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भारत का संविधान निर्माण

भारत का संविधान : एक नए युग की शुरुआत


प्रश्न 1. संविधान की उद्देशिका की कोई चार बातें अपने शब्दों में लिखिए।
 उत्तर-संविधान की उद्देशिका या प्रस्तावना की चार बातें इस प्रकार हैं-
 (i) भारत में सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक न्याय की स्थापना की जायेगी। 
(ii) यहाँ विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म तथा उपासना की स्वतंत्रता स्थापित की जायेगी।
 (iii) भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य में प्रतिष्ठा व अवसर की समानता स्थापित की जायेगी। 
(iv) बंधुता प्राप्ति का उद्देश्य बताया जाएगा।


 प्रश्न 2. संविधान लिखे जाने की प्रक्रिया में लेखकों ने किन महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान दिया था ?
 उत्तर- संविधान लिखे जाने की प्रक्रिया में लेखकों ने इस मुद्दे पर ध्यान किया कि भावी देश में शासन का स्वरूप कैसा होना चाहिए। दूसरे शासन व्यवस्था ऐसी हो कि अस्पृश्यता या साधनों से वचित लोगों की भागीदारी बढ़ सके। इसके अतिरिक्त दूसरे देशों के संविधानों को भी पढ़ा। उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों जैसे मुद्दों पर भी बहस की और अंततः संविधान सभा ने 26 नवंबर, 1949 को संविधान पारित कर दिया।

 प्रश्न 3. भारतीय संविधान की प्रस्तावना हमें क्या बनाती है ? इसके चार मुख्य आदर्श कौन-कौन से हैं? अथवा, भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मुख्य आदर्श क्या हैं? 
उत्तर-भारतीय संविधान की प्रस्तावना हमें यह बताती है कि वास्तव में संविधान का क्या उद्देश्य है। यह घोषणा करता है कि संविधान का स्रोत भारत की जनता है। यह निम्नलिखित सिद्धांतों तथा आदशों पर बल देता है:
(क) न्याय : सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक। (ख) स्वतंत्रता विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास तथा पूजा-अर्चना की। 
(ग) समानता : प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता । (घ) भ्रातृत्व : व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करना या आपसी बन्धुत्व बढ़ाना। 

प्रश्न 4. किसी राज्य को प्रभुतासंपन्न कहने का क्या अर्थ होता है ? 
उत्तर- एक प्रभुता संपन्न राज्य से हमारा अभिप्राय एक ऐसे राज्य से है जो पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो। वह राष्ट्र के हित में युद्ध कर सकता है और शांति समझौता कर सकता है और किसी बाहरी हस्तक्षेप के बिना राज्य का प्रशासन तथा अर्थव्यवस्था चला सकता है। ऐसे राज्य में जनता के प्रतिनिधि सरकार बनाते हैं और राज्य के मुखिया का निर्वाचन होता है।

 प्रश्न 5. वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतंत्र को स्पष्ट करें। 
उत्तर—क्यस्क मताधिकार में प्रत्येक स्त्री-पुरुष को, जिसकी आयु 18 वर्ष हो गई है, मत देने का अधिकार है। वह इस किसी दल विशेष को बहुमत प्राप्त होने पर उस दल की सरकार बनती है। इसी प्रक्रिया को राज्यों और केन्द्र में दोहराया जाता है। अतः इस तरह से बनने वाली सरकार लोकतांत्रिक होती हैं। 

प्रश्न 6. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पर संक्षिप्त नोट लिखिए। उत्तर- संविधान का निर्माण होने पर 26 नवम्बर, 1949 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्ष संविधान सभा ने उस पर हस्ताक्षर करते हुए इन बिन्दुओं पर दुःख प्रकट किया था-
 (1) भारत का संविधान मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में है। 
(2) इसमें किसी भी पद पर कोई शैक्षणिक योग्यता नहीं रखी गई है।
 (3) भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ही बनाए गये।

 प्रश्न 7. देशी रियासतों का एकीकरण किसने किया तथा एकीकरण की प्रक्रिया कैसे हुई ? 
उत्तर- देशी रियासतों का एकीकरण सरदार वल्लभ भाई पटेल (लौह पुरुष) ने किया। इस काम के लिए उन्होंने छोटी रियासतों को पड़ोसी राज्यों में मिला दिया। कई छोटी रियासतों को मिलाकर उनका एक संघ बनाया। कुछ बड़ी-बड़ी रियासतों को राज्य के रूप में मान्यता दी। कुछ पिछड़े हुए तथा शासन व्यवस्था ठीक न होने वाले राज्यों को केन्द्र की निगरानी में रखा गया। 

प्रश्न 8. 26 जनवरी, 1950 को लागू किये गये भारतीय संविधान के आधारभूत सिद्धांत और मान्यताएं क्या थी? 
उत्तर- 1. उसके अनुसार भारत एक धर्म निरपेक्ष और जनतांत्रिक गणराज्य होगा, जिसमें बालिग मताधिकार पर आधारित एक संसदीय प्रणाली होगी। 
2. यह एक संघीय व्यवस्था होगी।
 3. सभी भारतीय नागरिकों को मूलभूत अधिकार दिए गये।
 4. संविधान ने सभी नागरिकों को कानून के सामने बराबरी तथा सरकारी रोजगार के अवसर की समानता दी। 

प्रश्न 9. भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू क्यों किया गया ? 
उत्तर- भारत का संविधान 26 जनवरी, 1949 को बनकर तैयार हो गया था परन्तु दो महीने बाद 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। इसका एक कारण था कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस के दिसम्बर, 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता की माँग का प्रस्ताव पास कराया था और 26 जनवरी, 1930 का दिन 'प्रथम स्वतंत्रता दिवस' के रूप में आजादी से पूर्व ही मनाया गया था। इसके बाद कांग्रेस ने हर वर्ष 26 जनवरी का दिन इसी रूप में मनाया था। इसी पवित्र दिवस की याद ताजा रखने के लिए संविधान सभा ने संविधान को 26 जनवरी, 1950 को लागू करने का निर्णय किया था।

 प्रश्न 10. संविधान क्या है ? भारतीय संविधान कब बनकर तैयार हुआ ? यह लागू कब हुआ ? 
उत्तर- संविधान एक कानूनी दस्तावेज है जिसके द्वारा किसी देश का शासन चलाया जाता है। भारत का संविधान 26 नवंबर, 1949 ई. को बनकर तैयार हुआ और दो महीने बाद 26 जनवरी, 1950 को इसे लागू किया गया। 

प्रश्न 11. भारतीय संविधान में समानता के अधिकार का क्या अर्थ है ? 
उत्तर- समानता का अधिकार (Right of Equality) (धारा 14 से 18 तक) इस अधिकार के अनुसार देश के सब लोग कानून की दृष्टि में समान होंगे। सामाजिक समानता की स्थापना की गई है। सरकारी नौकरी पाने में सब लोगों को समान अवसर दिए गए हैं। छुआछूत का अन्त कर दिया गया है और शिक्षण संबंधी उपाधि के सिवाय सब प्रकार की उपाधियाँ समाप्त कर दी गई हैं।

 प्रश्न 12. धार्मिक स्वतंत्रता का क्या अर्थ है ? 
उत्तर- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion) : (धारा 25 से 28) इस अधिकार के अनुसार देश के सब नागरिकों को अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को मानने, उस पर चलने और उसका प्रचार करने का समान हक दिया गया है और सबको इस मामले में पूरी स्वतंत्रता प्रदान की गई है। 

प्रश्न 13. भारतीय संविधान के अनुसार धर्म निरपेक्षता क्या है ? 
 उत्तर-धर्म-निरपेक्ष (Secular) निरपेक्ष शब्द भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 42वें संविधान संशोधन 1976 ई. में जोड़ा गया। इसका तात्पर्य यह है कि भारत किसी धर्म या पंथ को राज्य धर्म के रूप में स्वीकार नहीं करता तथा न ही किसी धर्म का विरोध करता है। प्रस्तावना व्यक्तिगत मामला माना गया है। अतः राज्य लोगों के इस कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेगा। के अनुसार भारतवासियों को धार्मिक विश्वास, धर्म व उपासना की स्वतंत्रता होगी। धर्म को
व्यक्तिगत मामला माना गया है। अंत: न्यायालय राज्य नीति निदेशक तत्व को लागू कराने के लिए सक्षम नहीं होता है।
 प्रश्न 14. राज्य के नीति निर्देशक तत्व न्यायिक अयोग्यता रखते हैं, क्यों ?
 उत्तर- भारत के संविधान के भाग 4 में नागरिकों के लिए कुछ गारण्टी दी गई है; लेकिन ये न्याय योग्य (Justicable) नहीं हैं। ये राज्य नीति के निर्देशक तत्व कहलाते हैं। ये सिद्धांत (तत्व) न्याय अयोग्य हैं। इसका अर्थ है कि सरकार उन्हें लागू करवाने के लिए न्यायालय की शरण नहीं ले सकती हैं। न्यायालय राज्य नीति निर्देशक तत्वों को लागू कराने के लिए सक्षम नहीं होता है।

 प्रश्न 15. संविधान इतना महत्वपूर्ण क्यों है ? उत्तर- संविधान निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है:
 (1) यह सरकार की शक्ति का स्रोत है। 
(2) यह सरकारी शक्तियों के दुरुपयोग को रोकता है। 
प्रश्न 16. संविधान की प्रस्तावना का क्या अर्थ है ? प्रस्तावना का क्या महत्व है ?
उत्तर- संविधान की प्रस्तावना का अर्थ है- संविधान का परिचय संविधान की प्रस्तावना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सरकार का मार्गदर्शन होता है।

 प्रश्न 17. प्रभुसत्ता का क्या अर्थ है ?
 उत्तर-प्रभुसत्ता का अर्थ है कि बाहरी शक्ति के दबाव से मुक्त होना। इसका अर्थ है पूर्ण स्वतंत्रता। भारत 26 जनवरी, 1950 को प्रभुसत्ता सम्पन्न देश बना। प्रश्न 18. "संविधान निर्माण से पहले के वर्ष पर्याप्त उथल-पुथल वाले थे।" उचित उदाहरण देकर संक्षेप में लिखिए। उत्तर—संविधान निर्माण से पहले के वर्ष काफी उथल-पुथल वाले थे। यह महान आशाओं का क्षण भी था और भीषण मोहभंग का भी। 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद तो कर दिया गया किन्तु इसके साथ ही इसे विभाजित भी कर दिया गया। लोगों के दिमाग में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन अभी जीवित था जो ब्रिटिश राज के खिलाफ संभवतः सबसे व्यापक जनांदोलन था विदेशी सहायता से सशस्त्र संघर्ष के जरिए स्वतंत्रता पाने के लिए सुभाष चंद्र बोस द्वारा किए गए प्रयास भी लोगों की बखूबी याद थे। 1945 के बसंत में बंबई तथा अन्य शहरों में रॉयल इंडियन नेवी (शाही भारतीय नौसेना) के सिपाहियों का विद्रोह भी लोगों को बार-बार आंदोलित कर रहा था। लोगों को सहानुभूति सिपाहियों के साथ थी। चालीस के दशक के आखिरी वर्षों में देश के विभिन्न भागों में मजदूरों और किसानों के आंदोलन भी हो रहे थे। 

प्रश्न 19. नवजात राष्ट्र भारत के समक्ष रियासतों की गंभीर समस्या क्या थी? समझाइए।
 उत्तर- नवजात राष्ट्र भारत के समक्ष रियासतों की इतनी ही गंभीर एक और समस्या देशी रियासतों को लेकर थी। ब्रिटिश राज के दौरान उपमहाद्वीप का लगभग एक तिहाई भू-भाग ऐसे नवाबों और रजवाड़ों के नियंत्रण में था जो ब्रिटिश ताज की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। उनके पास अपने राज्यों को जैसे चाहे चलाने की सीमित ही सही लेकिन काफी आजादी थी। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तो इन नवाबों और राजाओं की संवैधानिक स्थिति बहुत अजीब हो गई। एक समकालीन प्रेक्षक ने कहा था कि कुछ महाराजा तो "बहुत सारे टुकड़ों में बँटे भारत में स्वतंत्र सत्ता का सपना देख रहे थे।" संविधान सभा की बैठकें इसी पृष्ठभूमि में संपन्न हो रही थी। बाहर जो कुछ चल रहा था उससे संविधान सभा में होने वाली बहस और विचार-विमर्श अछूता कैसे रह सकता था ?

 प्रश्न 20. संविधान निर्माण सभा के प्रमुख सदस्यों की सूची बनाइए,
 उत्तर-राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सरदार बलदेव सिंह, फ्रैंक एन्थनी, एच. पी. मोदी, अलवादी कृष्णास्वामी अय्यर, बी. आर. अंबेडकर व के. एम. मुंशी ।

 प्रश्न 21. क्या संविधान को जीवित आलेख कहा जा सकता है ? 
उत्तर- संविधान को जीवित आलेख कहा जाता है क्योंकि यह क्रियाशील संस्थाओं, अपेक्षाओं तथा आकांक्षाओं के साथ निरंतर विकसित होता रहता है। 
प्रश्न 22. कैबिनेट मिशन के अंतर्गत संविधान निर्माण सभा ने अपना कार्य कब आरंभ किया था ? उत्तर- कैबिनेट मिशन के अन्तर्गत प्रस्तावित संविधान निर्माण सभा के गठन का कार्य जुलाई-अगस्त, 1946 को सम्पन्न हो गया था। संविधान निर्माण सभा ने अपना कार्य 9 दिसम्बर, 1946 को आरंभ किया था।
 प्रश्न 23. अस्पृश्यता उन्मूलन से संबंधित भारत के संविधान में क्या प्रावधान है ?
उत्तर-अस्पृश्यता उन्मूलन से संबंधित प्रावधान समता के अधिकार में किया गया है। संविधान अस्पृश्यता को अपराध घोषित करता है। इसे व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति को दृष्टि किया जा सकता है।
 प्रश्न 24. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में किस प्रकार के न्याय, स्वतंत्रता, तथा बंधुत्व का वर्णन मिलता है ?
 उत्तर- (i) न्याय सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक 
(ii) स्वतंत्रता : विचार अभिव्यक्ति, विश्वास धर्म तथा उपासना। 
(iii) समता प्रतिष्ठा तथा अवसर की। 
(iv) बंधुत्व व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता सुनिश्चित करना।
 प्रश्न 25. संविधान सभा की पहली और अंतिम बैठक कब हुई थी ?
 उत्तर- संविधान सभा की पहले बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को तथा अंतिम बैठक 24 जनवरी, 1950 को हुई थी।
 प्रश्न 26. संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे ? इस सभा को कब प्रारूप समिति ने अपनी संस्तुतियाँ प्रस्तुत की थीं ? 
उत्तर-संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बी. आर. अम्बेडकर थे। सविधान प्रारूप समिति ने संविधान निर्माण सभा को अपनी संस्तुतियाँ 4 नवम्बर, 1948 को प्रस्तुत की थी। 

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions) 
प्रश्न 1. आजादी के बाद सरदार पटेल की भूमिका का वर्णन कीजिए। 
 उत्तर-आजादी के बाद भारत में लगभग 565 देशी रजवाड़े या रियासतें थीं। इन्हें भारत संघ लौह-पुरुष के नाम से क्यों जाना जाता है ? मैं मिलाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। यह देश का सौभाग्य था कि सरदार वल्लभ जैसे कूटनीतिज्ञ गृह मंत्री के पद पर सुशोभित थे। उन्हें जुलाई 1947 में देश का पहला गृह मंत्री बनाया गया। उनके समक्ष एक स्पष्ट लक्ष्य था कि वह 565 छोटी-बड़ी रियासतों का एकीकरण करेंगे। सरदार पटेल ने 5 जुलाई, 1947 को देशी रजवाड़ों के शासकों को यह विश्वास दिलाया कि वे इस बात का यकीन रखें कि स्वतंत्र भारत की सरकार देशी रजवाड़ों की जनता और नरेशों की खुशहाली और समृद्धि के लिए वचनबद्ध है। जम्मू कश्मीर हैदराबाद और जूनागढ़ को छोड़कर सभी देसी रियासतों और जनता ने भारत संघ में शामिल होने की इच्छा जाहिर कर दी और भारत संघ में प्रवेश सम्बन्धी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार हो गए। पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। परिणामस्वरूप उसने 26 अक्टूबर, 1947 को भारत में शामिल होने का निर्णय लिया। यह उसने बिना किसी शर्त के किया। हैदराबाद और जूनागढ़ दो अन्य राज्य जिन्होंने कुछ समस्याएं खड़ी कीं। इन दोनों राज्यों में हिन्दुओं की बहुत जनसंख्या थी किन्तु इनके शासक मुसलमान थे। मुस्लिम राजा भारत के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखना चाहते थे। इन दोनों राज्यों का देश में शामिल होना सरदार पटेल की होशियारी और सैनिक कार्यवाही के कारण हो सका। थोड़े से समय में ही सारी देशी रियासतों का भारत में शामिल कर लेना सरदार पटेल की एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इसीलिए उन्हें भारत का 'लौह पुरुष' कहा जाता है। वे लौह के समान, दृढ निश्चयी और अटूट प्रभावशाली थे। 

प्रश्न 2. देशी राज्यों के एकीकरण में कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई ?
उत्तर- माहराष्ट बेटन योजना के अनुसायों को छूट भी कि वे चाहे भारत के साथ रह या पाकिस्तान के साथ अथवा मे स्वतंत्र रूप से भी रह सकते हैं। भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बड़ी कुशलता से इस समस्या का समाधान निकाला। सभी 562 देशी राज्यों ने 15 अगस्त, 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये थे, परन्तु जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद ने ऐसा नहीं किया। जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान के साथ मिलने की इच्छा व्यक्त की लेकिन राज्य की जनता भारत के साथ मिलने की इच्छुक थी। अंत में भारतीय सेना ने राज्य को भारत में मिला लिया, क्योंकि एकमात्र भीतरी राज्य को पाकिस्तान का अंग नहीं माना जा सकता था। हैदराबाद के निजाम ने अपने आपको स्वतंत्र रखने का फैसला किया लेकिन तेलंगाना आदि में हो रहे विद्रोहों को देखते हुए हैदराबाद का अधिग्रहण कर लिया गया। कश्मीर के महाराज ने भी विलंब से अपना फैसला लिया। जब कश्मीर पर पाकिस्तान द्वारा भेजे गए कबाइलियों ने आक्रमण कर दिया तो रातोरात हवाई जहाज द्वारा सेना यहाँ भेजी गई तथा कश्मीर का विलय भारत में कर लिया गया। 
प्रश्न 3. ऑपरेशन विजय का वर्णन कीजिए तथा उसका महत्व बताइए। 
उत्तर- पुर्तगालियों ने जब किसी भी तरह से भारतीयों की प्रार्थना को, आपसी बातचीत से गोवा को छोड़ने के लिए नहीं माना और उसने गलतफहमी से राष्ट्रवादियों और देश प्रेमियों पर हमले करने शुरू कर दिए। सैकड़ों लोगों को पुर्तगाली पुलिस ने जब अपना निशाना बनाया तो भारत ने गोवा की आजादी के लिए 'ऑपरेशन विजय' (Operation Vijay) नामक सैनिक कार्यवाही की ताकि गोवा के साथ-साथ गोवा दमन और दीव को अत्याचारी शासन से छुड़ाया जा सके। ऑपरेशन विजय नामक कार्यवाही 17-18 दिसम्बर 1961 को शुरू की गई। इस कार्यवाही के कमाण्डर जनरल जे. एन. चौधरी थे। दोपहर के 2 बजकर 25 मिनट पर 19 दिसम्बर, 1961 को 'ऑपरेशन विजय' नामक कार्यवाही समाप्त हो गई। यह कार्यवाही भारतीय स्वतंत्रता को पूर्ण करने वाली कार्यवाही थी। गोवा, दमन, दीव हवेली आदि में भारत का तिरंगा फहराया गया। निःसंदेह गोवा की स्वतंत्रता ने भारतीयों का स्वाभिमान बढ़ाया और उन्हें सुशोभित किया। ये भारत के अंग बन गए। भारत की भूमि से विदेशियों की अनाधिकृत उपस्थिति और वर्चस्व पूर्णतया समाप्त हो गया। 

प्रश्न 4. भारतीय संविधान के निर्माताओं के कार्य किस प्रकार के थे ? वर्णन कीजिए। 
उत्तर-
 (i) भारतीय संविधान निर्माताओं का कार्य बहुत कठिन था। उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य देश की अखंडता को बनाए रखना था क्योंकि इसकी सीमाओं के अन्तर्गत ही पाकिस्तान विद्यमान था। (ii) उनकी दूसरी प्रमुख समस्या थी देशी रजवाड़ों की। उन्हें यह अधिकार दिया गया था कि वह किसी भी देश में शामिल हो अथवा न हों, उन्हें यह भी अधिकार दिया गया था कि वे उत्तराधिकार से आई हुई सरकार से किसी भी प्रकार की राजव्यवस्था या समझौता कह सकते थे।
 (iii) इसके अतिरिक्त संविधान निर्माताओं के समक्ष आदि जन-जातियों की समस्या थी और उन क्षेत्रों को जहाँ आदिवासी थे उन लोगों और क्षेत्रों को शेष भारत में पूर्णतया समन्वित करने की समस्या थी। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य संविधान निर्माताओं के समक्ष था, एक नए संविधान के माध्यम से स्वतंत्र भारत का निर्माण करना, ऐसे भारत का निर्माण करना जो भूखों को रोटी दे सके और बहुत बड़ी संख्या में लगभग नग्न रहने वाले, सर्व साधारण को कपड़ा प्रदान करना और प्रत्येक भारतवासी को पूर्णतया ऐसा अवसर प्रदान करना ताकि वे अपनी मेहनत योग्यताओं को पूर्णतया विकसित कर सकें।

 प्रश्न 5. किसी भी देश के लिए संविधान की क्या आवश्यकता है ? 
उत्तर-(i) संविधान में ऐसे कानून होते हैं जिनके अनुसार किसी लोकतांत्रिक देश की सरकार का निर्माण होता है तथा उसका कार्य चलता है। 
(ii) यह सरकार तथा उसके अंगों की शक्तियों का निर्धारण करता है और विधानपालिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका की शक्तियों का वर्णन होता है।
 (iii) यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करता है। (iv) यह सरकार द्वारा शक्तियों का दुरुपयोग को रोकता है और नागरिकों के कर्तव्यों पर बल देता है।
 (v) यह लोकतांत्रिक सरकार के विभिन्न अंगों के कार्यों में उत्पन्न संप्राति तथा अंतर्द्वन्द्व को कम करता है। 
(vi) यह सरकार तथा नागरिकों के बीच संबंधों की व्याख्या करता है।
 (vii) इसमें राष्ट्र के लक्ष्यों जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता तथा समाजवाद का वर्णन है और इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सरकार को योजना तथा कार्यक्रम प्रदान करता है।
 प्रश्न 6. भारत के संविधान में देश के शासन और नागरिकों से संबंधित कई बातें लिखी हैं। इनमें से कोई चार बताइए।
 उत्तर- (i) केन्द्रीय संघवाद (Central Unionism): भारतीय संविधान में भारत को संघीय व्यवस्था प्रदान की गई है। शक्तियों का विभाजन दो आधारों पर किया गया है जिसमें से केन्द्र को अधिक शक्तियाँ प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। भारतीय संघ में केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाने का कारण यही था कि यदि केन्द्र को राज्यों जितनी शक्ति देने की व्यवस्था की जाती तो राज्य केन्द्र से कभी भी अलग हो सकते थे। उन पर केन्द्र पर नियंत्रण न होने से देश की एकता खतरे में पड़ सकती थी। इस तरह से भारत के संविधान में केन्द्रीय संघवाद की स्थापना का लक्ष्य देखा जा सकता है। 
(ii) मौलिक अधिकार (Fundamental Rights): भारत के नागरिकों के सर्वांगीण विकास के लिए मौलिक अधिकारों को व्यवस्था की गई। संविधान के तीसरे भाग में मौलिक अधिकारों का उल्लेख मिलता है। प्रारंभ में सात प्रकार के मौलिक अधिकार प्रदान किए गए थे, बाद में 44वें संविधान संशोधन (1978) के बाद एक मौलिक अधिकार 'संपत्ति का अधिकार' समाप्त कर दिया गया। इसे मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया। अब नागरिकों के पास छः मौलिक अधिकार हैं।
 (iii) मौलिक कर्त्तव्य (Fundamental duties): भारतीय संविधान में जहाँ नागरिकों को अधिकार प्रदान किए गये हैं वहाँ उनके लिए 10 कर्तव्यों की व्यवस्था भी की गई है। जब संविधान का निर्माण हुआ था तब मौलिक कर्त्तव्यों की व्यवस्था नहीं की गई थी। भारतीय संविधान के 42वें संशोधन 1976 के द्वारा मौलिक कर्त्तव्यों को जोड़ा गया।
 (iv) संविधान की सर्वोच्चता (Supermacy of the Constitution) : भारतीय संविधान की एक विशेषता यह है कि यहाँ संविधान को सर्वोच्चता प्रदान की गई है। संविधान के अनुसार ही सरकार के तीन अंगों को अधिकार व कार्य प्रदान किए गये हैं। संविधान की सीमाओं में रहकर ही उन्हें काम करना होता है। 
प्रश्न 7. भारतीय संविधान की रूपरेखा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर- भारतीय संवैधानिक सभा का निर्माण 1946 में कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत हुआ। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इसके अध्यक्ष थे। भारतीय सभा का उद्देश्य स्वतंत्र भारत के लिए संविधान तैयार करना था। भारतीय संविधान अधिवेशन 9 दिसम्बर, 1946 से 26 नवम्बर, 1949 तक कुल 11 अधिवेशन हुए। मूल संविधान 395 धाराओं, 22 भागों और 8 अनुसूचियों में बँटा हुआ है जिसमें बाद में कई संशोधन हुए। यह विश्व का सबसे विस्तृत संविधान है जिसमें 90 हजार शब्द हैं।

 प्रश्न 8. सामाजिक न्याय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
 उत्तर- भारतीय संविधान में अनुच्छेद 38 में कहा गया है कि "राज्य में ऐसी व्यवस्था है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी समस्याओं को प्रेरणा दे तथा जिसमें लोक कल्याण की भावना हो।" संविधान के 39 (क) अनुच्छेद में समानः न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता की बात की गई है जिसमें सामाजिक जनजातियों और दुर्बल वर्गों को शिक्षा और धन संबंधी सहायता देने को कहा गया है। राज्यों से कहा गया है कि वे ध्यान रखें और देखें कि सभी प्रकार के सामाजिक न्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी रक्षा हो। 
प्रश्न 9. उद्देश्य प्रस्ताव में किन आदर्शों पर जोर दिया गया था ? 
 उत्तर- 1. 13 दिसम्बर, 1946 को जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा के सामने "उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया। यह एक ऐतिहासिक प्रस्ताव था जिसमें आजाद भारत के संविधान के मूल आदशों (Basic Values) की रूपरेखा (Outlines) पेश की गई थी। इस प्रस्ताव के माध्यम से यह फ्रेमवर्क (कार्य सम्बन्धी रूपरेखा) सुझायी गयी थी जिसमें अधीन भारत के नये संविधान का काम आगे बढ़ाना था।
 2. (1) भारत का प्रस्तावना (Preamble) में 'स्वतंत्र सम्प्रभु गणतंत्र (Independent Sovereign Republic) घोषित किया गया था। (ii) नये संविधान की प्रस्तावना में देश के सभी नागरिकों को न्याय, समानता व स्वतंत्रता का भी भरोसा दिया गया था। 
3. संविधान की प्रस्तावना में यह भी वायदा किया गया था कि अल्पसंख्यकों (Minority). पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों एवं दलित और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षात्मक प्रावधान (Provisions) भी किए जाएँगे। 
4. इसी मौके पर नेहरू ने कहा कि स्वाभाविक तौर पर गुजरे समय में जो ऐतिहासिक प्रयोग किये गये थे उनकी ओर दृष्टि जा रही थी जिनमें कमजोर वर्ग के लोगों के लिए अधिकारों के ऐसे महत्वपूर्ण दस्तावेज (Documents) तैयार किये गये थे जो देश और समाज को सद्मार्ग पर तेजी से ले जायेंगे। 

प्रश्न 10. विभिन्न समूह 'अल्पसंख्यक' शब्द को किस तरह परिभाषित कर रहे थे ? 
 उत्तर-
 (i) कुछ लोग मुसलमानों को ही अल्पसंख्यक कह रहे थे। उनके अनुसार धर्म रीति-रिवाज आदि हिन्दुओं से बिल्कुल अलग हैं। 
(ii) कुछ लोग दलित वर्ग के लोगों को हिन्दुओं से अलग करके देख रहे थे और वह उनके लिए अधिक स्थानों का आरक्षण चाहते थे। 
(iii) कुछ लोग आदिवासियों को मैदानी लोगों से अलग देखकर आदिवासियों को अलग आरक्षण देना चाहते थे।
(iv) के कुछ सदस्य सिख धर्म में अनुवादियों को अल्पका और अल्पसंख्यक की सुविधाएँ देने की मांग कर रहे थे।
 (V) मद्रास के बीपीकर बहादुर ने अगस्त 1947 में संविधान सभा में अल्पसंख्यकों को निर्वाचिका देने की बजाय संयुक्त निर्वाचिका की वकालत की और कहा उसी के भीतर एक ऐसा राजनीतिक ढाँचा बनाया जाए जिसके अंतर्गत अल्पसंख्यक भी जी सकें और समुदायों के नीच मतभेद कम हो। 
(Vi) वे पृथक् निर्वाचक भी हिमायत जब करने लगे तो आर. बी. लोकर ने और सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे लोगों ने पृथक निर्वाचिका का विरोध करते हुए जो शब्द कहे उनका भावार्थ था 'अंग्रेज तो चले गए मगर जाते-जाते हिंदू-मुसलमानों में फूट डालकर शरारत का बीज बो गए।
 (vii) गोविंद वल्लभ पंत ने संविधान में अल्पसंख्यकों के लिए अलग निर्वाचिका का विरोध करते हुए कहा कि "मेरा मानना है कि पृथक निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघातक साबित होगी। उन्होंने आगे कहा निष्ठावान नागरिक बनने के लिए सभी लोगों को समुदाय और खुद को बीच में रखकर सोचने की आदत छोड़नी होगी।" (vii) एन. जी. रंगा ने जवाहर लाल नेहरू द्वारा पेश किए गए उद्देश्य प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों के बारे में बहुत बातें हो रही हैं। असली अल्पसंख्यक कौन है? तथाकथित पाकिस्तानी प्रांतों में रहने वाले हिन्दू, सिख और यहाँ तक मुसलमान भी अल्पसंख्यक तो इस देश की जनता है। यह जनता इतनी दबी-कुचली और इतनी उत्पीड़ित है कि अभी तक साधारण नागरिक के अधिकारों का लाभ भी नहीं उठा पा रही है।

 प्रश्न 11. प्रांतों के लिए ज्यादा शक्तियों के पक्ष में क्या तर्क दिए गए ?,
 उत्तर- 
(1) सन्तनम का प्रथम तर्क (First Argument of Santnam ) : राज्यों के अधिकारों की सबसे शक्तिशाली हिमायत मद्रास के सन्तनम ने पेश की। उन्होंने कहा कि केवल राज्यों को बल्कि केन्द्र को मजबूत बनाने के लिए भी शक्तियों का पुनर्वितरण जरूरी है। "यह दलील एक जिद-सी बन गई है कि तमाम शक्तियों केन्द्र को सौंप देने से वह मजबूत हो जाएगा।" सन्तनम ने कहा कि यह गलतफहमी है। अगर केन्द्र के पास जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारियाँ होंगी तो वह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएगा। उसके कुछ दायित्वों में कमी करने से और उन्हें राज्यों को सौंप देने से केन्द्र ज्यादा मजबूत हो सकता है।
 (ii) सन्तनम का दूसर तर्क (Second Argument of Santnam) : जहाँ तक राज्यों का सवाल है, सन्तनम का मानना था कि शक्तियों का मौजूदा वितरण उनको पंगु बना देगा। राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला कर देगा क्योंकि भूराजस्व के अलावा ज्यादातर कर केन्द्र सरकार के अधिकार में दे दिए गए हैं। यदि पैसा ही नहीं होगा तो राज्यों में विकास परियोजनाएँ (Projects) कैसे चलेंगी। "मैं ऐसा संविधान नहीं चाहता जिसमें इकाई को आकर केन्द्र से यह कहना पड़े कि 'मैं अपने लोगों की शिक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकता। मैं उन्हें साफ-सफाई नहीं दे सकता, मुझे सड़कों में सुधार, उद्योगों की स्थापना के लिए खैरात दे दीजिए।' अच्छा होगा कि हम संघीय व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर दें और एकल व्यवस्था (यूनिटरी सिस्टम) स्थापित करें।" (iii) सन्तनम का तृतीय तर्क (Third Argument of Santnam) : सन्तनम ने कहा कि अगर पर्याप्त जाँच-पड़ताल किए बिना शक्तियों का प्रस्तावित वितरण लागू किया गया तो हमारा भविष्य अंधकार में पड़ जाएगा। उन्होंने कहा कि कुछ ही सालों में सारे प्रांत "केन्द्र के विरुद्ध उठ खड़े होंगे। 
(iv) मैसूर के सर ए. राधास्वामी मुदालियर ने (जो प्रांतों के अधिक अधिकार दिए जाने के पक्ष में थे) कंठस्थ करते हुए कहा था शक्तिशाली केन्द्र को हिमायत के बहाने दिल को यह तसल्ली देने का कोई फायदा नहीं है कि हम ज्यादा बड़े देशभक्त हैं और जो इन संसाधनों पर कड़ी नजर रखना चाहते हैं। उनके भीतर राष्ट्रीय भावना या देशभक्ति का अभाव है। 
(v) जहाँ तक राज्यों का सवाल है, सन्तनम का मानना था कि शक्तियों का मौजूदा वितरण उनको पंगु बना देगा। राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला कर देगा क्योंकि भूराजस्व के अलावा ज्यादातर कर केन्द्र सरकार के अधिकार में दे दिए गए हैं। 
(vi) सन्तनम ने एक और तर्क देते हुए कहा कि अगर पर्याप्त जाँच-पड़ताल किए बिना शक्तियों का प्रस्तावित वितरण लागू किया गया तो हमारा भविष्य अंधकार में पड़ जाएगा। उन्होंने कहा कि कुछ ही सालों में सारे प्रांत "केन्द्र के विरुद्ध" उठ खड़े होंगे। (vii) प्रांतों के बहुत सारे दूसरे सदस्य भी इसी तरह की आशंकाओं से परेशान थे। उन्होंने इस बात के लिए जमकर जोर लगाया कि समवर्ती सूची और केन्द्रीय सूची में कम से कम विषयों को रखा जाए। उड़ीसा के एक सदस्य ने यहाँ तक चेतावनी दे डाली कि संविधान में शक्तियों के बेहिसाब केन्द्रीकरण के कारण "केन्द्र बिखर जाएगा।" 

प्रश्न 12. महात्मा गांधी को ऐसा क्यों लगता था कि हिन्दुस्तानी राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए ? 
 उत्तर-महात्मा गाँधी जी मानते थे कि हिन्दुस्तानी भाषा में हिन्दी के साथ-साथ उर्दू भी शामिल है और ये दो भाषाएँ मिलकर हिन्दुस्तानी भाषा हैं। वह हिन्दू और मुसलमान दोनों के द्वारा प्रयोग में लाई जाती है और दोनों की संख्या अन्य सभी भाषाओं की तुलना में बहुत ज्यादा अधिक है। यह हिन्दू और मुसलमानों के साथ-साथ उत्तर और दक्षिण में भी खूब प्रयोग में लाई जा सकती है। गाँधी जी यह जानते थे कि हिन्दी में संस्कृत और उर्दू में संस्कृत के साथ-साथ अरबी और फारसी के शब्द मध्यकाल से प्रयोग हो रहे हैं। राष्ट्रीय आंदोलन (1930) के दौरान कांग्रेस ने भी यह मान लिया था कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी ही बन सकती है। गाँधीजी साम्प्रदायिकता के खिलाफ थे। वह हिन्दुस्तानी भाषा को देश में हिन्दू और मुसलमानों में सद्भावना और प्रेम बढ़ाने वाली भाषा मानते थे। वह मानते थे इससे दोनों सम्प्रदायों के लोगों में परस्पर मेल-मिलाप, प्रेम, सद्भावना, ज्ञान का आदान-प्रदान बढ़ेगा और यही भाषा देश की एकता को मजबूत करने में अधिक आसानी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जो लोग हिन्दी को हिन्दुओं की और उर्दू को केवल मुसलमानों की भाषा बनाकर भाषा के क्षेत्र में धर्मबंधता और साम्प्रदायिकता का निंदनीय खेल खेलना चाहते थे वे महात्मा गाँधी जैसे मानवतावादी और धार्मिक सद्भावना के लिए सच्चे हृदय से जुटे लोगों का भी सहयोग पा सकते थे। 

प्रश्न 13. संविधान सभा का गठन किस प्रकार हुआ? 
 उत्तर- जब द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् अंग्रेजों ने यह निर्णय लिया कि वे लोग भारत को स्वतंत्रता देकर वापस लौट जायेंगे, तब स्वतंत्र भारत के लिए एक संविधान के निर्माण की आवश्यकता महसूस हुई। 1946 ई० में ब्रिटिश भारत की प्रांतीय विधान सभाओं के निर्वाचन के आधार पर संविधान सभा का गठन हुआ। इसमें देशी रियासतों के प्रतिनिधि भी सम्मिलित हुए। कांग्रेस ने इस बात का प्रयास किया कि देश के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व संविधान सभा में हो। हालांकि मुस्लिम लोग से संविधान सभा का बहिस्कार किया, किंतु कांग्रेस की ओर से बहुत सारे मुसलमान संविधान सभा में मनोनीत किये गये। संविधान सभा में हर जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, विचारधारा का उचित प्रतिनिधित्व था। तभी आपसी सहमति के आधार पर सभी वर्गों को स्वीकार्य भारतीय संविधान का निर्माण हो सका।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions) 
प्रश्न 1. "पांडिचेरी के स्वतंत्रता संघर्ष" पर एक टिप्पणी लिखें। 
उत्तर- परिवरी में स्वतंत्रता संघर्ष की कहानी और उसका भारत में शामिल किए ज संबंधी आन्दोलन का इतिहास यद्यपि छोटा है लेकिन वह बहुत ही प्रेरणाप्रद और उत्साहपूर्ण है। 1946 में पांडिचेरी में फ्रांसीसी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं फ्रांसीसी भारतीय विद्यार्थी कांग्रेस दोन को स्थापना 1946 में की गई। इन दोनों संगठनों के साथ-साथ कुछ अन्य संगठनों ने इनके साथ सहयोग देकर फ्रांस आन्दोलन चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन संगठनों ने लोगों का आह्वान किया, अनेक बड़ी-बड़ी जनसभाएँ की और उन्हें तैयार किया कि ये फ्रांसीसियों को पांडिचेरी और अन्य भारतीय क्षेत्र छोड़ने के लिए विवश करें और वे सभी क्षेत्रों के लोगों को भारत में ही शामिल होने के लिए राजी करें। फ्रांसीसियों ने यथासंभव शक्ति का प्रयोग किया और पाँडिचेरी और अन्य स्थानों पर अपने विरुद्ध चल रहे आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया परन्तु फ्रांस के सभी प्रयास विफल रहा लोगों में फ्रांसीसी राज्य के विरुद्ध भावनाएँ पनपती रहीं। जब पाँडिचेरी के लोगों को भारत को आजादी की सूचना मिली तो उन्होंने और अधिक विशाल जनसभाएँ आयोजित करने का निर्णय लिया। उन सभाओं में उन्होंने भारत को आजादी मिलने पर हार्दिक प्रसन्नता की अभिव्यक्ति को और फ्रांसीसी अधिकारियों से कहा कि वे जल्दी से जल्दी अपने बिस्तर बोरियाँ एकत्रित कर पाण्डिचेरी छोड़ दें। लोगों ने जगह-जगह फ्रांसीसियों पॉडिचेरी छोड़ो सम्बन्धी प्रदर्शन आयोजित किए। सरकार ने जो भी पाबंदिया या निषेध आज्ञाएँ लागू कर रखी थीं वे सभी उसने वापस से ला। 1948 में एक विशाल जनसभा में फ्रांसीसियों को पांडिचेरी छोड़ने और भारत सरकार को सत्ता सौंपने के लिए बातचीत शुरू करने के लिए कहा। भारत सरकार ने भी फ्रांस की सरकार से बातचीत की। पांडिचेरी में जो फ्रांसीसी अधिकारी थे उनसे भी इस विषय पर विचार विमर्श हुए। पांडिचेरी के लोग भारत के इस तरीके से बहुत खुश थे। उन्होंने अपने आन्दोलन को और बढ़ा दिया। 1954 में कुछ क्षेत्रों ने अपनी आजादी की घोषणा कर दी। 13 जून, 1954 को यमन के लोगों ने सत्ता को हथिया लिया। फ्रांस के सभी भारतीय उपनिवेशों में इस तरह की घटनाओं ने ऐसा वातावरण तैयार किया कि स्वयं फ्रांस के कुछ समाचार पत्रों ने अपने देश के सत्ताधारियों को पांडिचेरी और अन्य भारतीय क्षेत्र छोड़ने का सुझाव दिया। अन्ततः 31 अक्टूबर, 1954 को फ्रांसीसी बस्तियों को भारत को सौंप दिया गया। यद्यपि दो साल के बाद एक समझौते पर दोनों देशों की सरकारों ने हस्ताक्षर किए और इस प्रकार पांडिचेरी सहित सभी फ्रांसीसी क्षेत्र भारत में मिल गए।

 प्रश्न 2. गोवा का भारत में विलय किस प्रकार हुआ? 
उत्तर- भारत में गोवा का विलय आसानी से नहीं हुआ। इसका कारण पुर्तगालियों फ्रांसीसी का जिये दृष्टिकोण था। वह इसे अपनी इज्जत का चिन्ह समझते थे और वे इसे अपने नियंत्रण में रखना चाहते थे। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय दृष्टिकोण के बिल्कुल विपरीत था जो इसे पुर्तगालियों द्वारा भारत के आक्रमण की कार्यवाही और उसे जबरदस्ती हथियाये रखने का अपने देश के सम्मान के लिए एक धब्बा मानते थे। भारतीय सरकार ने भरसक कोशिश की कि पुर्तगालियों को गोवा छोड़कर जाने के लिए राजी करे। गोवा को प्राप्त करने के लिए पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में अपना कार्यालय खोला ताकि वहाँ की सरकार को गोवा छोड़ने के लिए राजी किया जा सके लेकिन आखिरकार 1953 को यह कार्यालय बन्द कर दिया गया क्योंकि भारत के तमाम कूटनीतिज्ञ प्रयास विफल हो गए।  अब भारतवासियों ने गोवा राष्ट्रीय कमेटी का गठन किया ताकि गोवा में आजादी के कार्य के लिए संलग्न सभी राष्ट्रवादी पार्टियों की गतिविधियों में सामंजस्य स्थापित किया जा सके और गोवा क भारत संघ में शामिल किया जा सके। 18 जून, 1954 को अनेक सत्याग्रही कैद कर लिए गए जब उन्होंने गोवा में भारतीय ध्वज लहराया। 22 जुलाई को क्रांतिकारियों ने दादर-नागर हवेली को आजाद कर लिया। इस कार्य में जनसंघ और गोवावादी लोगों को पार्टी (Goan Peoples Party) का संयुक्त रूप से क्रांतिकारियों को समर्थन प्राप्त था। 15 अगस्त, 1955 को गोवा की आजादी ने एक नाटकीय मोड़ लिया। इस दिन हजारों भारतवासी चलकर गोवा में प्रवेश कर गए। ऐसा ही दमन और दीव में भी हुआ। इस प्रक्रिया में 200 प्रदर्शनकारी शहीद हो गए। पुर्तगाल की इस गलत कार्यवाही से भारत भौंचक्का रह गया। हमारे प्रधानमंत्री ने पुर्तगालियों को निंदा की। सभी प्रमुख शहरों में हड़ताल हुई। नवम्बर 1961 में पुर्तगालियों ने भारत के एक जहाज पर हमला करके कुछ लोगों को मार दिया। अन्ततः भारतीय सेना ने कारवाई रंग लाई। 19 दिसम्बर, 1961 को गोवा, दमन, दीव पूरी तरह से आजाद हो गए। 

प्रश्न 3. पाण्डिचेरी के स्वतंत्रता संघर्ष और गोवा के एकीकरण का वर्णन कीजिए। उत्तर-पाण्डिचेरी में फ्रेंच इंडिया नेशनल कांग्रेस और फ्रेंच इंडिया स्टुडेंट्स कांग्रेस ने 1946 में पांडिचेरी के स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लोगों को प्रेरित किया कि. वे भारत में शामिल होकर फ्रांसीसियों को भारत से बाहर खदेड़ दें लेकिन वे अपने प्रयास में सफल नहीं हुए। दूसरी ओर फ्रांसीसी विरोधी गुटों को लोगों ने भगा दिया। उन्हें फ्रांसीसियों की क्रूरता की अपेक्षा अंग्रेजों के आधिपत्य से छुटकारा पाना अच्छा लगा। जैसे ही भारत के ब्रिटिश शिकंजे से छुटकारे की खबर फैली तो लोगों ने एक बड़ी जनसभा की तथा स्वयं को भारत के साथ मिलने की सहमति दे दी। फ्रांसीसियों ने लोगों को रोकने का प्रयास किया, परन्तु वे असफल रहे। 1948 ई. में फ्रांसीसी पांडिचेरी छोड़कर चले गये तथा बाद में 1954 ई. तक अन्य फ्रांसीसी उपनिवेश भी खाली हो गये। 

गोवा का एकीकरण (Unification of Goa): भारत सरकार ने कई कूटनीतिक प्रयास किए कि पुर्तगाली भारत छोड़ दें, परन्तु कोई सफलता न मिली। गोआ नेशनल कमेटी का गठन किया गया जिसका उद्देश्य गोवा के लोगों को समझना था कि वे भारत के साथ मिलने के लिए तैयार हो जायें। 18 जून, 1854 को बहुत से भारतीय सत्याग्रहियों को बंदी बनाया गया परन्तु उन्होंने तिरंगा झंडा फहरा दिया। 22 जुलाई को नगर हवेली और बाद में जनसंघ और गोवा पीपुल्स पार्टी के सहयोग से 15 अगस्त, 1955 को एक नाटकीय बदलाव गोवा स्वतंत्रता आंदोलन में आया। हजारों प्रदर्शनकारी गोवा, दमन और दीव में आ घुसे, 200 प्रदर्शनकारी मारे गये। इस घटना की खबर फैलते ही पूरे भारत में रोष की लहर दौड़ गई। पूरे भारत में इसके विरोध में प्रदर्शन हुए। 1961 ई. में पुर्तगालियों ने एस. एस. साबरमती के चालक दल पर आक्रमण किया तथा अंजादेव में एक मछुआरे को मार डाला। अंत में विवश होकर गोवा का भारत में विलय करने के उद्देश्य से ऑपरेशन विजय का गठन किया गया। 18 दिसम्बर, 1961 ई. की आधी रात को ऑपरेशन विजय की कार्यवाही शुरू हुई। शाम को 2 बजकर 25 मिनट पर यह कार्यवाही 19 दिसम्बर को समाप्त हो गई। भारत में गोवा, दमन और दीव के विलय के बाद तिरंगा झंडा इन स्थानों पर फहराया गया। 

प्रश्न 4. भारत संविधान की प्रस्तावना (Preamble) की प्रमुख विशेषताएँ बतलाइए। उत्तर-भारतीय संविधान की प्रस्तावना का विवेचन निम्नलिखित शब्दों में किया गया है। संविधान की प्रस्तावना (The Preamble) : 'हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतंत्रात्मक धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणराज्य बनाने तथा इसके सब नागरिकों को न्याय सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिका स्वतंत्रता विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म एवं पूजा की। समानता प्रतिष्ठा और अवसर की, और उन सबमें व्यक्ति को गरिमा और राष्ट्र की एकता, सुनिश्चित करने वाली बन्धुत्व की भावना बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवम्बर 1949 को हम भारत के लोग अंगीकृत अधिनियम और आत्मसमर्पित करते हैं।" भारतीय संविधान की प्रस्तावना के उद्देश्य विशेषताएँ (Characteristics or Objec tives of the Preamble to Indian Constitution):
 (1) न्याय सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक (Justice Social, Economic and Political) प्रस्तावना में भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय प्रदान करने की बात कही गई है। सामाजिक न्याय से यह अर्थ लिया गया है कि भारतीय समाज में ऐसी स्थिति पैदा की जाए जिसके अनुसार व्यक्ति-व्यक्ति में भेदभाव न हो, ऊँच-नीच की भावना न हो तो समाज के सभी वर्गों के लोगों को अपने व्यक्तित्व के विकास के पूर्ण अवसर प्राप्त हों। आर्थिक न्याय से तात्पर्य उस स्थिति से है जिसमें देश के धन का यथासम्भव बँटवारा हो, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यतानुसार धनोपार्जन के साधन उपलब्ध हों तथा किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का आर्थिक शोषण करने का अधिकार प्राप्त न हो। राजनीतिक न्याय के अनुसार देश के नागरिकों को अपने देश की शासन व्यवस्था में भाग लेने का अधिकार हो। इस बात को ध्यान में रखते हुए भारत में वयस्क मताधिकार प्रणाली की व्यवस्था की गई है। 
(ii) स्वतंत्रता विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म तथा उपासना की (Liberty of thought, expression, belief, religion and worship): भारतीय संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि "भारतीय जनता को विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता होगी।" इससे भारतीय नागरिकों को व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के अवसर प्राप्त होंगे। संविधान की धारा 25 से 28 तक भारतीय नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार भी प्रदान किया गया है।
 (iii) समानता-प्रतिष्ठा व अवसर की (Equality for dignity and opportunity) : संविधान की धारा 14 के अनुसार कानूनी समानता प्रदान की गई है तथा धारा 15 के अनुसार सामाजिक समानता की व्यवस्था की गई है। धारा 16 के अनुसार राजकीय सेवाओं की प्राप्ति के लिए समानता प्रदान की गई है और धारा 17 के अनुसार सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है। धारा 18 के अनुसार शिक्षा तथा सैनिक उपाधियों के अतिरिक्त सब प्रकार की उपाधियाँ समाप्त कर दी गई हैं। प्रस्तावना में इन सब का उल्लेख किया गया है।
 (iv) बन्धुता (Farternity): बन्धुता का अर्थ सभी लोगों के लिए भाईचारे और नागरिकों की समानता से है। इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले फ्रांसीसी अधिकारों के घोषणा-पत्र में किया गया था।
 (v) राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता (Unity and Integrity of the Nation): भारतीय संविधान की प्रस्तावना 42वें संविधान अधिनियम 1976 के अनुसार अखण्डता शब्द को जोड़कर भारत में विघटनकारी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की कोशिश की गई है। इसके द्वारा इस भावना का विकास किया गया है कि भारत के सभी लोग सम्पूर्ण देश को अपनी मातृभूमि समझें और इसके विघटन की भावना को मन में न लाएँ। 

प्रश्न 5. भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। 
उत्तर- भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का निम्नलिखित वर्णन किया जा सकता है,
 (i) लिखित तथा विस्तृत संविधान (Written and Wide Constitution) हमारे देश का संविधान लिखित है। यह संविधान लिखित होने के साथ-साथ विस्तृत भी है। इसका अर्थ यह है कि इसमें विभिन्न बातों का विस्तृत रूप में वर्णन किया गया है। यह विश्व के संविधानों में सबसे बड़ा संविधान है। 1950 के संविधान में 39 धाराएँ थीं। इसमें अब तक लगभग 80 संशोधन किए जा चुके हैं। 
(ii) लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना (Establishment of Democrative Govern- ment) : हमारे संविधान की एक विशेषता यह है कि इससे देश में लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना की गई है। यहाँ की जनता को यह अधिकार दिया गया है कि वह अपनी सरकार का चुनाव स्वयं करे। प्रत्येक व्यक्ति को मतदान करने तथा चुनाव लड़ने का अधिकार दिया गया है। इस प्रकार यहाँ एक ऐसी सरकार का गठन होता है जो लोगों के प्रतिनिधित्व के माध्यम से चलाई जाती है। 
(iii) संघात्मक व्यवस्था (Federal System) हमारे संविधान की अन्य विशेषता यह है कि हमारे यहाँ संघात्मक सरकार की व्यवस्था है। संघात्मक सरकार का अर्थ है कि शासन प्रबन्ध राज्य तथा केन्द्र दो स्तरों पर होगा तथा इनके अधिकार और शक्तियों का वर्णन संविधान में किया जाएगा। दोनों प्रकार की सरकारें संविधान के संघीय ढाँचे के अन्तर्गत कार्य करेंगी।
 (iv) स्वतंत्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका (Free and impartial Judiciary): हमारे देश में एक स्वतंत्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका का प्रावधान है। संविधान में इसके क्षेत्राधिकार तथा शक्तियों का वर्णन मिलता है। न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त रखा गया है। इस प्रकार न्यायपालिका निष्पक्ष तथा स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करती है। 
(v) धर्म निरपेक्ष राज्य (Secular State): हमारे संविधान ने भारत को एक धर्म निरपेक्ष राज्य घोषित किया है। इसका अर्थ यह है कि भारत में सरकार किसी धर्म विशेष के प्रति कोई लगाव नहीं रखेगी। उसकी दृष्टि से भी धर्म समान होंगे। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म के मामले में पूर्ण स्वतंत्रता होगी। धर्म के नाम पर किसी को धर्म के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। अपने धर्म का प्रचार करने की भी प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता होगी। 
(vi) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise): सभी नागरिकाँ को मताधिकार प्राप्त है। सार्वभौमिक का अर्थ है बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक वयस्क की, जिसकी आयु 18 वर्ष अथवा उससे अधिक है, मत देने का अधिकार प्राप्त है।
 (vii) संसदीय सरकार (Parliamentary Form of the Government) : संविधान संसदीय व्यवस्था की स्थापना करता है। राज्य के अध्यक्ष (प्रधानमंत्री) का पद वास्तविक शासक की भाँति बनाने का प्रयास किया गया है। प्रधानमंत्री तथा उसके मंत्रिपरिषद संसद से ली जाएगी जो संसद के प्रति उत्तरदायी होगी।

 प्रश्न 6. वे कौन-सी ऐतिहासिक ताकतें थीं जिन्होंने संविधान का स्वरूप तय किया ? 
 उत्तर- कांग्रेस पार्टी देश की एक प्रमुख राजनैतिक ताकत थी जिसने देश के संविधान को लोकतांत्रिक गणराज्य, धर्मनिपेक्ष राज्य बनाने में भूमिका अदा की थी। मुस्लिम लीग ने देश का बंटवारा किया लेकिन उदारवादी मुसलमान और ये मुस्लिम जो भार
के विभाजन के बाद भी विभिन्न दबाव समूहों या राजनैतिक दलों से जुड़े रहे, उन्होंने भी भारत को धर्म निरपेक्ष बनाए रखने तथा सभी नागरिकों को अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक पहचान बनाए रखने में संविधान के माध्यम से आश्वस्त किया। जो नेता दलित या तथाकथित दलित और हरिजनों के पक्षधर थे उन्होंने संविधान को कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता और न्याय दिलाने वाला, आरक्षण की व्यवस्था करने वाला, छुआछूत का उन्मूलन करने वाला स्वरूप प्रदान करने में योगदान दिया। जो समुदाय या राजनैतिक दल समाजवादी विचारधारा या वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे उन्होंने संविधान में समाजवादी ढाँचे की सरकार बनाने, भारत को कल्याणकारी राज्य बनाने और धीरे-धीरे समान काम के लिए समान वेतन, बंधक मजदूरी समाप्त करने, जमींदारी उन्मूलन आदि की व्यवस्थाएँ करने के लिए वातावरण या संवैधानिक व्यवस्थाएँ तय करने में योगदान दिया। जो तथाकथित दक्षिणपंथी थे उन्होंने हिन्दू हितों की पूर्णतया अनदेखी, हिन्दुस्तानी या हिन्दी भाषा की हिमायत करने वाले सदस्यों या दृष्टिकोण को प्रोत्साहित किया। लोगों की धार्मिक भावना को बनाने और समान नागरिक संहिता (Equal Civil Code) लागू करने के लिए सिद्धान्ततः प्रमुख नेताओं को तैयार करने में भूमिका निभाई। जो लोग लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के समर्थक थे उन्होंने देश में सत्ता विकेन्द्रीकरण और सरकार को ग्रामीण स्तर तक अधिकार दिए जाने की बात की। स्थानीय स्वायत्त शासन की व्यवस्था इसी संदर्भ में संविधान की रचना करने वालों के लिए प्रेरित बनी। आदिवासी से संबंधित ताकतों ने संविधान सभा में तर्क दिया कि आदिवासियों के साथ अनेक वर्षों से ब्रिटिश सरकार जमींदारों, सूदखोरों और साहूकारों ने सही व्यवहार नहीं किया। उन्होंने अपने दावों को बढ़ा चढ़ाकर कहा है कि 6 हजार सालों से उन्हें अपमानित या उपेक्षित किया जा रहा था। उदाहरण के लिए एन. जी. गंगा और जयपाल सिंह जैसे आदिवासी नेताओं ने संविधान का स्वरूप तय करते समय इस बात की और ध्यान देने के लिए जोर दिया कि उनके समाज ( आदिवासियों का इतिहास) भारत के गैर मूल निवासियों के हाथों निरंतर शोषण और छीना-झपटी का शिकार होता रहा। उन्होंने कहा आदिवासियों की सुरक्षा तथा उन्हें आम आदमियों की दशा में लाने के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ बनाने की जरूरत है। आदिवासी समाज के नेता चाहे पृथक् निर्वाचिका के हक में नहीं थे लेकिन विधायिका में आदिवासियों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था जरूरी समझते थे। उन्होंने कहा कि इस तरह से औरों को आदिवासियों की आवाज सुनने और उनके पास आने के लिए विवश किया जा सकेगा। 

प्रश्न 7. दलित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए। उत्तर- दलित समूहों की सुरक्षा में विभिन्न दावे किए गए : 
(i) राष्ट्रीय आंदोलनों के दौरान डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलित जातियों के लिए पृथक जातियों की मांग की थी जिसकी महात्मा गाँधी ने यह कहते हुए खिलाफत की थी कि ऐसा करने से यह समाज स्थायी रूप में शेष समाज से कट जाएगा। 
(ii) संविधान सभा में बैठे दलित जातियों के कुछ प्रतिनिधि सदस्यों का आग्रह था कि "अस्पृश्यों (अछूतों) की समस्या को केवल संरक्षण और बचाव से हल नहीं किया जा सकता। उनकी अपंगता के पीछे जाति विभाजित समाज के सामाजिक कायदे कानूनों और नैतिक मूल्य मान्यताओं का हाथ है। समाज ने उनकी सेवाओं और श्रम का उपयोग किया है लेकिन उन्हें सामाजिक तौर पर अपने से दूर रखा गया है। अन्य जातियों के लोग उनके साथ घुलने-मिलने से कतराते हैं। उनके साथ खाना नहीं खाते, उन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता।
(iii) दलित जातियों के प्रतिनिधि सदस्य जो नागया जो महास के से) ने अपने समुदाय के लोगों के पक्ष में कहा था, "हम सदा कष्ट उठाते रहे हैं पर जब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं हैं। हमें आपकी जिम्मेदारियों का अहसास हो गया। हमें मालूम है कि अपनी बात कैसे मनवानी है। 
(iv) नागया ने कहा कि संख्या की दृष्टि से हरिजन अल्पसंख्यक नहीं है। आबादी में उनका हिस्सा 20-25 प्रतिशत है। उनकी पौड़ा का कारण यह है कि उन्हें बाकायदा समाज व राजनीति के हाशिए पर रखा गया है। उसका कारण उनकी संख्यात्मक महत्वहीनता नहीं है। उनके पास न तो शिक्षा तक पहुँच थी और न ही शासन में हिस्सेदारी । 
(v) दलित जातियों के एक प्रतिनिधि श्री के. जे. खाण्डेलकर (जो मध्य प्रांत से थे) ने संविधान सभा को कहा कि उनके लोगों के समुदायों के लोगों को हजारों वर्षों तक दबाया गया है।... उन्हें इस हद तक दबाया गया है कि उनका शरीर और दिमाग काम नहीं कर रहा है और हृदय भावशून्य हो गया है और हमारी स्थिति बहुत ही दयनीय हो गयी हैं।
 (vi) देश के विभाजन के बाद डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलित वर्ग के लोगों के लिए अलग निर्वाचिका की माँग छोड़ दो और संविधान के द्वारा अस्पृश्यता के उन्मूलन किए जाने और मंदिरों में सभी के लिए द्वार खोल दिए जाने और तथाकथित निम्न जाति के लिए विधायिकाओं और सरकारी नौकरी में आरक्षण दिए जाने को समर्थन किया। वे चाहते थे कानून के साथ-साथ लोगों की सोच और समझ में बदलाव आए और स्वयं सामाजिक समानता और न्याय के लिए काम करे। सौभाग्यवश देश की लोकतांत्रिक जनता ने इन सभी प्रावधानों का स्वागत किया है।

 प्रश्न 8. संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने उस समय की राजनीतिक का परिस्थिति और एक मजबूत केन्द्र सरकार की जरूरत के बीच क्या संबंध देखा? 
उत्तर- संविधान सभा के कुछ सदस्यों द्वारा शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार के वकालत के कारण (Causes for Advocacy of Powerful Centre Government by some of the members of Constituent Assembly):
 (i) संविधान सभा में सभा में प्रांतों के अधिक शक्तिशाली भाग से सभा में तीसरी प्रतिक्रिया सामने आने लगी। वे लोग देश की राजनीतिक परिस्थितियों के देखकर एक केंद्र सरकार की आवश्यकता को रेखांकित करने लगे।
 (ii) ड्राफ्ट कमेटी के चेयरमैन डॉ. बी. आर. अम्बेदकर ने पहले ही घोषणा की थी कि ये एक शक्तिशाली और एकीकृत केन्द्र 1935 के इंडियन एक्ट के तहत (जो ब्रिटिश सरकार ने पारित किया था) तब से ही देश में एक शक्तिशाली केन्द्र चाहते थे। 
(iii) सन् 1946 और 47 में जो देश के विभिन्न भागों और उनको सड़कों पर साम्प्रदायिक दंगों और हिंसा के दृश्य दिखाई दे रहे उससे देश के टुकड़े-टुकड़े हो रहे थे उसका हवाला देते. हुए बहुत सारे सदस्यों ने बार-बार यह कहा कि केन्द्र की शक्तियों में अत्यधिक बढ़ोत्तरी होनी चाहिए ताकि वह सख्त हाथों से देश में हो रही साम्प्रदायिक हिंसा को रोक सके। 
(iv) प्रांतों के लिए जो लोग ज्यादा शक्ति और अधिकारों की माँग कर रहे थे उन्हें उत्तर देते हुए गोपाला स्वामी आय्यर ने कहा, "केन्द्र अधिक से अधिक सुदृढ़ होना चाहिए।" 
(v) इसी संदर्भ में संयुक्त प्रांत (मुख्यतः आज का उत्तर प्रदेश) के एक सदस्य बालकृष्ण शर्मा ने इस बात पर जोर डाला कि केन्द्र का शक्तिशाली होना आवश्यक है ताकि वह सम्पूर्ण देश के हित में योजना बना सके, उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को जुटा सके। एक उचित शासन व्यवस्था स्थापित कर सके तथा ऐसी परिस्थिति में या देश बाह्य आक्रमणों का शिकार हो जाए तो वह मजबूती से देश को विदेशी हमलों से बचा सके।
(vi) देश के विभाजन से पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रांतों को पर्याप्त स्वायत्त देने पर अपनी सहमति व्यक्त की थी। कुछ सीमा तक यह मुस्लिम लीग की इस बात का भरोसा दिलाने की कोशिश थी कि जिन प्रांतों में मुस्लिम लीग की सरकार बनी है वहाँ हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा लेकिन देश के बँटवारे को देखने के उपरान्त अनेक राष्ट्रवादियों का मत बदल चुका था। उनका कहना था कि अब एक विकेन्द्रीकृत संरचना के लिए पहले जैसे राजनैतिक दबाव नहीं बचे हैं अर्थात् मुस्लिम लीग अब पाकिस्तान में चली गई है इसलिए प्रांतों की बजाय केन्द्र को ही अधिक शक्तियाँ देना अधिक योग्य समझा गया।
 (vii) ब्रिटिश औपनिवेशिक द्वारा थोपी गई एक व्यवस्था पहले से ही देश में चली आ रही थी। उस जमाने में घटित अनेक घटनाओं से केन्द्रवाद की भावना को और अधिक प्रोत्साहन मिला जिसे अब अफरा-तफरी पर अंकुश लगाने और देश के आर्थिक विकास की योजना बनाने के लिए और भी आवश्यक माना जाने लगा इस तरह संविधान में भारतीय संघ के घटक राज्यों के अधिकारों की तुलना में केन्द्र में अधिकारों की ओर स्पष्ट झुकाव दिखाई दे रहा था। इसलिए संविधान सभा के अनेक सदस्य एक शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार की आवश्यकता पर जोर दे रहे थे। 
प्रश्न 9. संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकाला ? 
 अथवा, संविधान सभा ने किस प्रकार भाषा-विवाद को सुलझाने का प्रयास किया ? 
उत्तर- स्वतंत्र भारत के लिए संविधान निर्माण का कार्य जब संविधान सभा ने शुरू किया ती भाषा की समस्या एक विवादास्पद समस्या के रूप में उभरी। स्वाधीनता के पश्चात् भारतवर्ष की राजभाषा और राष्ट्रभाषा क्या होगी, इसपर सदस्यगण एकमत नहीं थे। एक ओर महात्मा गाँध जी के कुछ अनुयायी थे जो हिन्दी और उर्दू मिश्रित भाषा हिन्दुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे, तो दूसरी ओर अभिजात्य वर्ग के लोग अंग्रेजी ही राजभाषा के रूप में कायम रखना चाहते थे। तीसरा वर्ग उन लोगों का था जो देश की अधिकांश जनता की भावनाओं की कद्र करते हुए देवनगरी में लिखित संस्कृत निष्ठ हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन देखना चाहते थे। हिंदी के मुद्दे को बड़े ही आक्रामक ढंग से संविधान सभा में एक कांग्रेसी सदस्य आर० वी० घुलेकर ने पेश किया उन्होंने कहा कि जो हिंदी नहीं जानते हैं उन्हें संविधान सभा का सदस्य बने रहने का कोई हक नहीं है। लेकिन हिंदी के मार्ग की एक और बाधा थी। दक्षिण भारत के लोगों को लगता था कि स्वतंत्र भारत में हिंदी के राष्ट्रभाषा बन जाने के बाद उनकी अपनी भाषाओं जैसे-तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाओं का विकास खतरे में पड़ जायेगा। भारत में किई भाषाओं को बोलने वाले लोग हैं और भाषाएं अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृतियों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। इन भाषाओं के समर्थकों में हिंदी के वर्चस्व का भय था। इस परिस्थिति में सविधान सभा की भाषा समिति ने एक ऐसा फार्मूला प्रस्तुत किया जो सभी पक्षों को स्वीकार्य हो। इसके अनुसार नागरी लिपि में हिंदी देश की राजभाषा स्वीकार की गयी। किंतु लिपि में हिंदी की आगामी 15 वर्षों तक अंग्रेजी ही राजभाषा बनी रहेगी और हिंदी धीरे-ध जीरे इसका स्थान लेगी। हर प्रांत की अपनी एक क्षेत्रीय भाषा को अपने प्रांत की राजभाषा घोषित करने का अधिकार होगा। हिंदी के लिए देश की राष्ट्रभाषा के स्थान पर देश की राजभाषा शब्द का प्रयोग किया गया। इस प्रकार संविधान सभा ने भाषा समस्या को सुलझाने का प्रयास किया।