प्रथम नगरों की कहानी - हड़प्पा पुरातत्त्व [ The Story of the First Cities : Harappan Archaeology ]
मानव सभ्यता के विकास के साथ ही विश्व में नगरों का उद्भव एवं नगरीय सभ्यता का विकास हुआ ताम्र- पाषाण युग (Chalcolithic Age ) अथवा कांस्य युग ( Bronze Age ) में पहली बार नगरों का उदय हुआ विश्व के आरंभिक नगरों में सुमेर ( आधुनिक इराक ) तथा सिंधुघाटी ( भारत - पाकिस्तान ) के नगर सर्वप्रमुख हैं । ये दोनों समकालीन भी थे । कालांतर में मिस यूनान , रोम और अन्य देशों में नगरीय सभ्यता विकसित हुई । नगरीय सभ्यता ग्राम्य सभ्यता और संस्कृति से भिन्न भी पुरातात्विक स्रोतों से प्राचीन नगरों एवं विकसित नगरीय सभ्यता - संस्कृति की जानकारी उपलब्ध होती है
हड़प्पा सभ्यता की खोज सभ्यता का नामकरण
भारत की प्राचीनतम सभ्यता सिंधुघाटी की सभ्यता (Indus Valley Civilisation ) अथवा हड़प्पा सभ्यता ( Harappan Civilisation ) के नाम से विख्यात है । इसे सिंधुघाटी की सभ्यता अथवा संचव सभ्यता इसलिए कह गया क्योंकि इस सभ्यता के प्रारंभिक अवशेष एवं प्रमुख केंद्र सिंधुघाटी में ही प्रकाश में आए । बाद में इस सभ्यता के अवशेष सिंधुघाटी के बाहर भी एक विस्तृत क्षेत्र में ढूंढ़े गए तब हड़प्पा को , जो इस सभ्यता का प्रमुख केंद्र था और जो सबसे पहले प्रकाश में आया था , आधार मानकर इस सभ्यता का नामकरण हड़प्पा संस्कृति (Harappan Culture ) कर दिया गया ऐसा करने का एक और कारण यह था कि हड़प्पा के समान सांस्कृतिक तत्त्व एक विस्तृत भू - भाग से ( सिंधुघाटी के बाहर भी ) प्रकाश में आए । इसलिए , आधुनिक पुरातत्त्ववेत्ता सिंधुघाटी के स्थान पर हड़प्पा सभ्यता अथवा हड़प्पा संस्कृति शब्द का ही व्यवहार करते हैं । संस्कृति से अर्थ पुरावशेषों के उस समूह से लगाया गया जो एक विशेष शैली में निर्मित हैं ये एक ही भौगोलिक क्षेत्र अथवा समय के होते हैं
हड़प्पा सभ्यता की खोज
हड़प्पा सभ्यता की खोज 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आरंभ हुई । 1875 में विख्यात पुरातत्त्ववेत्ता अलेक्जेंडर कनिंघम को , जो पेशे से एक इंजीनियर थे , भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ( Archacological Survey of India - ASI ) का प्रथम निदेशक ( Director General ) बनाया गया । उन्हें भारतीय पुरातत्त्व का पिता ( Father of Indian archaeology ) कहा जाता है । कनिंघम को हड़प्पा से एक लिपिबद्ध मुहर प्राप्त हुई । इसपर एक साँड़ की मूर्ति बनी हुई थी तथा अज्ञात लिपि में कुछ अक्षर खुदे हुए थे । उन्हें जहाँ - तहाँ टूटे भवनों के अवशेष भी बिखरे पड़े मिले थे । इस आधार पर कनिंघम महोदय ने यहाँ किसी प्राचीन नगर के होने का अनुमान लगाया था । यहाँ बिखरी ईंटों को देखकर उन्होंने कहा था कि ये ईंटे इतनी अधिक थी कि इनसे लाहौर से मुलतान तक , जिसकी दूरी 100 मील थी , रेल लाइन बनाई जा सकती थी । परंतु , कनिंघम ने इस स्थल के पूर्ण सर्वेक्षण में अधिक दिलचस्पी नहीं ली , क्योंकि उनकी अभिऐतिहासिक स्थलों के पुरातत्व में अधिक थी । 20 वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों तक इस विस्मृत सभ्यता की ओर विद्वानों ने मध्य दिया , परंतु बाद में हड़प्पा सभ्यता की खोज में आश्चर्यजनक प्रगति हुई जिसके परिणामस्वरूप आज हमारे पास इस नगरीय सभ्यता का विस्तृत विवरण उपलब्ध है । हड़प्पा के पुरातात्विक महत्व का पत्ता विद्वानों को 1921 में तब चला जब एक भारतीय आरंभिक ऐतिहासिक काल के पहले के स्तरों से अनेक मुहरे मिली । इससे पुरातत्त्ववेत्ताओं पुरातत्ववेत्ता दयाराम साहनी ने हा का उत्खनन आरंभ किया । इस खनन के दौरान ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ । इसी समय राखालदास बनर्जी ने सिंध में मोहनजोदड़ों का उत्खनन से मिलती - जुलती मुहरे मिली । इससे विद्वान यह लगाने लगे कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो एक ही सभ्यता के थे । इस समय मे हड़प्पा - मोहनजोदड़ो में अनेक उत्खनन किए गए । पुरातत्त्व सर्वेक्षण के निदेशक सर मार्शल के नेतृत्व में एम . एस . बत्स ने 1921 में ही हड़प्पा का उत्खनन बड़े स्तर पर तथा वैज्ञानिक पद्धति से किया । मोहनजोदड़ो का उत्खनन भी मार्शल के नेतृत्व में हुआ । मोहनजोदड़ो का विस्तृत उत्खनन 1925 में आरंभ हुआ । 1938 में मैके ने इस स्थल का पुनः उत्खनन किया । 1946 में जब आर . ई . एम . डीलर पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक बने तब हड़प्पा का पुनः उत्खनन किया गया दिलर ने उत्खनित स्थल के स्तरीकरण पर विशेष बल दिया । पाकिस्तानी और अन्य पुरातत्त्ववेत्ताओं ने अनेक जॉन 1947 में स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय , का उत्खनन किया । 1955 में एस आर राव ने लोथल ( गुजरात ) तथा 1960 में नए स्थलों बी . बी लाल एवं बी . के . थापर ने कालीबंगन का उत्खनन किया । 1980 में जर्मनी और इटली के पुरातत्त्ववेत्ताओं के एक दल ने मोहनजोदड़ो का सर्वेक्षण किया तथा अमेरिकी पुरातत्त्ववेत्ताओं ने 1986 में हड़प्पा के कुछ स्थलों का उत्खनन किया । विगत वर्षों में सबसे महत्त्वपूर्ण उत्खनन आर एस बिष्ट द्वारा 1990 में धौलावीरा ( गुजरात ) का है । इनके अतिरिक्त पाकिस्तान , सिंध , बलूचिस्तान और अन्य स्थानों में हड़प्पा संस्कृति से जुड़े अनेक स्थल खोजे गए हैं । पाकिस्तानी पुरातत्त्ववेत्ताओं में एफ . ए . खान , ए . एच . दानी तथा एम आर . मुगल का हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न पहलुओं को प्रकाश में लाने में विशेष योगदान है । इन उत्खननों ने हड़प्पा सभ्यता के स्वरूप तथा उसकी भौतिक संस्कृति से हमें परिचित कराया है । इस सभ्यता का ज्ञान हमें पुरातात्त्विक स्रोतों से ही होता है , क्योंकि उस समय का कोई साहित्य उपलब्ध नहीं है । इस सभ्यता की लिपि अभी तक विवादास्पद है अतः पुरातात्विक स्रोत ही एकमात्र सहारा है
हड़प्पा सभ्यता का विस्तार और प्रमुख स्थल
विस्तार -
आरंभ में हड़प्पा सभ्यता के दो प्रमुख स्थल हड़प्पा ( पश्चिमी पंजाब , पाकिस्तान मुलतान जिला में स्थित ) ( तथा मोहनजोदड़ो ( लरकाना जिला , सिंध , पाकिस्तान में ) जिसे मृतकों का ढीला ( Mound of the Dead ) कहा जाता है , प्रकाश में आए विगत वर्षों में हड़प्पा संस्कृति से संबद्ध लगभग 2,800 स्थल भारतीय उपमहाद्वीप के बलूचिस्तान , सिंध , पंजाब , जम्मू - कश्मीर हरियाणा राजस्थान , गुजरात , सौराष्ट्र काठियावाड़ तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीमा तक ढूंदे गए है । इनमें तीन प्रकार के स्थल है- ( 1 ) आरंभिक ( Early ) , ( II ) विकसित ( Matured ) तथा ( iii ) उत्तरकालीन ( Late Harappan ) पूर्ण विकसित हड़प्पा स्थलों की संख्या लगभग 1,022 406 पाकिस्तान में तथा 616 भारत में ) है । इस सभ्यता का केंद्र सिंधुघाटी के सिंध और पंजाब ( पाकिस्तान ) में थे यहाँ से इसका प्रसार दक्षिण और पूर्व में हुआ । हड़प्पा संस्कृति का विस्तार एक त्रिभुजाकार क्षेत्र में था । यह विस्तार उत्तर में जम्मू से दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पश्चिम मे बलूचिस्तान के मकरान समुद्रतट से उत्तर - पूर्व में मेरठ जिला तक था । इसको पश्चिमी सोमा सुत्कगेनडोर ( बलूचिस्तान ) , पूर्वी आलमगीरपुर ( जिला मेरठ , उत्तर प्रदेश ) , दक्षिणी दयमाबाद ( जिला अहमदनगर , महाराष्ट्र ) तथा उत्तरी मांडा ( जिला अखनूर , जम्मू कश्मीर ) मानी गई है । इतने विशाल क्षेत्र में ( 1,299,600 वर्ग किमी ) प्राचीन मिस्र अथवा मेसोपोटामिया की सभ्यता का भी विस्तार नहीं हुआ था । अतः यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा सभ्यता प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में सबसे अधिक विस्तृत थी । यह इस सभ्यता की एक विशिष्टता है ।
प्रमुख स्थल -
हड़प्पा सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी । भारत में पहली बार नगरों का उदय और विकास इसी सभ्यता के अंतर्गत हुआ । अतः इसे प्रथम नगरीकरण ( First ) Urbanisation ) कहा जाता है । हड़प्पा के सभी विकसित स्थल नगर नहीं थे इनकी संख्या कम थी , परंतु विकसित हड़प्पा सभ्यता के लक्षण अनेक स्थलों से मिले हैं । उत्तरकालीन हड़प्पा स्थलों पर बदलाव के चिह्न दिखलाई देते हैं । इसी प्रकार आरंभिक हड़प्पा स्थलों से वैसे साक्ष्य मिलते हैं जो कालांतर में विकसित होकर नगर अथवा पूर्ण विकसित हड़प्पा स्थल बन गए हैं हड़प्पा सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थल है --
1. हड़प्पा—
यह मुलतान ( पाकिस्तान ) में रावी नदी के तट पर स्थित था । सबसे पहले इसी स्थल की खुदाई से हड़प्पा सभ्यता प्रकाश में आई । यहाँ के उत्खननों से नगर - निर्माण योजना तथा सभ्यता के अन्य पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है । यहाँ से गढ़ी ( citadel ) अथवा दुर्ग और निचले नगर की योजना प्रकाश में आई है । यहाँ अन्नागार ( granary ) भी मिले हैं ।
2. मोहनजोदड़ो -
हड़प्पा से 483 किमी की दूरी पर यह नगर पाकिस्तान के लरकाना ( सिंध में सिंधु नदी के पूर्वी तट पर बसा हुआ था । मोहनजोदड़ो को पुरातत्त्ववेत्ताओं ने ' मृतकों का टीला ' ( Mound of the Dead ) कहा है । यहाँ का सबसे प्रमुख स्मारक ' विशाल स्नानागार ' ( Great Bath ) है ।
3. चन्हुदड़ो—
यह स्थान मोहनजोदड़ो से दक्षिण - पूर्व में 130 किमी की दूरी पर सिंधु नदी के किनारे स्थित था । यह स्थल भी सिंध , पाकिस्तान में है । यहाँ से भवनों के अवशेष मिले है । यह शिल्प , विशेषतः मनके ( beads ) बनाने का प्रमुख केंद्र था ।
4. लोथल —
यह गुजरात में खंभात की खाड़ी के समीप स्थित है । इस स्थान की खुदाई से अनेक भवनों एवं दुकानों के भग्नावशेष प्रकाश में आए हैं । यहाँ से एक गोदीबाड़ा ( dockyard का भी प्रमाण मिला है जहाँ व्यापारी जहाज ( नाव ) आया करते थे ।
5. धौलावीरा –
1990 में आर . एस . बिष्ट ने इस स्थल का उत्खनन करवाया । यह स्थान गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित है । यहाँ से किलाबंदी का प्रमाण मिला है । यहाँ पर गढ़ी के निर्माण में पत्थर का उपयोग किया गया । हड़प्पा सभ्यता की सभी गढ़ियों में धौलावीरा की गढ़ी ही प्रस्तर निर्मित है ।
6. कालीबंगन -
इसका शाब्दिक अर्थ ' काली चूड़ियाँ ' होता है । राजस्थान के गंगानगर जिला में स्थित यह हड़प्पा सभ्यता का एक प्रमुख स्थल था जो घग्गर ( सरस्वती ) नदी के किनारे बसा हुआ था । अनेक विद्वान इसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के समान हड़प्पा राज्य की तीसरी राजधानी मानते हैं ।
7. बनावली यह स्थल हरियाणा राज्य के हिसार जिला में स्थित है । यहाँ से भी गढ़ी की किलाबंदी तथा हड़प्पा सभ्यता के नगरीय स्वरूप का प्रमाण मिला है ।
इन प्रमुख स्थलों ( नगरो ) के अतिरिक्त हड़प्पा सभ्यता के अन्य उल्लेखनीय स्थल है— सुत्कगेनडोर , डाबरकोट ( बलूचिस्तान ) , कोटदोजी ( सिंध ) , रोपड़ , बाड़ा , संघोल ( पंजाब ) , राखीगढ़ी ( हरियाणा ) , आलमगीरपुर , बड़गाँव , अम्बखेड़ी ( उत्तर प्रदेश ) तथा रंगपुर , रोजदि एवं सुरकोटड़ा ( गुजरात ) ।
हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति
हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति का प्रश्न विवादास्पद है । इस संदर्भ में अनेक मत व्यक्त किए गए हैं । इनमें प्रमुख हैं – ( i ) हड़प्पा सभ्यता के संस्थापक द्रविड़ थे , क्योंकि हड़प्पाई और द्रविड़ लिपियों तथा दोनों की धार्मिक मान्यताओं में समानताएँ पाई जाती है । ( ii ) अनेक विद्वान हड़प्पा सभ्यता को वैदिक सभ्यता अथवा आर्यों की सभ्यता मानते हैं , क्योंकि आर्यों की आरंभिक बस्तियाँ सप्तसैंधव प्रदेश में ही थीं । ( iii ) चोलिस्तान ( थार मरुभूमि से सटा हुआ पाकिस्तान का रेगिस्तानी क्षेत्र ) के हाकरा क्षेत्र ( हाकरा की पहचान सरस्वती नदी से की गई है ) में आरंभिक हड़प्पाकालीन बस्तियों के प्रकाश में आने के बाद कुछ विद्वानों ने सिंधु सभ्यता को सरस्वती सभ्यता का नाम दिया है । ( iv ) मॉर्टिमर हीलर का मानना था कि हड़प्पा सभ्यता की स्थापना एवं विकास सुमेरी ( मेसोपोटामिया ) प्रभाव के कारण हुआ । ( v ) हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति में ईरान - बलूचिस्तान की ग्राम्य संस्कृतियों का योगदान माना गया है । ( vi ) कुछ विद्वान हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति राजस्थान की सोथी और गनेश्वर संस्कृति से मानते हैं । इस प्रकार , हड़प्पा संस्कृति के उदय में विभिन्न मत प्रतिपादित किए गए हैं । इस सभ्यता के उदय और विकास में सिंधु एवं इसकी सहायक नदियों तथा तत्कालीन पर्यावरण और भौगोलिक परिस्थितियों का महत्त्वपूर्ण योगदान था । ईरानी बलूची प्राक् - हड़प्पाकालीन ग्राम्य संस्कृतियों ने भी हड़प्पा सभ्यता के विकास को प्रभावित किया । 7000 ई ० पू ० के लगभग सिंधु घाटी से सटे हुए बलूचिस्तान की पूर्वी सीमा पर कृषक बस्तियों की स्थापना हुई । ई.पू. 5 वीं और 4 थी सहस्राब्दियों में विकास की अनवरत प्रक्रिया के फलस्वरूप 4 थी सहस्राब्दी में नगरीकरण के साक्ष्य प्रकट हुए । बलूचिस्तान के रहमान ढ़ेड़ी में , जो हड़प्पा के ठीक विपरीत है , प्रथम नगर का उदय हुआ ।
हड़प्पा सभ्यता की तिथि
हड़प्पा सभ्यता की निश्चित अवधि भी विवाद का विषय है । विभिन्न विद्वानों ने इस सभ्यता के लिए भिन्न - भिन्न तिथियाँ सुझाई हैं । मोहनजोदड़ो के सप्त स्तरीय भग्नावशेषों तथा मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं को ध्यान में रखते हुए कुछ विद्वानों का मानना है कि इस सभ्यता का विकास 3250-2750 ई ० पू ० के मध्य हुआ । जॉन मार्शल का अनुमान था कि सैंधव सभ्यता का विकास तीसरी सहस्राब्दी ई.पू. में हुआ । मॉर्टिमर ह्वीलर ने इस सभ्यता का समय * 2500-1500 ई . पू . माना है । आधुनिक अनुसंधानों के आधार पर इस सभ्यता के तीन चरण माने गए हैं । आरंभिक चरण लगभग 3500 ई ० पू ० में आरंभ हुआ । द्वितीय चरण ( विकसित ) 2600-1900 ई ० पू ० के बीच तथा तीसरा और अंतिम चरण 1900 ई . पू . से 1200 ई . पू . का था । यह काल उत्तर - नगरीय हड़प्पा संस्कृति अथवा उत्तर - हड़प्पा संस्कृति के नाम से जाना जाता है । इस अंतिम चरण में हड़प्पा संस्कृति के कुछ तत्त्व प्रचलित रहे , परंतु नगरीकरण के तत्त्व विलुप्त हो गए ।
नगर - निर्माण एवं भवन - मोहनजोदड़ो के विशेष संदर्भ में
सिंधु सभ्यता की प्रमुख विशेषता यहाँ की नगर - निर्माण योजना है । नगरों का निर्माण एक सुनिश्चित योजना के अनुसार किया गया था । नगर - निर्माण में आश्चर्यजनक एकरूपता दिखलाई देती है ( कुछ असमानताएँ भी हैं ) , यद्यपि ये नगर एक - दूसरे से बहुत अधिक दूरी पर स्थित थे । प्रत्येक नदी के किनारे अथवा उसके निकट बसा हुआ था । भवनों के निर्माण में एक माप की ईंटों , पकाई गई अथवा धूप में सुखाई गई , का व्यवहार किया गया । पकाई गई ईंटों का व्यवहार जिस स्तर पर हड़प्पा सभ्यता में देखने को मिलता है वह सुमेर अथवा मिस्र में नहीं देखा गया है । नगर - निर्माण में सड़कों , गलियों तथा गंदा पानी के निकासी के लिए नालियों के प्रबंध पर विशेष ध्यान दिया गया । जल - निकासी की उन्नत व्यवस्था इस सभ्यता के नगर - निर्माण की प्रमुख विशेषता है । भवनों का निर्माण भी योजनाबद्ध रूप से किया गया । मोहनजोदड़ो एवं अन्य स्थलों के उत्खनन से इस पर प्रकाश पड़ता है ।
दो - स्तरीय नगर –
हड़प्पा सभ्यता के नगरों का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि वे दो - स्तरीय दिखलाई देते हैं । मोहनजोदड़ो नगर दो भागों में विभक्त था - एक छोटा , लेकिन ऊँचाई पर बना हुआ तथा दूसरा बड़ा , लेकिन नीचे बना हुआ । ऊँचाई पर बने भाग को पुराविद गढ़ी अथवा दुर्ग मानते हैं तथा निचले भाग को निचला शहर । दुर्ग का निर्माण कच्ची ईंटों के चबूतरे पर हुआ था । इसे दीवार से घेरकर निचले शहर से अलग कर दिया गया था । दुर्ग की घेराबंदी बाढ़ एवं आक्रमण से सुरक्षा तथा दोनों नगरों के बीच आवागमन को नियंत्रित करने के लिए की गई थी । मोहनजोदड़ो के अतिरिक्त हड़प्पा , कालीबंगन , लोथल , सुरकोटड़ा , धौलावीरा से भी दो - स्तरीय नगर विन्यास का प्रमाण मिला है । धौलावीरा में दुर्ग के निर्माण में पत्थर का भी व्यवहार किया गया था । धौलावीरा का दुर्ग हड़प्पा सभ्यता में प्राप्त सभी दुर्गों में सबसे अधिक प्रभावशाली है । निचले नगर की भी घेराबंदी की जाती थी । धौलावीरा तथा लोथल में तो पूरी बस्ती की घेराबंदी का प्रमाण मिलता है । हड़प्पा सभ्यता के नगर - निर्माण को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इसके निर्माण में हजारों मजदूरों ने योगदान किया होगा । साथ ही , इनका निर्माण कुशल देखरेख में करवाया गया होगा । पुराविदों ने अनुमान लगाया है कि गढ़ी में शासक वर्ग के तथा निचले शहर में सामान्य वर्ग के लोग निवास करते थे , क्योंकि सभी महत्त्वपूर्ण भवन गढ़ी के अंदर बने हुए थे ।
मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार-
-मोहनजोदड़ो का सबसे प्रमुख भवन विशाल स्नानागार ( Great Bath ) है । यह दुर्ग के भीतर बना एक आयताकार जलाशय था । यह चारों ओर से एक गलियारे से घिरा हुआ था । इसकी लंबाई करीब 12 मीटर , चौड़ाई 7 मीटर और गहराई 2.5 मीटर थी । इस जलकुंड में अंदर प्रवेश करने के लिए दक्षिणी और उत्तरी सिरों पर ईंटों की सीढ़ियाँ बनाई गई थीं । फर्श के निर्माण में विशेष सावधानी बरती गई थी । यह पकी ईंटों का बना हुआ था । जलाशय के तीनों ओर कमरे बने हुए थे , जो संभवतः दो मंजिला थे । इन कमरों में संभवतः पुरोहित रहते थे । एक कमरा में एक बड़ा कुआँ था जिसका जल जलाशय में आता था । जलाशय के पानी के निकास के लिए एक बड़ा नाला बना हुआ था । जलाशय के उत्तर में एक गली के दूसरी ओर आठ छोटे स्नानघर बने हुए थे । प्रत्येक स्नानघर से नालियाँ गलियारे के साथ बने एक बड़े नाले में गिरती थीं । पुराविदों का अनुमान है कि इस जलाशय का व्यवहार आनुष्ठानिक स्नान के लिए होता था । धौलावीरा में भी एक विशाल जलकुंड प्रकाश में आया है । संभवतः इसका व्यवहार भी आनुष्ठानिक स्नान अथवा खेतों की सिंचाई के लिए किया A जाता था ।
अन्नागार -
सिंधु सभ्यता में अन्नागार का विशेष महत्त्व था । मेसोपोटामिया में अतिरिक्त उत्पादन अथवा कर के रूप में वसूला जानेवाला अनाज मंदिरों में सुरक्षित रखा जाता था , वहाँ सिंधु सभ्यता में इसका संचय करने के लिए अन्नागार बनवाए गए थे । ऐसे अन्नागार मोहनजोदड़ो , हड़प्पा , कालीबंगन , चन्हुदड़ो , लोथल जैसे स्थलों से प्रकाश में आए हैं । इन्हें गढ़ी के अंदर बनाया गया था । मोहनजोदड़ो का अन्नागार सबसे बड़ा था । यह करीब 45.72 मीटर लंबा और 15.23 मीटर चौड़ा था । इसका मुख्य प्रवेशद्वार नदी की ओर था । हड़प्पा के दुर्ग में भी 6-6 की संख्यावाले ईंटों के चबूतरे मिले हैं । इन्हें भी अन्नागार माना गया है । प्रत्येक अन्नागार की लंबाई - चौड़ाई 15.23 x 6.09 मीटर थी । इन सभी अन्नागारों का सम्मिलित क्षेत्रफल 838 घन मीटर था जो मोहनजोदड़ो के अन्नागार के बराबर था । हड़प्पा में अन्नागार के पास खुले फर्श पर दो कतारों में ईंटों के वृत्ताकार चबूतरे भी बने मिले हैं । इनका उपयोग फसलों की दॅवरी के लिए किया जाता था ।
विशिष्ट भवन-
मोहनजोदड़ो से एक विशाल भवन का खंडहर मिला है । यह 20 खंभों पर टिका हुआ था । इसे सभागार या मुख्य बाजार माना गया है । राजमहल सदृश एक भवन भी मोहनजोदड़ो से प्रकाश में आया है ।
लोथल का गोदीबाड़ा –
लोथल के उत्खनन से एक बहुत विशाल जलकुंड प्रकाश में आया है । यह 218 मीटर लंबा , 37 मीटर चौड़ा तथा 3.3 मीटर गहरा था । यह पक्की ईंटों का बना था । इसकी उत्तरी दीवार में एक चौड़ा प्रवेशद्वार था जो एक विशाल नाला या नहर के द्वारा नदी से जुड़ा हुआ था । एस ० आर ० राव इसे गोदीबाड़ा मानते हैं , जहाँ व्यापारिक जहाज आते - जाते थे । गोदी के पास ही एक गोदाम से बड़ी संख्या में मुहरें भी मिली हैं । इससे लोथल के एक व्यापारिक केंद्र होने की पुष्टि होती है ।
आवासीय भवन -
हड़प्पा सभ्यता में भवनों का निर्माण सुनिश्चित योजनानुसार किया गया है । प्रत्येक घर के मध्य में एक बड़ा आँगन होता था जिसके चारों ओर कमरे बनाए जाते थे । घर था । मोहनजोदड़ो के निचले शहर और अन्य स्थलों से आवासीय भवनों की जानकारी मिलती के अंदर रसोईघर , स्नानागार एवं शौचालय की व्यवस्था रहती थी । घर में कुआँ और नाली की भी व्यवस्था थी । मकान इस प्रकार बनाए जाते थे कि प्रवेशद्वार से आँगन सीधा दिखलाई नहीं देता था । भूमितल पर बनाए गए मकानों में खिड़कियाँ नहीं बनाई जाती थीं । कुछ मकानों मे ऊपरी तल पर जाने के लिए सीढ़ियाँ भी बनाई गई थीं । मकानों में सामान्यतः एक हो अनुपात की पकाई गई ईंटों का व्यवहार किया जाता था । धौलावीरा में भवन सामग्री के रूप में पत्थर का व्यवहार भी होता था । मकान की दीवारों को मिट्टी का लेप चढ़ाकर उन्हें चिकना बनाया जाता कमरोंवाले बड़े मकान थे तो कुछ एक मंजिले , कम कमरेवाले छोटे मकान मकानों के आकार था । फर्श ईंट से बनाया जाता था । भवन विभिन्न आकार के बनाए गए । कुछ बहुमंजिले , अनेता से सामाजिक वर्गीकरण एवं गरीबी - अमीरी का बोध होता था । बड़े मकान धनी वर्ग के लिए तथा छोटे सामान्य लोगों के लिए बनाए गए थे ।
मजदूरों के आवास —
मोहनजोदड़ो में बैरकनुमा दो पंक्तियों में बने 16 मकान मिले हैं । इनमें एक बड़ा और एक छोटा कमरा है । हड़प्पा में दुर्ग की दीवार के निकट दो पंक्तियों में 15 छोटे - छोटे दो कमरेवाले मकानों की श्रृंखला मिली है । इनके समीप ही भट्टियाँ मिली हैं । इससे अनुमान लगाया गया है कि इनमें धातु का काम करनेवाले श्रमिक रहते थे । चन्हुदड़ो से भी मजदूरों की बस्ती या कारखाना का प्रमाण मिला है ।
सड़कों एवं गलियों की व्यवस्था—
हड़प्पाई नगर - निर्माण की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि नगरों में आवागमन की सुविधा के लिए सड़कों की समुचित व्यवस्था की गई थी । संपूर्ण नगर में सड़कों एवं गलियों का जाल - सा ( ग्रिड प्रणाली ) बिछा हुआ था । सड़कें चौड़ी थी तथा वे छोटी - छोटी उप - सड़कों एवं गलियों से जुड़ी हुई थी । ये एक - दूसरे को समकोण पर काटती थी । फलस्वरूप , संपूर्ण नगर अनेक वर्गाकार आयतों या खंडों में विभक्त नजर आता था । मोहनजोदड़ो का प्रमुख मार्ग 9.14 मीटर चौड़ा था । गलियाँ भी 3 मीटर चौड़ी थीं । सड़कों की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता था । सड़कों के किनारे गड्ढे बने हुए थे जिनमें जाता था । सड़कों को किनारे से ढालवाँ बनाया जाता था जिससे सड़कों पर पानी का जमाव न कूड़ा फेंका हो सके । पीने के पानी का प्रबंध पीने के पानी के लिए कुएँ बनवाए जाते थे । लगभग प्रत्येक बड़े घर में कुआँ की व्यवस्था की गई थी । सिर्फ मोहनजोदड़ो में लगभग 700 कुएँ थे । कुछ सार्वजनिक कुएँ गलियों में भी बनवाए गए थे । लोथल से भी सार्वजनिक कुआँ प्रकाश में आया है । जल निकासी का प्रबंध – हड़प्पा नगर निर्माण योजना की एक अन्य विशेषता जल निकासी की व्यवस्था थी । पहले नालियों के साथ गलियों को बनाया गया । इसके बाद उनके अगल - बगल घर बनवाए गए । प्रत्येक घर की नाली मुख्य नाली से आकर मिलती थी । नालियों का निर्माण पक्की ईंटों से किया जाता था । इन नालियों को ईंट - पत्थर से ढँक दिया जाता था । नालियों की सफाई के लिए बीच - बीच में गड्ढे भी बनाए गए थे । मोहनजोदड़ो के अतिरिक्त अन्य स्थलों से भी , जैसे लोथल से नालियों के साक्ष्य मिले हैं ।
हड़प्पा सभ्यता के निवासियों ने नालियों के निर्माण पर जितना अधिक ध्यान दिया , उतना प्राचीनकाल में मिस्र अथवा मेसोपोटामियावालों ने भी नहीं दिया । यह हड़प्पा नगर - निर्माण योजना की विशिष्टता है ।
अर्थव्यवस्था या निर्वाह की व्यवस्था
सिंधु सभ्यतावाले जीवन निर्वाह के लिए पशुपालन , कृषि , शिल्प - उद्योग एवं व्यापार - वाणिज्य पर आश्रित थे । किसान अपनी आवश्यकता से अधिक अनाज का उत्पादन करते थे । इसी अतिरिक्त उत्पादन के आधार पर कारीगर , व्यापारी , प्रशासनिक अधिकारी हड़प्पाई नगरों में निवास करते थे । पशुपालन - पशुओं का आर्थिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान था । इनसे दूध , मांस , ऊन मिलते थे । साथ ही हल जोतने , बोझ ढोने एवं गाड़ी खींचने में भी वे सहायक थे । उत्खननों से अनेक जानवरों की हड्डियाँ मिली है । इसके आधार पर पुरा - प्राणिविज्ञानियों ( archaeozoologists ) ने इनके पालतू होने का अनुमान लगाया है । जंगली प्रजाति के जानवरों की भी हड्डियाँ मिली हैं । बैल , भैंस , बकरा , भेड़ , सूअर पालतू थे । कुत्ता - बिल्ली भी पाले जाते थे । गदहा और ऊँट भी घरों में रखे जाते थे । मोहनजोदड़ो , लोथल , सुरकोटड़ा से घोड़ा के व्यवहार में होने का अस्पष्ट प्रमाण मिला है , परंतु घोड़ा का विशेष प्रचलन नहीं था । हाथी से वे परिचित थे । जंगली प्रजातियों यथा बाघ , सिंह , गैंडा , हिरण , घड़ियाल की भी उन्हें जानकारी थी । इनमें से अनेक पशुओं एवं जानवरों की हड्डियाँ पाई गई है । साथ ही , इनका प्रतिरूपण मिट्टी की मूर्तियों एवं मुहरों में भी देखा जा सकता है । पशुपालन के साथ - साथ पशु - पक्षियों का शिकार करना तथा मछली पकड़ना भी जीवन निर्वाह का साधन था ।
कृषि -
हड़प्पा सभ्यता में कृषि का बड़े स्तर पर विकास हुआ । कृषि पद्धति के संबंध में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है , परंतु उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कुछ अनुमान लगाए गए हैं । संभवतः खेतों को हल की सहायता से जोता जाता था । हल बैलों या ऊँटों द्वारा खींचे जाते थे । हल संभवतः लकड़ी के बने थे । चोलिस्तान के अनेक स्थलों तथा बनावली से मिट्टी के बने हल के प्रतिरूप मिले हैं । कालीबंगन के प्राक् - हड़प्पा स्तर से खेत की जुताई का प्रमाण मिला है । यहाँ से दो समानांतर और एक - दूसरे को समकोण पर काटते हुए हल - रेखा के प्रमाण मिले हैं । इससे अनुमान लगाया गया है कि एक साथ दो अलग - अलग फसलें उगाई जाती थीं । फसलो की कटाई के लिए पत्थर अथवा काँसे के छोटे हथियारों को लकड़ी के हत्थे में लगाकर व्यवहार में लाया जाता था । डंठलों को पीटकर अनाज को अलग किया जाता था । अनाज कूटने - पीसने के लिए पत्थर की ओखली मूसल एवं चक्की का व्यवहार किया जाता था । खेतों की सिंचाई के लिए , विशेषतः बलूचिस्तान और अफगानिस्तान में गड्ढा बनाकर इनमें सिंचित जल नहरों या नालों द्वारा खेतों में पहुँचाया जाता था । अफगानिस्तान के शोर्तुघई नामक स्थान से हड़प्पाकालीन नहरों के प्रमाण मिले हैं । धौलावीरा एवं लोथल के जलाशयों तथा कुओं का जल भी संभवतः सिंचाई के लिए व्यवहार में लाया जाता था । हड़प्पा सभ्यता में अनेक अनाज के दाने मिले हैं । इनमें गेहूँ , जौ , सफेद चना तथा तिल सम्मिलित हैं । बाजरा के दाने गुजरात में मिले हैं । सरसों , राई तथा कपास की भी खेती की जाती थी । धान की खेती के प्रमाण भी कुछ स्थलों , जैसे लोथल और रंगपुर से मिले हैं , परंतु इनकी खेती सीमित क्षेत्र में होती थी । गेहूँ और जौ ही प्रमुख उपज थे । कपास की खेती सबसे पहले सिंध क्षेत्र में ही आरंभ हुई । सिंधुवासी खजूर , तरबूज , नारियल , नींबू तथा अनेक प्रकार की सब्जियाँ भी उगाते थे । अतिरिक्त अनाज अन्नागारों में सुरक्षित रखा जाता था । कर की वसूली भी अनाज के रूप में की जाती थी । अन्नागारों में सुरक्षित अनाज का व्यवहार संभवतः श्रमिकों को मजदूरी देने अथवा संकटकालीन स्थिति का सामना करने के लिए किया जाता था ।
शिल्प एवं उद्योग –
सिंधु सभ्यता में विभिन्न शिल्पों एवं उद्योगों का विकास हुआ । इनमें प्रमुख हैं - धातु के सामान बनाना , मिट्टी के बर्तन , मूर्तियाँ , ईंट एवं खिलौने बनाना , पत्थर एवं लकड़ी के सामान बनाना , वस्त्र बुनना तथा मनके एवं मुहर बनाना ।
धातुगिरी-
हड़प्पा सभ्यता में टीन और ताँबा को मिलाकर काँसा बनाने की तकनीक विकसित हो चुकी थी । इनसे बर्तन , औजार एवं हथियार बनाए जाते थे । काँसे की बनी सुराही , लंबी एवं छोटी कुल्हाड़ियाँ , लकड़ी चीरने का आरा और मछली पकड़ने का काँटा उत्खननों से मिले है । ताँबे की बनी तलवारें , छुरे और दर्पण पाए गए है । धातु से मूर्तियाँ भी बनाई जाती थीं । इनमें सबसे अधिक विख्यात है मोहनजोदड़ो से प्राप्त काँसे की बनी ' नर्तकी की मूर्ति । ' हड़प्पा से ताँबा की इक्कागाड़ी तथा चन्हुदड़ो से ताँबा की बनी दो गाड़ियों की अनुकृतियाँ मिली हैं । हड़प्पावासी लोहा से अपरिचित थे , परंतु सोने - चाँदी के आभूषण बनाए जाते थे । लोथल से एक सुंदर कंठहार मिला है जो सोने के अनेक मनकों से बना है । मिट्टी के सामान बनाना - मिट्टी से बड़ी संख्या में निश्चित अनुपात की ईंटें बनाई जाती थीं । इन्हें आग में पकाया जाता था अथवा धूप में सुखाया जाता था । चाक की सहायता से विभिन्न में आकार - प्रकार के उपयोगी बर्तन बनाए जाते थे । इनमें घड़ा , हाँड़ी , प्याला , थाली , सुराही और बड़े नाद प्रमुख हैं । आधार पर तश्तरी ( dish - on - stand ) हड़प्पा के विशिष्ट बर्तन है । बर्तनों को लाल रंग में रैंगकर उनपर चित्र बनाए जाते थे । चित्रों में सबसे प्रमुख कई वृत्तों की रचना , त्रिकोणनुमा डिजाइन , पशु - पक्षियों , वृक्षों एवं प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण है । पशु - पक्षियों की आकृतिवाले आकर्षक मिट्टी के खिलौने , खिलौना गाड़ियाँ एवं मिट्टी की बनी मूर्तियाँ बड़ी संख्या में मिली है ।
पत्थर के सामान
-धातु का व्यवहार प्रचलित होते हुए भी हड़प्पा सभ्यता में पत्थर के सामान भी बनाए गए । इनमें बर्तन , चक्कियाँ ( अवतल चक्कियाँ ) ओखली मूसल , सिल - बट्टा ( सालन पत्थर ) एवं कुछ उपकरण प्रमुख है । पत्थर से बाट - बटखरा भी बनाए गए । अर्द्धबहुमूल्य पत्थरों के आभूषण एवं मनका बनाए गए । पत्थर की मूर्तियाँ भी बनाई गई । मोहनजोदड़ो से योगी या पुजारी एवं हड़प्पा से नर्तक की मूर्ति मिली है ।
लकड़ी के सामान -
हड़प्पा सभ्यता में बढ़ींगरी भी उन्नत अवस्था में थी । लकड़ी के फर्नीचर एवं दरवाजे बनाए जाते थे । यातायात एवं व्यापार की सुविधा के लिए बैलगाड़ी एवं नाव बनाए जाते थे ।
बस्त्र उद्योग-
इस सभ्यता के निवासियों को सूत कातने , वस्थ बुनने , उन्हें सीने , रंगने एवं उनपर कसीदा करने की कला ज्ञात थी । सिंधु प्रदेश में कपास की खेती बहुतायत से होती थी । इसलिए , वस्त्र उद्योग को बढ़ावा मिला । सूती और ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र बुने जाते थे । मोहनजोदड़ो से बुने गए वस्त्र का एक टुकड़ा मिला है । अनेक वस्तुओं पर वस्त्र के छाप भी पाए गए हैं । उत्खननों के दौरान बड़ी संख्या में सूत कातने के तकुए ( spindle whorls ) , वस्त्र बुनने की चरखियाँ एवं वस्त्र सीनेवाली सूइयाँ प्राप्त हुई हैं ।
मनका बनाना -
कारीगरों का एक विशिष्ट वर्ग अर्द्धबहुमूल्य पत्थर , सेलखड़ी , फयान्स , मिट्टी , ताँबा , काँसा , सोना , शंख इत्यादि से सुंदर मनके बनाता था । ये विभिन्न आकार के होते थे जैसे चक्राकार , बेलनाकार , गोलाकार और ढोलकाकार कुछ मनके दो पत्थरों को जोड़कर बनाए जाते थे । कुछ के शीर्ष पर सोना लगाया जाता था । इन्हें सुंदर चित्रों से सुसज्जित किया जाता था । मनके बनाने की तकनीक पदार्थ के अनुसार बदलती रहती थी । कुछ मनके साँचे में ढालकर बनाए जाते थे । कुछ पत्थरों को आग में पकाया जाता था । पत्थर को घिसकर उसपर पॉलिश की जाती थी । चन्हुदड़ो लोथल और धौलावीरा से मनकों में छेद करने के उपकरण मिले हैं । चन्हुदड़ो मनका उत्पादन का प्रमुख केंद्र था । मनको से मुख्यतः आभूषण बनाए जाते थे ।
मुहर ( seal ) बनाना
मुहर हड़प्पा सभ्यता की सबसे विशिष्ट उपलब्धि है । बड़ी संख्या में पत्थर , हाथीदांत , धातु तथा मिट्टी से बनी मुहरे प्राप्त हुई हैं । मुहरे विभिन्न आकार प्रकार की है । इनपर मानव एवं पशु - पक्षियों के चित्र उत्कीर्ण हैं । मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर तीन मुख और दो सींगवाले एक विचित्र मानव आकृति को चित्रित किया गया है । उसके चारों ओर जानवर दिखलाए गए हैं । अनेक मुहर लिपियुक्त भी हैं । की मुहरे S इस प्रकार , सिंधु सभ्यता में विभिन्न शिल्पों , उद्योगों एवं उनसे जुड़े हुए व्यवसायों का विकास हुआ । जौहरी , चिकित्सक , मकान बनानेवालों का व्यवसाय भी उन्नत स्थिति में था । हाथीदाँत से प्रसाधन की सामग्री जैसे कंघी तथा अन्य उपयोगी सामान बनाए गए ।
व्यापार वाणिज्य -
हड़प्पा सभ्यता की आर्थिक व्यवस्था का आधार व्यापार वाणिज्य भी था । हड़प्पा सभ्यता क्षेत्र के स्थलों के अतिरिक्त विदेशों से भी व्यापार होता था । सिंधु क्षेत्र में शिल्प एवं उद्योगों के लिए अर्द्धबहुमूल्य पत्थरों एवं धातुओं तथा अन्य कच्चे माल की कमी थी । कच्चा माल प्राप्त करने के लिए हड़प्पा सभ्यतावालों ने दो विधियाँ अपनाई । पहली , उनलोगों ने उन स्थानों में बस्तियाँ बसाई जहाँ कच्चा माल बहुतायत में उपलब्ध था । उदाहरण के लिए , नागेश्वर एवं बालाकोट जहाँ शंख मिलता था , शोर्तुघई जो लाजवर्त के लिए विख्यात था तथा लोथल जहाँ कार्नीलियन उपलब्ध था । गुजरात और राजस्थान में सेलखड़ी एवं ताँबा प्राप्य था इसलिए वहाँ भी बस्तियाँ बसाई गई । कच्चा माल प्राप्त करने की दूसरी विधि थी जिन क्षेत्रों में कच्चा माल उपलब्ध था वहाँ व्यापारियों को भेजकर इन्हें प्राप्त करना । इन्हें नाव , जहाज या सड़कमार्ग से लाया जाता था । धातु के सिक्के का प्रचलन नहीं था । इसलिए , सारा व्यापार वस्तु विनिमय के द्वारा होता था । व्यापार में व्यापारी अपनी मुहर का व्यवहार करते थे । कच्चे माल के बदले अनाज अथवा निर्मित वस्तुओं का विनिमय करते थे । हड़प्पा सभ्यतावाले चाँदी ईरान और अफगानिस्तान से , सोना मैसूर से , ताँबा राजस्थान के खेतड़ी ( गणेश्वर - जोधपुरा संस्कृति ) से , टीन अफगानिस्तान , ईरान तथा राजस्थान से , अर्द्धबहुमूल्य पत्थर ( लाजवर्त , गोमेद , मूँगा , पन्ना इत्यादि ) अफगानिस्तान , ईरान , महाराष्ट्र , सौराष्ट्र , राजस्थान और कश्मीर से मँगवाया करते थे । अंतरदेशीय और निकटवर्ती क्षेत्रों ( ईरान , अफगानिस्तान ) के अतिरिक्त हड़प्पावालों के सुदूर क्षेत्रों से भी व्यापारिक संपर्क थे । वे अरब प्रायद्वीप एवं मेसोपोटामिया से भी व्यापार करते थे । पुरातात्त्विक प्रमाण यह इंगित करते हैं कि ओमान से ताँबा मँगवाया जाता था । इसकी पुष्टि सुमेरी अभिलेखों से भी होती है । ई.पू. तीसरी सहस्राब्दी के कुछ अभिलेखों में , जो सुमेर के ऊर नगर से पाए गए हैं , इस बात का उल्लेख है कि नगर के व्यापारी मेलुहा ( सिंधु प्रदेश ) से कार्नीलियन , लाजवर्त , ताँबा , सोना तथा विभिन्न प्रकार की लकड़ियाँ प्राप्त करते थे । इस लेख में मेलुहा और सुमेर के बीच दो व्यापारिक केंद्रों दिलमुन ( बहरीन द्वीप ) और मगान ( ओमान ) का भी उल्लेख मिलता है । मेलुहा को नाविकों का देश कहा गया है जहाँ हाजा पक्षी ( मोर ) थे सिंधु सभ्यता की मुहरें , मनके मेसोपोटामिया में मिली हैं । यहाँ तक कि सुमेर से प्राप्त एक कपड़े के टुकड़े पर सिंधुघाटी की सभ्यता की मुहर लगी पाई गई हैं । अनेक सुमेरी वस्तुएँ सिंधुघाटी से भी मिली हैं । इनसे व्यापारिक संपर्कों की पुष्टि होती है । इस प्रकार , कृषि के अतिरिक्त उत्पादन , शिल्प - उद्योगों और व्यापार वाणिज्य ने हड़प्पाई नगरों का उदय संभव बना दिया । भारत में पहली बार नगर हड़प्पा सभ्यता में ही देखे जाते हैं । अतः यह सभ्यता भारत के प्रथम नगरीकरण ( First Urbanisation ) का काल था ।
बाट - बटखरे एवं माप -
तौल व्यापार - वाणिज्य के विकास के लिए तौलने एवं मापने की विधि भी विकसित हुई । उत्खननो के दौरान पत्थर के बने अनेक बाट - बटखरे मिले हैं जिनमें बड़े - छोटे दोनों हैं । बड़े बाट बड़ी वस्तुओं तथा छोटे बाट आभूषण एवं मनकों को तौलने के लिए थे । तौलने के लिए 16 एवं इसके गुणक अंक ( 16 , 64 , 160 इत्यादि ) का व्यवहार किया जाता था । धातु - निर्मित तराजू के पलड़े भी मिले हैं । मोहनजोदड़ो से सीप का बना एक मापदंड तथा लोथल से हाथीदाँत का बना एक पैमाना भी मिला है । व्यापारी अपने सामान को थैला में • बंदकर उसपर अपनी मुहर लगा देते थे ।
सामाजिक जीवन
सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं - वर्ग संरचना , सामाजिक विभेद , आहार , वस्त्र आभूषण , रहन - सहन , मनोरंजन एवं शवाधान की विधियों की जानकारी हमें पुरातात्त्विक साक्ष्यों से होती है ।
सामाजिक संगठन
हड़प्पाई परिवार के विषय में स्पष्ट जानकारी नहीं है । संभवतः , परिवार बड़े होते थे । पुरास्थलों से बड़ी संख्या में प्राप्त स्त्री मृणमूर्तियों को देखकर यह अनुमान लगाया गया है कि समाज में मातृसत्तात्मक तत्त्व प्रभावशाली थे । मकानों के आकार - प्रकार के आधार पर पुराविदों ने सामाजिक संगठन की कल्पना की है । दुर्गों या गढ़ी में शासक वर्ग के लोग रहते थे । बड़े एवं आरामदायक मकानों में धनी वर्ग , इनसे कम छोटे मकानों में मध्यम वर्गवाले तथा बैरकनुमा मकानों में श्रमिक रहते थे । किसानों के मकान छोटे होते होंगे । इस प्रकार , समाज में प्रशासक एवं प्रशासनिक अधिकारी ( प्रशासनिक वर्ग ) , पुजारी , व्यापारी , सैनिक अधिकारी ( कुलीन वर्ग ) , छोटे व्यापारी , कारीगर एवं कृषक ( मध्यम वर्ग ) , लिपिक तथा श्रमजीवी मजदूर ( निम्न वर्ग ) थे ।
रहन - सहन का स्तर -
सिंधुवासियों के आहार में अनाज की बनी वस्तुएँ , दूध , फल , सब्जी एवं मांस - मछली प्रमुख थे । भोजन पकाने तथा खाने के लिए मिट्टी , पत्थर एवं धातु के बर्तन व्यवहार में लाए जाते थे । सूती एवं ऊनी वस्त्रों का व्यवहार होता था । पुरुष ऊपरी वस्त्र को चादर के समान ओढ़ते थे । मोहनजोदड़ो से प्राप्त ' योगी ' या ' पुजारी ' की मूर्ति को चादर ओढ़े हुए दिखलाया गया है । कमर के नीचे पुरुष धोती के समान वस्त्र पहनते थे । स्त्रियाँ कमर में घाँघरा के समान वस्त्र पहनती थी । वे सिर पर एक विशेष प्रकार का शिरस्त्राण धारण करती थीं जो पंखे के समान उठा रहता था । वस्त्रों को सिलकर उन्हें रंगकर उनपर कशीदाकारी भी की जाती थी । पुरुष - स्त्री दोनों आभूषणप्रिय थे । आभूषणों में प्रमुख थे हार , कंगन , पाजेब , बाली एवं अंगूठी स्त्रियाँ चूड़ियाँ भी पहनती थी । कालीबंगन में काले रंग की चूड़ियाँ बनाई जाती थीं , क्योंकि इसका शाब्दिक अर्थ काली चूड़ियाँ लगाया गया है । स्त्री - पुरुष बाल - विन्यास पर विशेष ध्यान देते थे । कुछ पुरुष दाढ़ी - मूँछ एवं लंबा बाल रखते थे तो कुछ नहीं । स्त्रियाँ लंबे बाल रखने , जूड़ा - चोटी बाँधने की शौकीन थी । वे काजल लगाने , होंठ एवं नाखून रँगने की भी शौकीन थी । प्रसाधन के लिए दर्पण एवं कंघी का व्यवहार किया जाता था । विभिन्न प्रकार की टोपियों एवं पगड़ियों के पहनने का भी प्रचलन था ।
मनोरंजन के साधन– जानवरों का शिकार करना , मछली पकड़ना एवं पक्षियों की लड़ाई देखना मनोरंजन के साधन थे । एक मुहर पर दो जंगली मुर्गों के लड़ने का चित्र उत्कीर्ण है । नृत्य - संगीत मनोरंजन का सबसे प्रमुख साधन था । मुहरों पर वाद्ययंत्रों के चित्र तथा नर्तक एवं नर्तकियों की मूर्तियाँ मिली है । इनमें सबसे अधिक आकर्षक है मोहनजोदड़ो से प्राप्त काँसे की बनी नर्तकी की मूर्ति । पासा या चौपड़ तथा शतरंजनुमा खेल गोटियों की सहायता से खेले जाते थे । बच्चों के मनोरंजन के लिए विभिन्न प्रकार के खिलौने , जिनमें कुछ मानव आकृतिवाले तथा कुछ पशु - पक्षी की आकृतिवाले हैं , मिले हैं । मिट्टी की गाड़ियाँ , गोलियाँ , सीटियाँ , झुनझुने इनमें प्रमुख है ।
शवाधान की विधि -हड़प्पा सभ्यता में शवाधान की अनेक विधियाँ प्रचलित थी । इनमें सबसे प्रमुख थी शव के सिर को उत्तर दिशा की ओर रखते हुए गर्त अथवा कब्र में दफनाना । कुछ स्थानों पर कब्र की सतह को पक्की ईंटों से बनाया गया था । कुछ कब्रों में मिट्टी के बर्तन , मनके , आभूषण , ताँबे के दर्पण पाए गए हैं । धौलावीरा में कब्र के निर्माण में पत्थर का भी व्यवहार किया गया । शवाधान की एक दूसरी विधि के अनुसार , शव के भस्मावशेषों को मिट्टी के कलश में रखकर दफना दिया जाता था । नदियों के किनारे बसे होने के कारण सिधुवासी अपने मृतकों का प्रवाह नदियों में भी करते होंगे । सामाजिक जीवन से संबद्ध जो पुरातात्त्विक साक्ष्य मिले हैं वे स्पष्ट रूप से आर्थिक आधार पर वर्ग - विभेद की ओर इंगित करते हैं । संपन्न वर्ग महँगे धातु , अर्द्धबहुमूल्य पत्थर के आभूषण और अन्य वस्तुओं का व्यवहार करते थे जबकि मध्यवर्गवाले सामान्य वस्तुओं का धनी वर्ग की कब्रों की विशेष बनावट होती थी तथा उनमें मृतकों के उपयोग की वस्तुएँ रखी जाती थीं । सामान्य लोगों के साथ ऐसी बात नहीं थी ।
धार्मिक विश्वास एवं प्रमुख देवी - देवता
प्राचीन विश्व की अन्य सभ्यताओं के ही समान सिंधु सभ्यतावाले भी बहुदेववादी और प्रकृतिपूजक थे । वे प्रकृति की विभिन्न शक्तियों यथा अग्नि , वृक्ष , जल , पशु आदि की पूजा करते थे । मुहरों पर उत्कीर्ण चित्रों तथा अन्य पुरावशेषों के आधार पर इस सभ्यता के लोगों की धार्मिक प्रथाओं की जानकारी मिलती है । मातृदेवी की पूजा- हड़प्पा , मोहनजोदड़ो तथा अन्य स्थानों से मिट्टी से बनी स्त्रियों की मूर्तियाँ बड़ी संख्या में मिली हैं । कुछ मूर्तियों में स्त्री को शिशु को दूध पिलाते हुए दिखलाया गया है । एक मूर्ति में स्त्री के गर्भ से एक पौधे को निकलते हुए दिखलाया गया है । एक अन्य मूर्ति में एक स्त्री के सिर पर एक पक्षी पंख फैलाए बैठा है । ये सभी मूर्तियाँ मातृदेवी की प्रतीक मानी गई हैं । मातृदेवी की पूजा माता , उर्वराशक्ति की प्रतीक तथा पशु - पक्षियों की देवी के रूप में की जाती थी । हड़प्पा सभ्यता में मातृदेवी का वही स्थान था जो मिस्र की सभ्यता में नील नदी की देवी इसिस ( Isis ) का था । पशुपति की पूजा – सिंधु सभ्यता के पुरुष देवता में सबसे प्रधान पशुपति या आद्य- शिव थे । मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर तीन मुख और दो सींगवाले योगी की मुद्रा अंकित है । योगी पालथी मारकर बैठा हुआ है । इसके चारों ओर क्रमशः हाथी , बाघ , गैंडा तथा भैंस खड़े दिखलाए गए हैं । योगी के आसन के नीचे दो मृगों की आकृतियाँ बनी हैं । इन जानवरों को देवता का वाहन माना गया है । इस मूर्ति को योगीश्वर ' अथवा ' पशुपति महादेव ' माना गया है । परंतु , मुहर में साँड़ को नहीं दिखलाया गया है , जो शिव का वाहन माना जाता है । अन्य अनेक मुहरों में शिव के नारी - रूप , नागधारी - रूप , धनुर्धर - रूप एवं नर्तक रूप का चित्रण किया गया है । मातृदेवी की मृणमूर्ति पशुपति की मुहर प्रजनन - शक्ति की पूजा- हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से बड़ी संख्या में पत्थर एवं सीप के बने छोटे - बड़े लिंग एवं स्त्री योनियाँ मिली हैं जिनकी पूजा सिंधु सभ्यता में की जाती थी । लिंग - योनि की पूजा को भी शिव पूजा से संबद्ध माना गया है ।
वृक्ष पूजा - सिंधु सभ्यता में वृक्षपूजा भी प्रचलित थी । वृक्षों में सबसे प्रमुख पीपल का वृक्ष था अनेक मुहरों पर वृक्षों तथा इनसे संबद्ध देवी देवताओं के चित्र मिलते हैं । एक मुहर में पीपल की डालों के बीच एक देवता को दिखलाया गया है , जिसकी आराधना सात स्त्रियाँ कर रही हैं । इनमें एक पशु का भी चित्र है , जिसकी आकृति बैल और बकरी से मिलती - जुलती देने तथा पशुओं और सर्पों द्वारा वृक्षों की रक्षा करने का चित्र भी अंकित किया गया है । इनसे संभवतः पीपल देवता का चित्र है । कुछ अन्य मुहरों में वृक्ष - देवता के सम्मान में बकरी की बलि है । यह में वृक्षपूजा की महत्ता स्पष्ट होती है ।
पशु एवं नागपूजा
सिंधुवासी पशुओं एवं सर्पों की भी पूजा करते थे । इन्हें देवताओं वाहन माना जाता था । मुहरों पर अनेक पशुओं के चित्र मिलते हैं । इनमें सबसे प्रमुख कुबड़दार का साँड़ गैडे था । एक सींगवाले से की गई है । मिट्टी जानवर या की बनी पशुओं की एकशृंगी ( unicorn ) के चित्र भी मिले हैं । इसकी पहचान अनेक मूर्तियाँ मिली है । मानव एवं पशुओं की आकृतियों को मिलाकर भी मूर्तियाँ बनाई जाती थी जैसे मानव मुखवाला बकरा । इस प्रकार की आकृतियाँ प्राचीन मिस्र में भी बनाई जाती थी और उन्हें देवता माना जाता था । पशुपति के साथ दिखलाए गए जानवरों एवं नाग की पूजा भी की जाती थी ।
जल एवं प्रतीक -
पूजा- हड़प्पा सभ्यता में जलपूजा भी प्रचलित थी । कुंड में स्नान को धार्मिक अनुष्ठान माना जाता था । मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार धार्मिक स्नान का प्रतीक है शृंगस्तंभ और स्वस्तिक के चित्र मुहरों पर मिले हैं । ये किसी देवी - देवता के प्रतीक रूप में पूजे जाते थे । कालीबंगन और लोथल से वेदिकाएँ भी मिली हैं । ये संभवतः अग्निपूजा और बलि प्रथा का संकेत देती है।
मंदिर और पुरोहितों का अस्तित्व नहीं-
सुमेर और मिस्र के विपरीत हड़प्पा सभ्यता में देवताओं के निवास के लिए मंदिर नहीं बनवाए गए । हड़प्पा सभ्यता में ऐसा कोई भवन नहीं मिला है जिससे मंदिर का बोध हो । इसी प्रकार , पुरोहितों के अस्तित्व का भी कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है । यद्यपि कुछ विद्वान मोहनजोदड़ो से प्राप्त पत्थर की एक मूर्ति को ' पुरोहित - राजा ' ( priest king ) की मूर्ति मानते हैं । इसी प्रकार कुछ विद्वानों का तर्क है कि पशुपति महादेव की मुहर पर चित्रित आकृति शमन की थी । हड़प्पावासी मृत्युपरांत जीवन में उतना अधिक विश्वास नहीं रखते थे जितना मिस्रवाले । भूत - प्रेत और बुरी आत्माओं में उनकी आस्था अवश्य थी । इससे बचने के लिए ताबीज धारण किए जाते थे । उत्खननों से बड़ी संख्या में ताबीज मिले हैं ।
राज्य और प्रशासन
पुरातात्त्विक साक्ष्यों से हड़प्पा राज्य के गठन और प्रशासनिक स्वरूप की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है । हड़प्पा सभ्यता के अनेक स्थलों से गढ़ी के प्रमाण मिले हैं , जहाँ राजा का निवास माना गया है । इसी प्रकार , अन्नागार राजकीय कोष के रूप में कार्यरत रहे होंगे । उत्खनन में बड़ी संख्या में मिट्टी के छोटे गेंदें एवं पत्थर के छोटे टुकड़े ढेर में पाए गए हैं , जिनका व्यवहार शस्त्र के रूप में किया जाता होगा । सुरकोटड़ा से प्राप्त एक मिट्टी के बर्तन पर एक सैनिक का चित्रांकन है । इन साक्ष्यों दुर्ग , कोष एवं सैनिक - से पता लगता है कि हड़प्पा एक संगठित राज्य था , परंतु इसका प्रशासनिक स्वरूप क्या था ? इसका उत्तर भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ढूँढ़ना होगा ।
