. हमारा ब्रह्मांड

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हमारा ब्रह्मांड

हमारा ब्रह्मांड 

मानव सभ्यता के विकास के साथ साथ सबसे ज्यादा मान चिंतन एवं शोध अगर किसी एक विषय पर हुआ है तो यह है ब्रहमाण्ड की उत्पत्ति एवं वे पदार्थ जिनसे यह ब्रह्माण्ड वर्तमान स्वरूप में हमारे सामने है। इस प्रश्न का उत्तर भारतीय दार्शनिकों के साथ ही यूनान के दार्शनिकों ने प्राचीन समय से ही लगातार खोजने का प्रयास किया। है। विश्व की लगभग सभी सभ्यताओं ने अलग-अलग समय पर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एवं विकास के सिद्धान्त प्रतिपादित किये। भारतीय दार्शनिकों एवं वैज्ञानिकों ने प्राच्य सिद्धान्तों के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश पांच महाभूतों को बहुत पहले इस ब्रहमाण्ड के निर्माण के लिए आवश्यक तत्व बताया। जबकि यूनानी दार्शनिक एवं वैज्ञानिक आकाश को छोड़कर उपर्युक्त चार पदार्थों पृथ्वी, जल, अग्नि एवं वायु को इस ब्रह्माण्ड के पदार्थों की संरचना का आधार मानते थे। आधुनिक विज्ञान के विकास के साथ ही अणु या परमाणु एवं इनके निर्माण में प्रयुक्त अन्य कणों की चर्चा लगभग 400 बी सी के आसपास शुरू हुई। अत्यधिक विकसित तकनीक के इस युग में वैज्ञानिक परमाणु की संरचना को पूर्ण रूप से समझने में सफल हुए हैं। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सन्दर्भ में बिग बैंग थ्योरी या महाविस्फोट का सिद्धान्त सबसे ज्यादा स्वीकार्य है। इस सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड का जन्म लगभग 13.7 खरब वर्ष पूर्व अत्यन्त गर्म एवं घनी अवस्था के विस्फोट से हुआ एवं ब्रह्माण्ड तब से लगातार फेल रहा है अर्थात ब्रह्माण्ड में आकाश गंगाएं तेजी से दूर जा रही हैं। सम्भवतया इस गतिशील एवं लगातार फैलते जा रहे ब्रह्माण्ड की खोज आधुनिक विज्ञान की सबसे बड़ी खोज है। यह सिद्धान्त वर्षों से खगोल वैज्ञानिक द्वारा किए जा रहे निरीक्षण एवं अन्य भौतिक विज्ञानियों के अनुमानित सिद्धान्तों का प्रतिफल है। महाविस्फोट के बाद शुरू में ब्रह्माण्ड समांगी एवं सार्वत्रिक रूप से अत्यधिक घनत्व एवं ऊर्जा से भरपूर तथा अत्यधिक तापमान वाला था। धीरे-धीरे ब्रह्माण्ड फैलता गया तथा ठण्डा होता गया और यह प्रक्रिया भाप के धीरे-धीरे ठण्डा होकर बर्फ में बदलने की प्रक्रिया के सदृश मानी जा सकती है। अन्तर सिर्फ यह है कि इस प्रक्रिया में पदार्थ के मूलकणों एवं इसके अन्य रूपों के परिवर्तन की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। प्रश्न यह है कि हमारे ब्रह्माण्ड में कौन-कौन से दृश्य पदार्थ, ऊर्जा एवं उनको बनाने वाले मूलभूत कण उपस्थित है तथा उनके बीच कौन कौन से दल प्रमादी रूप से कार्य करते हैं। महाविस्फोट के बाद ब्रहमाण्ड के ठण्डा होने के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के करी (सितारों, निहारिकाएं आकाशगंगा इत्यादि के बनने की प्रक्रिया अर्थात आकार ग्रहण प्रक्रिया भौतिक विज्ञानः का मूलभूत एवं अनसुलझा रहस्य है। आज वर्तमान स्वरूप में ब्रह्माण्ड में हर आकार के आकाशीय पिंड यथा, ग्रह, उपग्रह, आकाशगंगा उपस्थित है। यह सारे दृश्य पदार्थों से मिलकर बनने वाले आकार विभिन्न परमाणुओं के मिलने से जन्म लेते हैं। ब्रह्माण्ड के सभी कणों के द्रव्यमान के लिए हिग्स बोसान या तथाकथित गॉड पार्टिकल उत्तरदायी होता है। प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि दृश्य पदार्थों के अतिरिक्त ब्रह्माण्ड में कुछ अदृश्य पदार्थ (डार्क मैटर) भी हैं। डार्क मैटर किन कणों से मिलकर बना है अभी यह गहन शोध का विषय है। इसके अतिरिक्त ब्रह्माण्ड के लगातार फैलने के लिए डार्क एनर्जी को जिम्मेदार माना जाता है। अभी तक हमें ब्रह्माण्ड के लगभग चार प्रतिशत (4 प्रतिशत) दृश्य पदार्थ का ज्ञान है जो क्वार्क एवं लेप्टॉन से मिलकर बना है। आशा है कि उन्नत तकनीकी एवं कम्प्यूटर आधारित गणना के माध्यम से यूरोपियन न्यूक्लियन रिसर्च काउंसिल जिनेवा में स्थित लार्ज हेड्रन कोलाइडर जैसी मशीन पर हो रहे इस सदी के महाप्रयोग भविष्य में ब्रह्माण्ड की संरचना पर अधिक प्रकाश डालेंगे।

हमारा अंतरिक्ष

अंतरिक्ष और बाह्य अंतरिक्ष के बीच अंतर इस बात का है कि अंतरिक्ष पूरे ब्रह्मांड का सूचक है जिसमें पृथ्वी भी सम्मिलित है जब कि वाय अंतरिक्ष का अर्थ पृथ्वी को छोड़ शेष सभी स्थान है। वस्तुत अंतरिक्ष वहां से शुरू होता है जहां पृथ्वी का वातावरण खत्म होता है। अंतरिक्ष सभी दिशाओं में व्याप्त है। अंतरिक्ष के आयामों को हमारे स्थलों के लिए निर्धारित पैमानों से मापना संभव नहीं है इसलिए प्रकाश वर्ष और खगोलीय इकाई जैसे नए पैमानों को अपनाया गया। प्रकाश-वर्ष वह दूरी है जिसे प्रकाश शून्य में 299,792.5 किलोमीटर प्रति सेकेन्ड या 186,282 मील प्रति सेकेन्ड की गति के आधार पर सूर्य और पृथ्वी के बीच की औसत दूरी को तय करता है। आजकल यह सौरमंडल की दूरियों को निश्चित करने के लिए स्थायी मुख्य इकाई बन गई है। खगोलीय इकाई' (एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट) स्थलीय दूरी मापने के पैमाने के अनुसार लगभग 9.3. करोड़ (92,857,000) मील या 15 करोड़ (149,600,000)) किलोमीटर है। खगोलीय माप के रूप में, हम कह सकते हैं कि एक प्रकाशवर्ष में लगभग 50,000 ख. ई. (ए.यू) होती हैं। बाहरी संसार के प्रभावों को हम दो प्रमुख माध्यमों प्रकाश और ध्वनि से ग्रहण करते हैं। प्रकाश वह है जिसे हम देख सकते हैं (दृश्य) और ध्वनि वह है जिसे हम सुन सकते हैं (श्रव्य)। 18वीं सदी के अंत तक इस बात को स्वयंसिद्ध सत्य माना जाता रहा। 19वीं शताब्दी के शुरू होते ही यह विश्वास खंडित होने लगा। खगोलशास्त्र और भौतिकशास्त्र के विद्वानों ने यह पता लगाया कि ब्रह्मांड में ऐसा प्रकाश भी है जिसे देखा नहीं जा सकता और ऐसी ध्वनियां हैं जो सुनी नहीं जा सकती। सन् 1800 ई. में इस बात की जानकारी पहली बार हुई जब ब्रिटिश खगोलशास्त्री विलियम हर्शल (1738-1822) ने अवरक्त विकिरण (इन्फ्रारेड रेडिएशन) का पता लगाया। खगोलिकी आधुनिक खगोलिकी की शुरुआत इतालवी खगोलवेत्ता गैलीलियो से हुई है। सन् 1609 में गैलीलियो ने डेनमार्क के हेन्स लिपरशे की बनायी दूरबीन के बारे में सुना। उसने इस दूरबीन में और अधिक सुधार कर इसके आवर्धन को तीस तक पहुचाया। यह दूरबीन रिफ्लेक्टर टेलिस्कोप या अपवर्तक दूरबीन थी। गैलीलियो ने अनेक खोज की। उसने बताया कि चांद की सतह ऊबड़-खाबड़ है. प्लायोडीज या वृत्तिका 40 से अधिक नक्षत्रों का समूह है। उसने बृहस्पति के चार चंद्रमाओं का और सूर्य के धब्बे का पता लगाया। सन 1668 में न्यूटन ने रिफ्लेक्टर या परावर्तक दूरबीन का आविष्कार किया। परावर्तक दूरबीन में प्रकाश एक बड़े अभिदर्शक लेन्स द्वारा एकत्र किया जाता है। इस के लिए परावर्तक दूरबीन में एक बड़ा वक्रदर्पण लगा होता है। दोनों प्रकार की दूरबीनें अब भी काम में लायी जाती हैं। खगोलिकी के इतिहास में प्रकाश दूरबीन (आप्टिकल टेलिस्कोप) का आविष्कार एक युगप्रवर्तक घटना है। आम लोगों और खगोलशास्त्रियों को इसने इतना अधिक आकर्षित किया कि सभी उन्नत देश बड़ी से बड़ी दूरबीन बनाने की होड़ में लग गए।

रेडियो खगोलिकी

 रेडियो खगोलिकी का जन्म अप्रत्याशित रूप से हुआ। सन् 1931 में एक अमरीकी रेडियो इंजीनियर कार्ल जैस्की ने बेल टेलिफोन प्रयोगशाला में काम करते हुए अन्तरिक्ष से निरन्तर आ रहे एक विकिरण को देखा। यह आश्चर्यजनक बात है कि उस समय के खगोलशास्त्रियों ने इस आविष्कार पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन एक अमरीकी रेडियो आपरेटर ग्रोते रेबर का ध्यान इस ओर गया और उसने वाह्य अन्तरिक्ष में होने वाली घटनाओं का अध्ययन अपने आप करने की सोची। उसने लगभग दस सालों तक अकेले ही अंतरिक्ष का अध्ययन किया और विकिरणों का विश्लेषण किया। सन् 1937 में उसने संसार की सबसे पहली रेडियो दूरदीन इलिनायस में अपने घर के पिछवाड़े पर लगायी। इस दूरबीन में 31 फुट 5 इंच की वलयाकार डिश थी। सन् 1940 में उसने संसार में अपनी तरह का आकाश का पहला परिदृश्य प्रस्तुत किया। इस प्रकार रेडियो खगोलिकी का जन्म खगोलिकी की एक नई शाखा के रूप में हुआ। रेडियो दूरबीन कई मामलों में प्रकाश दूरबीन जैसी है, इसमें धातु का एक परावर्तक लगा होता है। इस परावर्तक के साथ एक एंटिना भी होता है। धातु का परावर्तक रेडियो ऊर्जा को एकत्र करता है और उसे एंटिना पर अभिकेन्द्रित करता है। इसे फिर अपेक्षित आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) पर बदला जा सकता है। एंटिना से विकिरण को एक अत्यधिक संवेदनशील रेडियो रिसीवर ग्रहण करता है और उसे रिकार्ड करता है। इसका विश्लेषण कम्प्यूटर के द्वारा किया जाता है। छठे दशक में उपग्रह टेक्नॉलाजी के कारण खगोल सम्बंधी खोज बहुत आगे बढ़ी। इसके पहले नक्षत्रों का अध्ययन पृथ्वी से होता था। अब उपग्रहों के कारण नक्षत्रों की घटनाओं का अध्ययन वायुमंडल से ऊपर उठकर किया जाना संभव हो गया है। इस प्रकार नक्षत्रों का अध्ययन दो तरह से होने लगा है - पृथ्वी की सतह से और दूसरा वायुमंडल के ऊपर से इससे खगोलिकी के क्षेत्र में नए-नए विशेष क्षेत्रों, एक्स-रे, अल्ट्रावायलेट, गामा रे इन्फ्रारेड आदि का द्वार खुल गया।

 रडार खगोलिकी 

सन् 1940 में तब रडार खगोलिकी का जन्म हुआ जब हंगरी के भौतिक वैज्ञानिक जाल्टन ने चांद पर माइक्रो तरंगों की किरणों को छोड़ा और उनकी गूंज का उसने पता लगाया। यह अब रेडियो खगोलिकी का एक अंग बन गया है क्योंकि माइक्रो तरंगों को विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम का एक अंग माना जा सकता है।

 मन्दाकिनी या आकाशगंगा 
मन्दाकिनी या आकाशगंगा तारों के विशाल पुंज हैं. जो गुरुत्वाकर्षण की शक्ति से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। ये पुंज इतने विशाल है कि इन्हें भी प्रायद्वीप ब्रह्मांड कहा जाता है। आकाश में मन्दाकिनी फैली हुई दिखाई देती है। लेकिन ये कई समूह आपस में गुथ कर पुंज बनते हैं। जब पहली बार ब्रह्मांड में विस्फोट के बाद पदार्थों का विस्तार हुआ, आकाश में गैस से भरे खरब प्रायद्वीप बन गए। ये गैस के प्रायद्वीप (या प्रोटो-गैलक्सी या अधिमन्दाकिनी) अपनी ही गति विशेष से घूमने लगे। बहुत मदगति से घूमने वालों का आकार लगभग गोल रहा। शेष वलयाकार रूप में भिन्न-भिन्न लम्बाइयों के बने। इनकी लम्बाई उनके घूमने की गति पर आधारित थी। बहुत से गैस प्रायद्वीपों के घूमने की गति इतनी अधिक थी कि उनका आकार चपटी तश्तरी (डिस्क) की तरह हो गया। इन तश्तरियों के किनारों से सर्पिल भुजाएं निकलीं। इन तश्तरियों का केन्द्र मन्दाकिनी केन्द्र के चारों ओर वर्तुलाकार पथ में निरन्तर घूमने वाले असंख्य आद्य-नक्षत्रों के द्वारा बना। सर्पिल भुजाओं का निर्माण बहुत अधिक सूक्ष्म धूल से भरी, सामान्य आवर्तन में फंसी गैसों की धाराओं से हुआ जो सर्पिल रूप में ढल गई। इस तरह मन्दाकिनी विभिन्न आकारों और रूपों में निर्मित हुई। ज्यों-ज्यों गैसीय प्रायद्वीप स्थिर होने लगे, स्थानीय संघनन आय नक्षत्रों की प्रक्रिया मन्दाकिनी के कई बिन्दुओं में शुरू होने लगी। ये संघनन (कंडेन्सेशन) अपने ही भार के दबाव से घने गैस के गोले के रूप में संकुचित होने लगे। इस प्रकार के संकुचन के फलस्वरूप, गैसीय गोलों का तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगा और उनकी गरम सतह से गरम तरंग और तब दृश्यमान प्रकाश के छोटे वेवलेंग्थ निकलने लगे। जब इन संकुचित होने वाले आद्य नक्षत्रों का केन्द्रीय वायुमंडल ज्वलनांक लगभग 10 करोड़ डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच गया तब संकुचन की प्रक्रिया रुक गई और तापनाभिकीय प्रतिक्रियाएं शुरू हुईं और नक्षत्रों के रूप में करोड़ों गोलों का जन्म हुआ। जब तारे निकले तब पहले की ठंडी और अंधेरी आद्य मन्दाकिनी चमकीले तारों के रूप में आज की मन्दाकिनी में बदल गई। सबसे अधिक दो निकटतम मन्दाकिनियां हैं- वृहद मैगलेनिक बादल और लघु मैगलेनिक बादल । वृहद बादल में लगभग 5 से 10 अरब तारे हैं। लघु बादल में केवल 1 से 2 अरब तारों की आबादी है। इस समूह में दो सबसे बड़ी मंदाकिनियाँ हैं. आकाशगंगा और एंड्रोमेडा मंदाकिनी। ये दोनों सर्पिल हैं। हाल में वामन (बौना) मन्दाकिनी का पता आस्ट्रेलिया की साइडिंग स्प्रिंग वेधशाला ने लगाया है। यह कोरोना में स्थित है और इसमें बहुत अधिक धुंधले तारों का शिथिल पुंज है। दुग्ध-मेखला (मिल्की वे) हमारी पृथ्वी की अपनी एक मंदाकिनी या तारे बहुसंख्यक हैं। आकाशगंगा है जिसे दुग्ध-मेखला (मिल्की वे) कहते हैं। इस मंदाकिनी की विशिष्टता यह है कि इससे होकर एक संपूर्ण वृत्त में प्रकाश की धारा प्रवाहमान दिखाई देती है। यह दुग्ध-मेखला चौबीस मंदाकिनियों के एक गुच्छ का सदस्य है जो स्थानीय दल (लोकल ग्रुप) कहलाता है। पृथ्वी से देखने पर यह धारा आकाश में बहती