यूटर सिस्टम या कंप्यूटर नेटवर्क साइबर जगत में आमतौर पर इस्तेमाल होने का इस्तेमाल किया जाये (धारा 75) उदाहरण के लिये वाले कुछ शब्द है.. यदि लंदन में बैठा कोई व्यक्ति चेन्नई में बैठे व्यक्ति के ईमेल पते पर अभद्र ईमेल भेजता है तो ईमेल भेजने वाला व्यक्ति आईपी अधिनियम की संबद्ध धाराओं के  अंतर्गत जवाबदेह होगा क्योंकि उसके कृत्य से भारत में स्थित एक कंप्यूटर सिस्टम प्रभावित हुआ है। 
साइवर अपराध के कारणों में शामिल हैं- 
अ शिकार और आरोपित दोनों व्यक्तियों में आ इंफोर्मेशन सिक्योरिटी का अभाव 
इ. कानून की जानकारी का अभाव और
 ई. हैकिंग के साधनों की आसान उपलब्धता वास्तव में, अ ग्लोबल कनेक्टिविटी 
आ. ई-कॉमर्स (ऑनलाईन शॉपिंग, नेट बैंकिंग, एटीएम आदि) का बेहिसाब प्रसार 
इ. आसानी से छिपाय और अनगिनत लाचार लक्ष्य तथा ई उपकरण की कम लागत जैसे कुछ कारको ने भी साइवर अपराध बेहिसाब बढ़ने में योगदान या उल्लंघनों पर भी लागू होता है बशर्ते इसके लिये किया है। 

1. हैकिंग :-
 डिक्शनरी के अनुसार हैकिंग का अर्थ किसी 
इन्फॉर्मेशन सिस्टम या नैटवर्क के सिक्योरिटी तंत्र में सेंधमारी की अनाधिकृत कोशिश है। ये कंप्यूटर सिस्टम में घुसपैठ करना है। हैकर के इरादे धोखाधड़ी से लेकर महज मस्ती तक कुछ भी हो सकते हैं। उद्देश्य के आधार पर हैकिंग को वित्तीय मनोरंजन खुफिया, सैन्य और आतंकवादी हैकिंग के वर्गों में बांटा जा सकता है। संशोधित आईटी अधिनियम में हैकिंग को परिभाषित नहीं किया गया है। अधिनियम की धारा 43ए और धारा 66 को भारतीय दंड संहिता की सम्बद्ध धाराओं के साथ पढ़ा जाता है। बेइमानी या धोखे से अनाधिकृत प्रवेश की सजा तीन वर्ष तक बढ़ाई जा सकने वाली कैद या 5 लाख तक बढ़ाया जा सकने वाला जुर्माना दोनों हो सकते हैं। दोषी व्यक्ति को प्रभावति व्यक्ति के लिये हर्जाना भी देना पड़ सकता है। 
2. ईमेल स्पूफिंग स्पूफिंग :-
वास्तव में किसी कंप्यूटर को इलैक्ट्रॉनिक विधि से भेष बदल कर दूसरे कंप्यूटर जैसा दिखाना है ताकि सीमित एक्सेस सिस्टम में प्रवेश किया जा सके। विकिपीडिया के अनुसार ईमेल स्पूफिंग ऐसी ईमेल गतिविधि है जिसमें ईमेल भेजने वाले के पते और ईमेल शीर्ष के अन्य हिस्सों में ऐसा बदलाव  किया जाता है जिससे आभास हो कि ईमेल किसी दूसरे स्रोत से भेजी गई है। इसका आम उदाहरण यह है कि साइबर अपराधी मशहूर हस्तियों के मित्रों को मेल भेजकर सूचित करते हैं कि वह हस्ती विदेश में कहीं फस गयी है और किसी भी हालत में वित्तीय मदद की जरूरत है। स्यूकिंग का ज यह नहीं है कि ईमेल खाते से छेड़छाड़ की गयी है। ऐसा आमतौर पर अवांछित ईमेल या वायरस फैलाने के लिये किया जाता है। इस पर लागू होने वाली धाराएं भारतीय दंड संहिता की धारा 416 (नकल से धोखाधड़ी) और धारा 483 (जालसाजी) है। धारा कड़ी इस पर लागू होती है जिसमें कहा गया है कि जो कोई व्यक्ति किसी कम्यूनिकेशन डिवाइस या कंप्यूटर रिसोर्स से भेष बदल कर धोखा देता है उसे किसी भी रूप में तीन वर्ष तक बढ़ाए जा सकने वाले कारावास की सजा हो सकती है और एक लाख रुपये तक बढ़ाए जा सकने वाला जुर्माना भी देना पड़ सकता है। 
3. आईडेंटिटी थैफ्ट (पहचान चोरी):-
 पहचान की चौरी के लिये आईटी संशोधन अधिनियम 2009 से जोड़ी गई धारा ऴसी लागू होती. है जिसमें कहा गया है कि जो कोई व्यक्ति किसी और व्यक्ति के इलैक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, पासवर्ड या किसी अन्य अनूठे पहचान संकेत का छल से या बेइमानी से उपयोग करता है उसे किसी भी रूप में तीन साल तक बढ़ाए जा सकने वाले कारावास की सजा हो सकती है और एक लाख रुपये तक बढ़ाया जा सकने वाला जुर्माना भी देना पड़ सकता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 416 (नकल से धोखा) भी लागू हो सकती है। इस सब का उद्देश्य ऑनलाइन उपयोक्ताओं की व्यक्तिगत जानकारी सहित प्राइवेसी की हिफाजत करना है। पहचान चोरी के आम उदाहरणों में किसी और की पहचान धारण करके उसकी ईमेल पढ़ना या पैसे चुराना, या अन्य लाभ लेना है। पहचान चोरी का एक बड़ा रास्ता सर्विस प्रोवाइडर से हो कर गुजरता है। पहचान की नकल डम्पस्टर डाइविंग, शोल्डर सर्फिंग, आदि भी पहचान चोरी के दायरे में जाते हैं। उदाहरण के लिये फिशिंग का मतलब है कि कोई अपराधी स्पूफ ईमेल के माध्यम से किसी व्यक्ति को जाली वेबसाइट पर लॉग करने और क्रेडिट कार्ड तथा गोपनीय जानकारी देने के लिये ललचाता है। हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक के ग्राहकों पर फिशिंग हमले के लिये एसबीआई वेबसाईट का क्लोन इस्तेमाल किया गया था। यहां यह बताना जरूरी है कि जिस व्यक्ति ने कभी कंप्यूटर का इस्तेमाल न किया हो उसकी पहचान भी चोरी हो सकती है।
 4. वायरस या वर्म्स फैलाना 
आईटी अधिनियम की धारा 43(3) में दी गई परिभाषा के अनुसार कंप्यूटर वायरस वह है जो ऐसे कोई भी कंप्यूटर निर्देश, सूचना, डाटा, या प्रोग्राम जो किसी कंप्यूटर रिसोर्स को नष्ट करे, नुकसान पहुंचाएं जा सकते हैं। क्षमता कम करें या उसके प्रदर्शन पर विपरीत असर डाले अथवा जो किसी और कंप्यूटर रिसोर्स से जुड़ जाएं और प्रोग्राम डाटा या निर्देश का निष्पादन किये। जाने पर काम करने लगे अथवा कंप्यूटर रिसोर्स में कोई और काम होने पर सक्रिय हो जाएँ। वायरस को दो वर्गों में बांटा जा सकता है फाइल इन्फैक्टर्स और बूट रिकॉर्डिंग फैक्टर्स आई लव यू वायरस और ट्रोजन होर्स वायरस इसके उदाहरण हैं। उधर वर्क्स ऐसे वायरस हैं जो दूसरे प्रोग्राम में से बहुत नहीं होते। आईटी अधिनियम की धारा 43(सी) में प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति किसी भी कंप्यूटर कंप्यूटर सिस्टम या कंप्यूटर नेटवर्क में उसके मालिक या प्रभारी व्यक्ति की अनुमति के बिना कोई कंप्यूटर दूषित करने वाला अंग या कंप्यूटर वायरस डालता है तो उसे हर्जाना देना होगा। उदाहरणार्थ अगर कोई व्यक्ति किसी को कंप्यूटर वायरस डालता है तो उसे हर्जाना देना होगा। उदाहरणार्थ अगर कोई व्यक्ति किसी को कंप्यूटर वायरस वाली फाइल भेजता है तो वह कंप्यूटर मालिक की अनुमति के बिना उसके कंप्यूटर में वह वायरस पहुंचाता है इसलिये उसे धारा 43(सी) के तहत दोषी माना जाएगा। प्रभारी व्यक्ति को बेशक अपनी क्षति की मात्रा तय करने का अधिकार है। अगर यह कृत्य बेईमानी से या धोखे के इरादे से किया गया है तो धारा 66 (तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकने वाला कारावास या पाँच लाख तक बढ़ाया जा सकने वाला जुर्माना या दोनों) के तहत कार्रवाई हो सकती है। वायरस या वर्म्स फैलाए जाने के मामलों में धारा 43(ई) ( किसी कंप्यूटर, कंप्यूटर सिस्टम या कंप्यूटर नेटवर्क में बाधा डालना) के प्रावधान भी लागू किये यहां उल्लेखनीय यह है कि आईटी अधिनियम में बॉट्स (ऐसे कंप्यूटर प्रोग्राम्स जो केवल तबाही मचाने या स्पैम के लिये वेबसाइट पर अपने जवाब डाल देते हैं और या ऑटोमेटिक ईमेल भेज देते हैं। के लिये कोई प्रावधान नहीं है। 
5. डाटा चोरी 
डाटा चोरी के लिये आईटी अधिनियम की धारा 43 (बी) में प्रावधान किया गया है। यह तीन शब्दों पर लागू होते हैं. डाऊनलोड कॉपीइंग और ऐक्सट्रैक्शन जो भी व्यक्ति मालिक या प्रभारी की अनुमति के बिना किसी कंप्यूटर कंप्यूटर सिस्टम या कंप्यूटर नेटवर्क से कोई डाटा डाऊनलोड या नकल करता है अथवा निकालता है. उसे हर्जाना देना होगा। इसमें किसी रिमूवेबल स्टोरेज मीडियम में जमा डाटा शामिल है। इस बात को थोड़ा अलग तरह से समझे तो मालिक के पास दोबारा प्रस्तुत करने के लिये विशेष डिजिटल कंटेंट अधिकार होते. हैं। यदि यह काम बेईमानी से या धोखे से किया गया है तो ऐसा करने वाले को धारा 60 के तहत तीन वर्ष तक बढ़ाए जा सकने वाले कारावास और पांच लाख रुपये तक बढ़ाए जा सकने वाले जुर्माने अथवा दोनों की सजा हो सकती है। धारा 43ए के तहत यदि कोई कंपनी अथवा कॉर्पोरेट संस्था अपने डाटा का संरक्षण नहीं करती तो उसे हर्जाना देना पड़ सकता है। आज की दुनिया में जब ईमेल और यूएसबी विवासिज के माध्यम से बड़ी बड़ी फाइल्स भेजी या मंगाई जाती है तो डाटा की चोरी की चिन्ता बढ़ना स्वभाविक है और इस समस्या से तुरंत निपटना होगा। 
6. साइवर पॉर्नोग्राफी:-
 साइबर पॉर्नोग्राफी का अर्थ इंटरनेट पर सैक्स संबंधी या अन्य कामुक गतिविधि को प्रोत्साहित करना है। साइबर पॉर्नोग्राफी के लिये दंडित करने वाला सबसे कड़ा कानून आईटी अधिनियम है (धारा (67) विषयवस्तु के आधार पर धारा हाए और धारा 67 वी (चाइल्ड पॉर्नोग्राफी) भी लगाई जा सकती हैं। धारा 66ई के तहत प्रिवेसी के उल्लंघन के लिये दंड दिया जाता है। इस धारा में विडियो रति भी शामिल है। कपड़े बदलने के कमरों होटल आदि के कमरों में कैमरे छिपाने जैसे कृत्यों के लिये तीन वर्ष तक कारावास का प्रावधान है। पॉर्नोग्राफी से निपटने के लिये अन्य कानूनों में महिलाओं की अभद्र प्रस्तुति निषेध अधिनियम और भारतीय दंड संहिता शामिल है। आईटी अधिनियम की धारा का के अनुसार जो भी व्यक्ति ऐसी कोई भी सामग्री इलैक्ट्रॉनिक रूप है। में प्रकाशित या संप्रेषित करता है अथवा संप्रेषण का माध्यम बनता है जो उस सामग्री में शामिल विषय वस्तु को पढ़ने, देखने या सुनने वाले व्यक्ति को कामातुर करती है या उसमें वासना जगाती है या उसे दुश्चरित्र अथवा भ्रष्ट बनाती है तो उसे पहली बार दोषी पाये जाने तीन वर्ष तक बढ़ाये जा सकने वाले किसी भी तरह के कारावास और पांच लाख रुपये तक बढ़ाये जा सकने वाले जुर्माने की सजा हो सकती है। ऐसे व्यक्ति को दूसरी बार अथवा इसके बाद भी दोषी पाये जाने पर पाँच वर्ष तक बढ़ाये जा सकने वाले किसी भी तरह के कारावास और दस लाख रुपये तक बढ़ाये जा सकने वाले जुर्माने की सजा हो सकती है। यह धारा वेबसाइट, डीआईएफ और जेपीईजी तस्वीरों जैसी ग्रैफिक फ़ाइलों, टैक्स्ट संदेशों (ईमेल एसएमएस, और चैटरूम), ऑडियो अथवा साऊंड संदेशों (नेट टेलिफोनी, म्यूजिक डाऊनलोड) डिजिटल फोटोग्राफ (एमएमएस, पीएनजी या जेपीजी, डिजिटल फोटो फॉर्मेट्स) स् फोटोग्राफ्स (बदली गई तस्वीरों पर भी लागू हो है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पोनोग्राफी देखना अधिनियम के तहत अपराध नहीं है। साइबर कैफे के संदर्भ में यदि कोई ग्राहक अपने लिये निर्धारित टर्मिनल से कोई अश्लील सामग्री भेजता है और मालिक को यह बात मालूम होती है तो इसे अपराध माना जाएगा और साइबर कैफ मालिक पर भारतीय दंड संहिता की धारा 292 तथा आईटी अधिनियम की संबद्ध धारा 67 के तहत कार्रवाई की जाएगी।
7. साइबर आतंकवाद:-
 इसमें साइबर जगत और आतंकवाद का मिलन होता है और इसका उद्देश्य 28 नवम्बर, 2008 जैसे हमलों को अंजाम देना है जब हमलावरों ने होटल के कंप्यूटर में घुसपैठ करके वहां ठहरे अमरीकी और ब्रिटिश नागरिकों की सूचना निकाल ली थी और उन्हें चुन चुन कर मारा था। सितम्बर 11. 2011 के हमलों की साजिश रचने और उन्हें अंजाम देने के लिये भी इंटरनेट का खूब इस्तेमाल हुआ था। आईटी अधिनियम की धारा 66 एफ साइबर आतंकवाद से सम्बद्ध है और इस अपराध के तीन रूप बताए गए साइबर आतंकवाद के लिये कारावास की सजा का प्रावधान है जिसकी अवधि आजीवन की जा सकती है। परमाणु रियेक्टरों, बांधों रेलवे आदि में बाधा डालने से बड़ी संख्या में लोग हताहत हो सकते हैं इसलिये इसे भी साईबर आतंक के दायरे में रखा गया है। 
8. साइबर मानहानि :-
मानहानि जान-बूझकर प्रकाशित या सार्वजनिक रूप से बोला गया ऐसा झूठा प्रचार है जो किसी व्यक्ति की साख या भले नाम को खराब करता है। लिखित रूप में मानहानि, लाईबल या अपमान लेख कहलाती है। मौखिक रूप में इसे स्लेंडर या अपवचन कहते हैं। इंटरनेट पर अपमान लेख या अपवचन दोनों तरह की मानहानि हो सकती है। मानहानि से निपटने के लिये भारतीय दंड संहिता की धारा 499-502 के तहत प्रावधान किये गये है। धारा 499 के अंतर्गत संकेत और दृश्य भी आते हैं इसलिये इलेक्टॉनिक रूप में मानहानि पर भी यह धारा लागू होती है। इसमें अपमानजनक ईमेल ऑनलाइन युलेटिन बोर्ड संदेश चैटरूम संदेश, म्यूजिक डाऊनलोड, ऑडियो फाइल और डिजिटल फोटोग्राफ आदि तैयार करना और भेजना शामिल है। मोबाइल फोन पर अपमानजनक एसएमएस. एमएमएस, फोटो और विडियो भेजना भी मानहानि माना जाएगा। साइबर मानहानि का एक सबसे बड़ा उदाहरण किसी महिला के मित्रों और रिशतेदारों को अश्लील ईमेल इस तरह से भेजना जिससे लगे कि महला के खाते से ही भेजी गई है। 
9. ईमेल जालसाजी
 ईमेल जरिए वित्तीय, बैंकिंग अथवा सामाजिक धोखाधड़ी को ईमेल जालसाजी कहते हैं। इसका सबसे आम उदाहरण लॉटरी जालसाजी है जिसमें किसी भी व्यक्ति को अचानक ईमेल से सूचना मिलती है कि उसने एक अंतर्राष्ट्रीय लॉटरी जीती है जबकि वास्तव में न कोई लॉटरी होती है और न कोई इनाम होता है। नाइजीरिया में 419 घोटाले मैं किसी व्यक्ति को किसी कथित रईस वारिस से ईमेल पर सूचना मिलती है कि वो रईस बड़ी रकम देश से बाहर भेजना चाहता है। घोटाले का नाम जालसाजी रोकने के लिये नाइजीरिया की दंड संहिता की धारा पर रखा गया है। भारत में जालसाजी से निपटने के लिये आईटी अधिनियम की धारा 66सी और 66डी के साथ भारतीय दंड संहिता के सम्बद्ध प्रावधान लागू होते हैं (धारा 415 धोखाधड़ी तथा धारा 420 धोखाधड़ी और बेईमानी से संपत्ति की डिलिवरी कराना)।
 10. साइबर स्टॉकिंग
 स्टॉकिंग का अर्थ है छिप कर पीछा करना साइबर स्टॉकिंग का मतलब है किसी व्यक्ति का पीछा करने या उसे परेशान करने के लिये इंटरनेट, ईमेल व अन्य इलैक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन डिवाइस का उपयोग करना। इसमें उन बुलेटिन बोर्ड पर संदेश छोड़ना (जिन्हें शिकार अक्सर देखता है) उसके प्रिय चैटरूम में घुसना और ईमेल आदि की बौछार करना यानी इंटरनेट पर अपने शिकार की हरकतों पर नजर रखना शामिल है। स्टॉकिंग की शिकार अकसर महिलाएं होती हैं जिनकी इच्छा पुरुष करते हैं, या बच्चे होते हैं जिनका पीछा पीडोफिल या वालरति करने वाले करते हैं। बच्चों के मामले में इसे साइबर बुलिंग कहते हैं। अमरीका में इसकी एक मिसाल देखने को मिली जब एक महिला ने अपने दफ्तर में तैनात  चौरीदार की अभद्र हरकतों पर नाराजगी जाहिर की तो उसने पॉर्नोग्रैफिक चैटरूम्स में उसका नाम, पता, ईमेल आईडी और फोन नंबर इल दिए। उस महिला को अश्लील प्रस्ताव मिलने लगे, उसके घर पर लोग नजर रखने लगे उसके कामकाज पर असर पड़ने लगा। उसने अदालत में मुकदमा किया और चौकीदार को 6 साल की कैद हो गई। भारत में साइबर स्टॉकिंग, धमकी वाली मेल, फिशिंग मेल, एसएमएस आदि के लिये सजा का प्रावधान है। लगातार टैक्स्ट संदेश भेजना और सैक्सटिंग यानी यौन गतिविधि दिखाने वाले फोटोग्राफ अथवा एमएमएस भेजना प्रमुख साइबर अपराध बन कर उभरे हैं पारा ए में टैक्सटिंग और सैक्सटिंग दोनों के लिये दंड का प्रावधान है।
 11. डाटा डिडलिंग 
इस हमले में कंप्यूटर प्रोसेसिंग से पहले डाटा बदल देना और प्रोसेसिंग पूरी होने के बाद उसमें फिर से बदलाव कर देना शामिल है।
 12. सलामी हमला 
इस हमले में बदलाव इतना मामूली होता है कि एकाच मामले में तो उस पर ध्यान ही नहीं जाता । ऐसे हमले आमतौर पर वित्तीय अपराधों के लिये किये जाते हैं। इसकी एक सबसे अच्छी मिसाल अमरीका के एक बैंक कर्मचारी की है जिसे बर्खास्त कर दिया गया था। अपने मालिक के दुर्व्यवहार से नाराज उस कर्मचारी ने बैंक के सिस्टम में एक लॉजिक बम लगा दिया। यह एक ऐसा प्रोग्राम है जो पहले से निर्धारित काम शुरू होते ही सक्रिय हो जाता है। यह बम बैंक में सभी खातों से दस दस सैंट लेकर उस व्यक्ति के नाम के खाते में जमा कर देता था जिसका नाम वर्णाक्षर क्रम में सबसे अंत में था। फिर उस व्यक्ति ने जाइग्लर के नाम से खाता खोला। हर खाते से निकाली गई रकम इतनी मामूली थी कि किसी का ध्यान नहीं गया। इस पर ध्यान तब गया जब जाइग्लर नाम से एक व्यक्ति ने उस बैंक में खाता खोला।
 13. साइबर पाइरेसी
 संगीत, पुस्तकों, सॉफ्टवेयर आदि की बिक्री हेतु अवैध रूप से प्रतियां बनाने को साइबर पाइरेसी या साइबर चोरी कहते हैं। नैट पर चोरी मुख्य रूप से कॉपीराइट और ट्रेडमार्क के उल्लंघन की है। कंप्यूटर प्रोग्राम के नकल किये गये रूपों का जानबूझकर इस्तेमाल करने के लिये कॉपीराइट अधिनियम की धारा 63 बी के तहत तीन वर्ष तक की कैद और दो लाख रूपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। 
14. सर्विस से वंचित करने वाले हमले
 ऐसे प्रोग्राम से किये गये हमले जो तब तक अपने शिकार कंप्यूटर से बार-बार सूचना के लिये अनुरोध करते रहते हैं जब तक कंप्यूटर कोई और जवाब देने में लाचार न हो जाए। इनके तीन वर्ग है-बैंड विच, कंजम्पशन अटैक, रिसोर्स स्टारवेशन अटैक और राउटिंग। ऐसे अपराधों के लिये दो उपाय हैं- दीवानी (आईटी अधिनियम की धारा 43 एफ) और फौजदारी (धारा 66) 1 आप हमले होने लगते हैं। 
15. वैब जैकिंग 
इसमें हैकर जबरदस्ती किसी वेबसाइट पर कब्जा कर लेता है और असली मालिक नियंत्रण खो देता है। अमरीका में बताए गए एक मामले में हैकर ने बच्चों के लिये दिल बहलाने की एक वैबसाईट की देव जैकिंग कर ली और हाऊ टु हैव पान विद गोल्डफिश वाले हिस्से को बदल कर हाऊ टु हैव फन विद पिरानाज कर दिया। पिराना बेहद खतरनाक मछली होती है। बहुत से बच्चे इस वैबसाईट पर गये और निर्देशों का पालन कर उन्होंने पिराना के साथ खेलने की कोशिश की तो बुरी तरह घायल हो गये। भारत में देय जेकिंग भारतीय दंड संहिता की धारा 383 के अंतर्गत जबरन वसूली का दंडनीय अपराध है।
 16. स्पैमिंग
 थोक में अनचाही ईमेल का आना स्पैम कहलाता है। आमतौर पर कंपनियाँ अपने प्रोडक्ट और सेवाओं के विज्ञापन के लिये वैसी मेल भेजती है। भारत सर्वाधिक स्पैम भेजने वाले दुनिया के पहले 10 देशों में शामिल है। इससे जितनी बर्बादी होती. है उतने कड़े कानून की व्यवस्था नहीं है। आईटी अधिनियम की धारा 43 (सी. ई. एफ) को स्पैम से निपटने के लिये उपयुक्त माना जा सकता है किन्तु पर्याप्त नहीं है। इस सिलसिले में अमरीका के सीएएन स्पैम ऐक्ट 2003 का उल्लेख किया जा सकता है। यूरोपीय संघ ने प्रिवेसी और इलैक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन 2003 के बारे में निर्देशों के जरिये यूरोप में स्पैम रोधी कानून बनवाने में बहुत जोर लगाया है। यूके में स्पैमर पर 5000 ब्रिटिश पाउण्ड का जुर्माना है। ऑस्ट्रेलिया में भी कड़े कानूनों के अंतर्गत स्पैमर पर 11 लाख डॉलर प्रतिदिन तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। अंत में यही कहा जा सकता है कि असली दुनिया के अपराधों की तरह साइबर अपराध का कोई स्थूल घरातल नहीं होता आभासी दुनिया में सबूतों का पता लगाना बहुत मुश्किल हो जाता इन हमलों का एक रूप सेवा से वंचित करने वाले है। यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि अभियोजकों के हमले भी हैं जिनमें एक से अधिक कंप्यूटर से अपने लिये तकनीकी बारीकियों को समझना जरूरी है और उन्हें कानूनी प्रारूप में सबूत को समझना आना चाहिए। इस समय आवश्यकता हमारे तकनीकी कानूनी ढांचे की खामियां दूर करने की है ताकि साइबर अपराधी तकनीक से मिलने वाली आड़ में न छिप सके।