महाभारत के पात्र अर्जुन की कहानी,Arjune ki kahani
अपनी ओर से— हर देश व जाति के निर्माण में वीरों की जीवनियाँ बहुत सहायक होती हैं । हर देश में , हर समय में वीर पुरुष जन्म लिया करते हैं । परंतु ज्यादातर यह देखा गया है कि हिन्दुस्तान का ही यह सौभाग्य रहा है कि उसमें आदर्श पुरुषों ने हमेशा जन्म लिया है । दूसरे देशों में अगर एक महापुरुष शारीरिक वीरता में अद्वितीय रहा है , तो उसमें धार्मिक , नैतिक या चारित्रिक कमी कही न कहीं बनी ही रही है । परन्तु हिन्दुस्तान के वीर सब तरह से सभी परीक्षाओं में खरे उतरे हैं , और अपने देश , अपनी जाति ही नहीं , सारे संसार के लिए आदर्श सिद्ध हुए हैं । ऐसे ही महापुरुषों में महावीर अर्जुन भी एक हैं । अर्जुन के जीवन की प्रत्येक घटना उनको मानव जाति की दृष्टि में ऊँचा ही उठाती है । उनका बाल्यकाल , गुरुभक्ति व श्रद्धा , भ्रातृप्रेम , शील , नैतिक जीवन तथा न्याय और धार्मिकता उनके शौर्य के लिए स्वर्ण मुकुट में जवाहिरात का कार्य करती है । ऐसे महान वीर का चरित्र इस जाति के प्रत्येक बालक की पठनीय पुस्तकों में प्रथम आना चाहिए । अर्जुन की यह जीवनी सरल सुपाठ्य भाषा में लिखी गयी है , ताकि हमारे दक्षिण के हिन्दी सीखनेवाले बालक और वृद्ध सभी आसानी से पढ़कर अपना भाषा - ज्ञान बढ़ा सकें । हमें पूरी उम्मीद है कि पाठक इसको बहुत उपयोगी पाएँगे ।
वंश - परिचय :- महाराज भरत के वंश में शंतनु नाम के एक बड़े प्रतापी राजा हो गये हैं । उनके दो रानियाँ थीं । पहली रानी गंगा के एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम देवव्रत था । देवव्रत ने जीवन - भर ब्रह्मचारी रहने का व्रत लिया था । इसीसे उन्होंने अपना विवाह नहीं किया । उन्होंने यह भी प्रतिज्ञा की थी कि वे कभी राजा नहीं बनेंगे । ऐसी भीषण प्रतिज्ञा करने के कारण ही वे भीष्म नाम से प्रसिद्ध हुए । महाराज शंतनु की दूसरी रानी सत्यवती के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नाम के दो पुत्र उत्पन्न हुए । शंतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठे । उस समय उनकी अवस्था बहुत कम इसलिए भीष्म ही सारे राज्य की देख - भाल करते थे । भीष्म जैसे सत्यवादी थे वैसे ही वीर , पराक्रमी , सद्गुणी , न्यायी और ईश्वर भक्त थे । इतने बड़े राज्य का प्रबंध उनके हाथ में रहते हुए भी वे अपने प्रण से कभी विचलित नहीं हुए । देखने में तो वे अवश्य ही राजकार्य में डूबे हुए मालूम हो होते थे , पर सचमुच वे माया - मोह से बहुत दूर थे । कम थी , एक बार गंधर्वों से युद्ध करते हुए चित्रांगद मारे गये । चित्रांगद की मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई विचित्रवीर्य गद्दी पर बैठे । इनकी उमर और भी कम थी , इसलिए भीष्म को इनका भी राज्य सम्हालना पड़ा । कुछ समय बाद विचित्रवीर्य विवाह लायक़ हुए । भीष्म पितामह को उनके विवाह के योग्य एक कन्या खोजने की चिंता हुई । उन दिनों काशी के राजा की अम्बा , अंबिका और अंबालिका नाम की तीन लड़कियों का स्वयंवर होनेवाला था । भीष्म उन तीनों लड़कियों को स्वयंवर से जीत लाये और विचित्रवीर्य के साथ अंबिका और अंबालिका का बड़ी धूमधाम के साथ विवाह करा दिया । अंबा ने पहले ही अपने मन में राजा शाल्व को अपना से कहा , " देव , मैंने अपने पति मन में राजा शाल्व को वर लिया है और स्वयंवर में उन्हींको मैं अपना पति चुनती , इसलिए अब आप जो उचित समझें करें । " यह सुनकर भीष्म ने अंबा को शाल्व के पास पहुँचाने का प्रबंध कर दिया। विचित्रवीर्य की दोनों रानियों अंबिका और अंबालिका के घृतराष्ट्र और पांडु नाम के पुत्र उत्पन्न हुए । महाराज विचित्रवीर्य क्षय रोग ( तपेदिक ) के कारण युवावस्था में ही मर गये । उस समय धृतराष्ट्र और पांडु बहुत छोटे थे । इसलिए विचित्रवीर्य के बड़े भाई भीष्म को फिर से राजकाज संभालना पड़ा । राजकाज के साथ - साथ राजकुमारों का लालन - पालन भी भीष्म अपनी देख - रेख में करने लगे । जब धृतराष्ट्र और पांडु बड़े हुए तब यह प्रश्न उठा कि राज्य किसको दिया जाए । यद्यपि धृतराष्ट्र बड़े भाई थे और वे ही राज्य के अधिकारी थे , पर जन्म के अंधे होने के कारण वे गद्दी पर नहीं बैठ सकते थे । इसलिए यही उचित समझा गया कि राजकुमार पांडु गद्दी पर बैठें । अंत में सबकी सलाह से महाराज पांडु का राजतिलक कर दिया गया । पांडु राजा के दो रानियाँ थीं । एक का नाम कुंती और दूसरी का माद्री था । कुंती के तीन पुत्र हुए - युधिष्ठिर , भीम और अर्जुन और माद्री के दो पुत्र — नकुल और सहदेव । यही पाँचों भाई पांडव कहलाये । अकस्मात् एक दिन महाराज पांडु के शिकार खेलते समय हृदय की गति रुक जाने से अकाल मृत्यु हो गयी । माद्री उनके साथ सती हो गयीं । महाराज पांडु के मरने के बाद धृतराष्ट्र गद्दी पर बैठे । वह धृतराष्ट्र की रानी गांधारी थी । उसके सौ पुत्र हुए , जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था । शूर , वीर और पराक्रमी था , पर साथ ही साथ वह बड़ा स्वार्थी भी था । वह यही चाहता था कि मैं कब राजा बनूँ और कब सब लोग मेरा हुक्म माने । वह यह नहीं चाहता था कि पांडवों को गद्दी दी जाए ।
अर्जुन का जन्म :-कुंती के जब दो पुत्र , युधिष्ठिर और भीमसेन का जन्म हो चुका था , तब एक रोज़ राजा पांडु अपने मन में विचार संसार में मनुष्य दो प्रकार से प्रतिष्ठा प्राप्त " करने लगे , करता है । एक तो दैव - बल तो दैव - बल से और दूसरे अपनी शक्ति से । यथा- समय आप ही प्राप्त हो जाता है ; इसलिए अपनी शक्ति बढ़ाना ही सबसे ज़रूरी काम है । सुना है , इंद्र सब देवताओं के राजा हैं । उनका उत्साह , बल , वीर्य और प्रभाव अपार है । अब तपस्या करके उन्हींको खश करना चाहिए । उनके वरदान से हमें जो पुत्र होगा वह निस्संदेह मनुष्यों में श्रेष्ठ होगा । ' ऐसा सोचकर वे नियमपूर्वक देवराज इंद्र की आराधना करने लगे । महाराज पांडु की घोर तपस्या को देखकर इंद्र बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने आकर पांडु को आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम्हारे एक ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा जिसे संसार में कोई जीत न सकेगा , वह दुष्टों का नाश , दीन - दुखियों की रक्षा और अपने भाई - बंधुओं का भला करनेवाला होगा ; ऐसा कहकर इंद्र भगवान चले गये । राजा पांडु ने कुंती से कहा , ' देवी , इंद्र भगवान ने हम पर प्रसन्न होकर एक वरदान दिया है कि तुम्हारे एक विश्वविजयी पुत ्र उत्पन्न होगा । ' थोड़े दिनों के बाद कुंती के गर्भ से अर्जुन का जन्म हुआ | उनके पैदा होते ही एक आकाशवाणी हुई – ' हे कुंती , तुम्हारा यह बालक बड़ा तेजस्वी , यशस्वी और पराक्रमी होगा । यह संसार को जीतकर सुख और शांति का राज्य स्थापित करेगा । ' इसके कुछ दिन बाद राजा पांडु की दूसरी रानी माद्री के जुड़वाँ ( यमज ) पुत्र उत्पन्न हुए , जिनके नाम नकुल और सहदेव रखे गये ।
गुरु द्रोणाचार्य भेंट :- महाराज धृतराष्ट्र के सौ पुत्र कौरव और पांडु के पाँचों पुत्र पांडव बचपन से ही साथ - साथ रहे , खेले - कूदे और उन्होंने एक ही गुरु के पास बैठकर विद्या पढ़ी | भीष्म पितामह ने राजकुमारों की शिक्षा का पूरा भार कृपाचार्य पर छोड़ दिया । कृपाचार्य उन्हें बड़े प्रेम से पढ़ने - लिखने के साथ - साथ गदा युद्ध , मल्ल - युद्ध , धनुर्विद्या , घोड़े , हाथी और रथ की सवारी , तलवार चलाना आदि नाना प्रकार की युद्ध - विद्या सिखाने लगे । एक दिन की बात है , सभी राजकुमार नगर से बाहर एक मैदान में गेंद खेल रहे थे । अचानक गेंद एक सूखे कुएँ में जा गिरा । सब राजकुमार उस गेंद को निकालने की कोशिश करने लगे , पर किसीसे भी गेंद न निकला । उसी समय एक दुबला - पतला ब्राह्मण उधर से निकला । उसने इन राजकुमारों को गेंद निकालने में असफल होते देखकर कहा , ' लड़को , मालूम होता है तुम लोग अभी तीर चलाने में कच्चे हो । लाओ , अपनी तीर - कमान मुझे दो । मैं अभी तुम्हारा गेंद कुएँ से बाहर निकाले देता हूँ । राजकुमार ब्राह्मण की बात सुनकर ताज्जुब करने लगे । उन्होंने फ़ौरन हो एक धनुष और बहुत से तीर ब्राह्मण के हाथ में दे दिये । ब्राह्मण ने धनुष पर तीर चढ़ाकर कुएँ में पड़े हुए गेंद को छेद दिया । फिर दूसरी तीर से पहले तीर को छेद दिया । इसी तरह वह तब एक तक तीर में दूसरा तीर मारता गया , जब तक तीर कुएँ के ऊपर नहीं पहुँच गये । फिर उसने तीरों की सहायता से गेंद को बाहर निकाल दिया । यह तमाशा देखकर बालकों को बड़ा अचरज हुआ । उन्होंने पूछा , ' हे ब्राह्मण देवता , आप कौन हैं ? आप कहाँ के रहनेवाले हैं ? आप इधर किसलिए आये हैं ? आपको देखकर हमें बड़ी खुशी हो रही है । कहिये , हम आपकी क्या सेवा करें । ' कुमारों की ऐसी बातें सुनकर द्रोणाचार्य ने कहा , ' तुम लोग भीष्म के पास जाकर ठीक मेरे रंग - रूप और गुणों का वर्णन करो , वे मुझे पहचान लेंगे । यह सुन सब राजकुमार पितामह भीष्म के पास दौड़े आये और उनसे सारा हाल कह सुनाया । बालकों की बातों से भीष्म समझ गये कि वे गुरु द्रोणाचार्य हैं ।
भीष्म उसी समय द्रोण को लेने के लिए चल दिये । कुएँ पर पहुँचकर उन्होंने गुरु द्रोण को प्रणाम किया और आदर के साथ उन्हें हस्तिनापुर ले आये । कुशल समाचार पूछने के बाद भीष्म ने हाथ जोड़कर द्रोणचार्य से राजकुमारों को शस्त्र विद्या सिखाने को प्रार्थना की । द्रोणाचार्य ने भीष्म की यह प्रार्थना सहर्ष स्वीकार कर ली ।
अर्जुन की परीक्षा :-कौरव और पांडव राजकुमार गुरु द्रोण से शस्त्र - विद्या सीखने लगे । गुरु द्रोणाचार्य भी बड़ी लगन के साथ उनको धनुर्विद्या सिखाने लगे । कुछ दिनों के बाद एक दिन सब राज कुमारों को बुलाकर गुरुजी ने पूछा , ' मेरे मन में एक इच्छा है ; प्रतिज्ञा करो कि अस्त्र - शिक्षा पूर्ण होने पर तुम इच्छा पूरी करोगे । लोग वह चुप रहे । गुरु द्रोणाचार्य की इस बात को सुनकर सभी राजकुमार पर अर्जुन ने उत्साह के साथ कहा , ' मैं आपकी इच्छा पूरी करूँगा ; इस बात की मैं प्रतिज्ञा करता हूँ । ' अर्जुन की प्रतिज्ञा को सुनकर गुरुजी बहुत प्रसन्न हुए , और उन्होंने प्यार से अर्जुन को छाती से लगा लिया । आनंद के मारे गुरु की आँखों से प्रेम के आँसू बहने लगे । उसी दिन से अर्जुन पर गुरु का कुछ विशेष प्रेम हो गया । द्रोणाचार्य की अस्त्र - शस्त्र शिक्षा को देखकर दूर - दूर से राजकुमार उनसे अस्त्र - विद्या सीखने आने लगे । इन्हीं राजकुमारों में कर्ण भी था । वह बड़ा तेज़ बुद्धिवाला और बहादुर था । सभी राजकुमारों में अर्जुन की बराबरी करनेवाला वही था । अर्जुन को तीर चलाने में विशेष रुचि थी और वे हर समय गुरु की सेवा में लगे रहते । अर्जुन बड़े यत्न के साथ मन लगाकर अस्त्र - विद्या का अभ्यास करते थे । इसलिए अर्जुन सभी साथियों में होशियार निकले । गुरु द्रोण भी अर्जुन की गुरुभक्ति और विद्या प्रेम देखकर उनपर विशेष कृपा रखते थे। थोड़े ही दिनों में अर्जुन ने सारी विद्याएँ सीख लीं । बाकी पांडवों ने भी भिन्न - भिन्न विद्याओं में अच्छी तरक्क़ी की । भीमसेन बल में सबसे अधिक निकले और अर्जुन बाण चलाने में । इस कारण धृतराष्ट्र के पुत्र हमेशा पांडवों से जलते रहते थे । एक दिन गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही । उन्होंने एक नकली चिड़िया बनवाकर एक पेड़ पर रख दी । फिर सब राजकुमारों को बुलाकर उस पक्षी का निशाना दिखाकर द्रोणाचार्य ने कहा , ' तुम लोग शीघ्र अपने अपने धनुष - बाण ले आओ । जब मैं कहूँ तब बाण मारकर उस पक्षी का सिर काटना है । सबसे पहले उन्होंने युधिष्ठिर को बुलाया और कहा , ' बेटा , धनुष पर बाण चढ़ाओ । मेरे ' तीन ' कहने पर उसे छोड़ना । ' युधिष्ठिर धनुष पर बाण चढ़ाकर और निशाने की ओर धुनुष तानकर खड़े हो गये । द्रोण ने पूछा , ' बेटा , तुम्हें पक्षी दिखाई पड़ता है या नहीं ? युधिष्ठिर ने कहा , ' क्यों नहीं गुरुजी , मैं तो इस पेड़ को , आपको अपने भाइयों को और उस पक्षी को भी देख रहा हूँ । कहा , ' हट जाओ ; तुम इस इसके बाद धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन आदि राजकुमारों को एक - एक करके वहाँ पर खड़ा करके द्रोणाचार्य ने वही प्रश्न किया । सब ने वही उत्तर दिया यह सुनकर द्रोणाचार्य ने निशान को नहीं मार सकते । ' जो युधिष्ठिर ने दिया था । भीमसेन , नकुल , सहदेव और दूसरे राजकुमारों से भी गुरु द्रोण ने वही प्रश्न किया । पर सबसे वही उत्तर र पाकर आचार्य ने सबको झिड़ककर हटा दिया । अब द्रोणाचार्य ने अर्जुन को बुलाकर कहा , ' अर्जुन , उस निशाने की ओर देखो , अब तुमको वह निशाना मारना होगा । तुम धनुष - बाण लेकर निशाने की ओर देखो , जब मैं आज्ञा दूं तब मारना । ' ऐसा कहकर आचार्य ने अर्जुन से पूछा , अर्जुन , क्या तुमको भी यह पेड़ , पक्षी , हम सब लोग दिखाई पड़ रहे हैं ? ' अर्जुन ने कहा , ' गुरुवर , मुझे तो केवल पक्षी ही दिखाई पड़ रहा है और कुछ नहीं । ' प्रसन्न होकर आचार्य ने फिर पूछा , ' अर्जुन , तुम्हें पक्षी का कौन - सा अंग दिखाई पड़ रहा है ? ' अर्जुन ने कहा , ' गुरुजी , मैं केवल उसका सिर देख रहा हूँ । ' ऐसा सुनकर आचार्य ने आज्ञा दी , ' बेटा , बाण छोड़ दो । ' गुरु की आज्ञा पाते ही अर्जुन ने बिना कुछ सोचे - विचारे बाण छोड़ दिया , और उस पक्षी का सिर कटकर ज़मीन पर आ पड़ा ।
अर्जुन को सफल देखकर गुरु ने उसे गले से लगा लिया । इसी तरह कुछ समय बीतने के बाद एक दिन सब शिष्यों को साथ लेकर गुरु द्रोणाचार्य गंगा स्नान करने गये । नदी में पैर रखते ही आचार्य के पैर को एक मगर ने पकड़ लिया और खींचकर भीतर गहरे पानी की ओर ले चला । यद्यपि खुद उस मगर को मारकर अपनी रक्षा कर सकते थे , परंतु वहाँ भी उन्होंने अपने शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही । उन्होंने शिष्यों से कहा , " तुम लोग मगर को मारकर मेरी रक्षा करो । ' गुरु की बात अभी पूरी भी न होने पायी थी कि अर्जुन ने पाँच बड़े पैने बाणों से उस मगर के टुकड़े - टुकड़े कर दिये । लेकिन दूसरे सब राजकुमार हक्के - बक्के से अपनी जगह पर खड़े रहे । • अर्जुन की इस वीरता और हिम्मत को देखकर द्रोणाचार्य उनपर बहुत प्रसन्न हुए और बोले , ' बेटा , मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । तुमको योग्य समझकर मैं यह ब्रह्मशर नामक दिव्य अस्त्र देता हूँ । ' गुरु ने वह ब्रह्मशर अर्जुन को दिया और उसके चलाने की सारी विधि बताते हुए कहा , देखो , इस अस्त्र को मनुष्य पर कभी न चलाना । क्योंकि मनुष्य का तेज थोड़ा है । इस अस्त्र में सारे जगत को जला डालने की शक्ति है । तुम सावधानी के साथ इस अस्त्र को अपने पास रखना । ' अर्जुन ने ' जो आज्ञा ' कहकर श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर गुरु से वह अस्त ग्रहण किया । आचार्य बोले , ' बेटा अर्जुन, इस पृथ्वी पर तुम्हारे समान धनुर्धारी और कोई न होगा ।
गुरु - दक्षिणा :-गुरु द्रोणाचार्य ने एक दिन कौरवों और पांडवों को बुलाकर कहा , ' अब तुम्हारी शिक्षा पूरी हो चुकी है । अब तुम लोग मुझे गुरु दक्षिणा दो । गुरु दक्षिणा में मुझे धन , जन , भूमि , सोना आदि कुछ भी नहीं चाहिए । मैं तो गुरु दक्षिणा में यही चाहता हूँ कि तुम पांचाल देश के राजा द्रुपद को पकड़कर मेरे पास ले आओ । ' गुरु द्रोणाचार्य की आज्ञा मान सभी राजकुमार अपने हथियार बांधकर रथों पर चढ़ द्रुपद राज को जीतने चले । राजकुमारों ने द्रुपद के देश में पहुँच वहाँ के निवासियों को मारना और नगरों को तहस नहस करना शुरू कर दिया । जब द्रुपद को यह हाल मालूम हुआ तब वे अपने भाइयों और सेना को लेकर बाण बरसाते हुए नगर से बाहर निकल आये । इसी समय अर्जुन ने द्रोणाचार्य से कहा , ' गुरुवर , कौरव लोग राजा द्रुपद को नहीं पकड़ सकेंगे । पहले आप इन्हींको अपना बल आजमा लेने दीजिये । पीछे हम ( पांडव ) साहस के साथ द्रुपद को पकड़ने की कोशिश करेंगे । ऐसा कहकर अर्जुन अपने भाइयों के साथ द्रुपद की राजधानी से एक मील दूर ठहर गये । इधर राजा द्रुपद ने कौरवों की सेना में घुसकर बाण मारते - मारते दुर्योधन , कर्ण , विकर्ण और दूसरे राजकुमारों को बेदम कर दिया और उनकी सेना के छक्के छुड़ा दिये । सेना की हिम्मत टूट गयी । जाता रहा । राजकुमारों का भी साहस घमासान लड़ाई होने लगी । द्रुपद की सेना बादलों की तरह घुमड़ - घुमड़कर कौरव सेना पर हमला करने लगी । द्रुपद की लड़ाई से घबड़ाकर दुर्योधन आदि कौरव भाग खड़े हुए । कौरव - सेना में भगदड़ मची देखकर पांडवों ने अपने हथियार संभाले और गुरु द्रोणाचार्य को प्रणाम कर अपने - अपने रथों पर सवार हो गये । अर्जुन ने युधिष्ठिर से कहा , ' आप युद्ध न करें । मैं अभी राजा द्रुपद को पकड़े लाता हूँ । नकुल और सहदेव को सेना की रक्षा पर नियत करके अर्जुन युद्ध भूमि की ओर चले । ? सेना के आगे - आगे हाथ में गदा लिये हुए भीमसेन चल रहे थे । युद्ध - भूमि में पहुँचकर महाबली भीमसेन काल की तरह गदा से हाथियों की सेना का संहार करने लगे । पहाड़ जैसे हाथियों के मस्तक गदा की चोट से फट गई और खून की नदियाँ बहने लगीं । वे जिस ओर घुस जाते उधर की सेना में हाहाकार मच जाता । इतने ही में अर्जुन बाण बरसाते हुए द्रुपद के पास पहुँच गये । अर्जुन को ऐसी फुर्ती से बाण चढ़ाने और चलाने का अभ्यास था कि कोई देख न पाता था कि कब वे बाण तरकस से निकालते , कब धनुष पर उसे चढ़ाते , और कब उसे अपने दुश्मन के ऊपर छोड़ते हैं । ऐसा मालूम पड़ता था , मानों लगातार बाण बरसा रहे हैं । अर्जुन की बहादुरी और चतुराई देखकर उनके दुश्मन भी उनकी तारीफ़ करने लगे । अर्जुन के हाथों से सेना का नाश होते देख राजा द्रुपद बड़ी तेज़ी से अपने भाई सत्यजित के साथ आगे बढ़े । राजा द्रुपद को सामने आते देख अर्जुन ने उनपर इतने बाण बरसाये कि वे बाणों से ढँक गये । इसी समय सत्यजित द्रुपद की रक्षा करने के लिए अर्जुन का सामना करने के वास्ते आगे बढ़ा । अब अर्जुन और सत्यजित में युद्ध होने लगा । आते ही अर्जुन पर बड़े पैने पैने बाण छोड़े । यह देखकर अर्जुन को बड़ा गुस्सा आया और उसके घोड़ों को मार गिराया , उसके धनुष की डोर काट डाली , उसके सारथी को मार डाला । इस तरह हार खाकर सत्यजित युद्ध भूमि सत्यजित ने से भाग गया । सत्यजित को भागते देखकर राजा द्रुपद बड़ी तेजी से अर्जुन पर झपटकर बाण बरसाने लगे । अब तो अर्जुन और भी घोर युद्ध करने लगे । उन्होंने द्रुपद का धनुष और ध्वजा काट डाली । फिर कई बाण मारकर द्रुपद के सारथी को और रथ के घोड़ों को घायल कर दिया । अब अर्जुन धनुष - बाण छोड़कर हाथ में तलवार लेकर सिंहनाद करते हुए द्रुपद की और झपटे । वे निधड़क कूदकर द्रुपद के रथ पर चढ़ गये और उन्हें पकड़ लिया द्रुपद को पकड़ा गया जानकर उनकी सारी सेना इस तरह से अर्जुन राजा द्रुपद को गिरफ्तार करके गुरु द्रोणाचार्य के पास ले चले । भाग खड़ी हुई । राजा द्रुपद और उनके मंत्री को गिरफ्तार करके वीर • अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य के आगे खड़ा कर दिया और इस प्रकार अपनी गुरु दक्षिणा अदा की ।
लाक्षा गृह:-अर्जुन की अद्भुत वीरता , पराक्रम और कीर्ति का हाल सुनकर कौरव मन ही मन कुढ़ने लगे । पांडव उनके मन में काँटों की तरह खटकने लगे । पांडवों के इस बढ़ते हुए बल और तेज को जानकर महाराज धृतराष्ट्र को भी बड़ी चिन्ता हुई । उन्होंने राजकार्य में चतुर और मंत्रियों में श्रेष्ठ कणिक को बुलाकर अपने दिल की बात कही । कणिक बड़ा ही धूर्त था वह धृतराष्ट्र के दिल का भाव ताड़ गया , और इस प्रकार सुझाना शुरू किया कि वे भी उसके मायाजाल में फंसकर धर्म - अधर्म को भूल , पांडवों से मन ही मन जलने लगे । एक रोज़ दुर्योधन , दुःशासन , शकुनि और कर्ण सबने मिलकर पांडवों के ख़िलाफ़ एक गुप्त सभा की । उन लोगों ने यह तय किया कि किसी तरह धोखे से पांडवों को उनकी माता कुंती के साथ जला दिया जावे । इस काम के लिए उन्होंने वारणावत को चुना । क्योंकि वह स्थान बड़ा ही सुहावना और वस्ती से काफ़ी दूर था । कौरवों के इस षड्यंत्र का पता किसी तरह महात्मा विदुर को चल गया । इधर धृतराष्ट्र ने पांडवों के सामने वारणावत की अनेक तरह से प्रशंसा की , जिसे सुनकर पांडवों का भी जी वह सुंदर स्थान देखने को ललचा गया । तब दुर्योधन ने कहा , ' मैं वहाँ तुम लोगों के ठहरने आदि का बढ़िया इंतजाम करा दूंगा । तुम लोग अवश्य एक बार कुछ दिनों तक वहाँ जाकर रहो । वह जगह सचमुच देखने लायक़ है । दुर्योधन की बात सुनकर पांडव वहाँ जाने को राजी हो गये । दुर्योधन ने पुरोचन नाम के एक आदमी को धन का लोभ देकर वारणावत भेजा । उसने पुरोचन को समझाया कि वह ऐसी चीज़ों को मिलाकर एक मकान बनाये , जिसमें शीघ्र ही आग लग सके । और यह भी कहा कि मकान के आसपास ही सन , तेल , घी , लाख , लकड़ी आदि चीजें जहाँ - तहाँ इकट्ठी करके रखें ताकि आग फैलने में देर न लगे । लेकिन ध्यान रहे कि इस बात का पता किसीको कानों - कान भी नहीं होने पावे । जब पांडव अपनी माँ के साथ आएँ तो बड़े आदर और सम्मान के साथ उसी घर में ठहराएँ । इस प्रकार पांडवों को उस घर में रहते हुए कुछ दिन बीत जाएँ , तब एक दिन मौक़ा पाकर उस घर में आग लगा दो । ऐसा करने से हमारा काम भी बन जाएगा और कोई बुरा भी न कहेगा सब यही समझेंगे कि घर आग लग गयी और पांडव जल गये । मैं तुम्हारे इस एहसान को कभी न भूलूंगा । दुर्योधन के कहे अनुसार पुरोचन ने बहुत जल्दी लाख का एक बड़ा सुंदर घर वारणावत में बनाकर खड़ा कर दिया । पांडव अपनी माता कुंती के साथ महाराज धृतराष्ट्र की आज्ञा लेकर वारणावत नगरी की ओर चले । भीष्म , विदुर और गाँव के लोग बहुत दूर तक उन्हें पहुँचाने आये । रास्ते में विदुरजी ने चुपके से कुछ कहकर युधिष्ठिर को समझा दिया कि तुम्हारे रहने के लिए दुष्ट दुर्योधन ने बहुत जल्दी जल उठनेवाला लाख का एक घर बनवाया है । इसलिए तुम लोग बड़ी होशियारी के साथ रहना । ठीक समय पर पाँचों पांडव अपनी माता कुंती के साथ वारणावत पहुँच गये । पुरोचन पहले ही से उनके आने की बाट देख रहा था । उसने उन्हें बड़े आदर के साथ ले जाकर उसी लाक्षागृह में ठहराया | घर में घुसते ही पांडवों को लाख , घी , तेल आदि चीज़ों की गंध मालम हुई , जिससे उन्हें विदुरजी की बात पर पूरा विश्वास हो गया । अब तो पांडवों को दुर्योधन की धूर्तता का पता चल गया । उन्हें मालूम हो गया कि यह सब षड्यन्त्र उन्हें मारने के लिए ही किया गया है । पाँचों भाइयों ने बैठकर यही निश्चय किया कि हस्तिनापुर वापस चलने से कोई लाभ नहीं , क्योंकि पता नहीं कि दुर्योधन फिर क्या षड्यन्त्र रचे । इसलिए यही अच्छा है कि हम लोग अन्यत्र भाग जाएँ और आगे चलकर फिर जो कुछ होगा देखा जाएगा । अर्जुन और भीमसेन ने उसी मकान के अन्दर गुप्त रीति से एक सुरंग गंगा के किनारे तक खोदना शुरू कर दिया । इस . प्रकार पांडव लोग उस मकान में बड़ी सावधानी के साथ लगभग एक वर्ष तक रहे । इसी बीच में सुरंग का काम भी पूरा हो गया । रोज़ रात के वक्त भीमसेन ने उस घर में आग लगा दी और भाइयों तथा माता कुंती को साथ ले उसी सुरंग के रास्ते गंगा के किनारे निकल गये । उधर विदुरजी ने गंगा पार करने के लिए नाव का प्रबंध कर दिया था । तब एक इस प्रकार नाव पर बैठकर पांडव शीघ्र ही गंगा पार हो गये ।
लाक्षागृह से गंगा पार करते हुए पाण्डव
लाक्षागृह को जलता देखकर वारणावत के आस - पास रहनेवाले लोग दौड़ पड़े । उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि पांडव अपनी माता के साथ इस घर में जल गये । जिस दिन यह कांड हुआ था उसी दिन मता कुँती ने बहुत - से ग़रीबों , दुखियों और ब्राह्मणों को भोज दिया था। उनमें एक भीलनी भी थी , जो अपने पाँचों लड़कों के साथ खाना खाने आयी थी । बेचारे भीलों को ऐसा अच्छा खाना कहाँ खाने को मिलता है ? छहों ने खूब पेट भर खाया , और रात होने के कारण वहीं एक कोने में सो रहे । वे इतने बेहोश सोये कि उन्हें लाक्षागृह के जलने की ख़बर तक न लगी और वहीं जलकर मर गये । उन्हीं छहों की जली हुई ठठरियों को देख लोगों को पक्का विश्वास हो गया कि पांडव जरूर ही अपनी माता कुंती के साथ इसमें जल मरे हैं । दूतों ने फ़ौरन ही यह दुख से भरा हुआ समाचार हस्तिनापुर ले जाकर महाराज धृतराष्ट्र को सुनाया । वे इस समाचार को सुनकर खूब रोने - पीटने लगे । सारे परिवार में शोक छा गया । सब कौरव और राजा धृतराष्ट्र , पांडवों और उनकी माता कुंती का नाम ले - लेकर और हाय - हाय कर रोने - बिलखने लगे । नगर के सभी लोग इस शोक- समाचार के कारण फूट - फूटकर रो रहे थे । महाराज धृतराष्ट्र ने पांडवों का श्राद्ध कर्म किया और बहुत से ब्राह्मणों को भोजन कराया ।
वन की ओर:-पांडव लोग माता कुंती के साथ वारणावत से निकलकर जटाएँ रखकर , मृगछाला और वल्कल पहनकर तपस्वियों के वेश में जंगलों में घूमते हुए दक्षिण दिशा की ओर चले । वे जंगलों में घूमते - भटकते कंद - मूल- फल खाते हुए अपना समय बिताने लगे । एक दिन इसी प्रकार जंगल में घूमते हुए एक स्थान पर पांडवों ने अपने पितामह भगवान वेदव्यास को देखा । कुशल समाचार पूछने के बाद व्यासजी ने कहा , पुत्त्रो , धृतराष्ट्र के बेटों ने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया है । मैं तुम्हारी इस दशा के बारे में पहले ही सुन चुका हूँ । यहाँ से थोड़ी दूर पर एक छोटा - सा गाँव है , जिसका नाम एकचक्रा है । सुरक्षित स्थान है । तुम वहीं चलकर रहो । ' ऐसा कहकर व्यासजी उन्हें वहाँ ले गये और एक ब्राह्मण के यहाँ कुंती और पांडवों के रहने का प्रबंध करके चले गये । वह एक उसमें बक उसके अत्याचार से तंग एकचक्रा नगरी के पास एक जंगल था । नाम का एक राक्षस रहता था । आकर सभी गाँववालों ने मिलकर उससे एक समझौता कर लिया था कि हर घर से एक आदमी बारी - बारी से रोज़ उसके पास जाया करे , और वह उसे खाकर अपनी भूख बुझावे , हमेशा इस तरह गांववालों को मौक़े - बे - मोक़े न सताया करे । लोग माता कुंती के साथ ठहरे थे । बड़ा दुख छा गया । वे यह विचार कौन उस राक्षस के पास जावे । सभी लोग रोने - बिलखने लगे । और बहन भाई का । एक दिन उस ब्राह्मण की बारी आयी जिसके यहाँ पांडव ब्राह्मण परिवार में इससे करने लगे कि घर में से इस बात को सोचकर घर के माँ बेटे का मुँह देख रही थी और बहन भाई का । उस दिन माता कुंती की सहायता करने के लिए भीम घर ही पर थे । उनसे उस ब्राह्मण परिवार का दुख न देखा गया । उन्होंने रोने - बिलखने का पता लगाने के लिए माता कुंती को भेजा। कुंती ने ब्राह्मण को समझाया और कहा , ‘ आप लोग क्यों इतने दुखी हो रहे हैं ? आप लोगों ने हमारी जो मद्द की है उसके लिए हमारा भी कुछ फ़र्ज़ है । मेरे पाँच पुत्र हैं ; उनमें से एक को मैं उस राक्षस के पास भेज दूंगी । आपमें से किसीको भी उसके पास जाने की ज़रूरत नहीं है । ब्राह्मण ने बहुत कुछ आरजू मिन्नत की और कहा , ' आप लोग हमारे आतिथि है ; हम आपको अपने बदले संकट में डालकर इस महापाप के भागी नहीं बन सकते ; आप हमें क्षमा करें , मैं ही उसके पास जाऊँगा । पर माता कुंती ने किसी न किसी तरह उसे राजी कर लिया , और भीम के बल और इसके पहले कई राक्षसों के मारने की बात कहकर उसका समाधान कर दिया । इधर कुंती को ब्राह्मण परिवार की रक्षा करने और उस राक्षस का वध करने के लिए भीम को भेजने के पहले अपने बाक़ी चारों पुत्रों— युधिष्ठिर आदि को भी समझाना पड़ा । कुंती ने उनको भी समझा - बुझाकर और बहुत सा पकवान देकर भीम को राक्षस के पास जाने के लिए बिदा किया । लगा । भीम वहाँ पहुँचकर जो पकवान राक्षस के खाने को ले गये थे , वह सब उसे दिखा दिखाकर खुद खाने लगे । यह सब देखकर राक्षस को बड़ा गुस्सा आया । उसने कहा , ' अरे दुष्ट , तू मेरे लिए खाना लाया है कि अपने लिए ? ' इतना कहकर वह भीम पर टूट पड़ा और दोनों में घोर युद्ध होने भीम ने कई बार उसे उठा - उठाकर ज़मीन पर पटक दिया , और उसकी पीठ पर घुटना लगाकर एक हाथ से गर्दन और , दूसरे से टाँगें पकड़कर उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ डाली । तब तो वह वहीं ढ़ेर हो गया । नगर के सभी लोग बड़ी खुशी मनाने लगे , और सभी ने भीम की बड़ी तारीफ़ की । लोग पांडवों की बड़ी आवभगत करने लगे । अब तो इस प्रकार बहुत दिनों सुख और शांतिपूर्वक एकचक्रा नगरी में रहने के बाद पांडव लोग पांचाल देश की ओर चले रात हो जाने के कारण अर्जुन एक लकड़ी जलाकर उजेला करते दिखाते हुए , राह हुए सबके आगे - आगे चले । चलते - चलते कुछ सब गंगा के किनारे जा पहुँचे । देर बाद आधी रात का समय था । यक्ष , गंधरं , राक्षस , भूत , प्रेत आदि जहाँ - तहाँ घूम रहे थे , और अपने नाना प्रकार के नाच - गान में मस्त थे । कहीं पर कोई गले में हड्डियों की माला डाले तथा हाथ में खोपड़ी लिये नाच रहा था , तो कोई इस मुर्दे को घसीटता हुआ इधर से उधर फिर रहा था । प्रकार से गंगा के किनारे श्मशान घाट के ऐसे भयानक दृश्यों में से गुज़रते हुए अर्जुन अपने भाइयों और माता कुंती को ढाढ़स बँधाते हुए निडर चल रहे थे । थोड़ी दूर आगे चलने पर अर्जुन को एक आवाज़ सुनाई दी — ' ओ आनेवाले , सावधान हो । अगर अपना भला चाहते हो , तो वहीं ठहर जाओ , एक क़दम भी आगे न बढ़ाना । यह आवाज़ गंधर्वराज अंगारपर्ण की थी । उसने फिर कहा ' तुम्हें मालूम नहीं कि मैं कुबेर का मित्र हूँ और यह वन मेरा है । मैं कभी भी किसीको क्षमा नहीं करता हूँ । तुम किसके बल पर इधर निधड़क चले आ रहे हो ? ' गंधर्व की बात सुनकर अर्जुन ने कहा , ' भाई , क्या तुम्हें नहीं मालूम कि समुद्र पर , हिमालय पहाड़ पर , और इस गंगा नदी पर किसी एक का अधिकार नहीं है । गंगा पार करने के लिए कोई समय का नियम नहीं ; इसके अलावा तुम मुझे निर्बल भी मत समझना । तुम हम लोगों को गंगा पार होने से नहीं रोक सकते । ' अर्जुन की बातें सुनकर अंगारपर्ण गुस्से से भरकर अर्जन पर बाण चलाने लगा । बाणों को अपनी ओर आते देखकर अर्जुन ने उस जलती हुई लकड़ीं और मृगछाला को ढाल बनाकर उन सब बाणों को रोक लिया और मुस्कुराकर बोले , ' हे गंधर्व , बहादुर आदमियों के लिए बाण फलों के समान हैं । तुम्हारे ये बाण मेरा क्या बिगाड़ सकते हैं? लो , अब तुम सँभल जाओ । मारे । पड़ा । ऐसा कहकर अर्जुन ने एक साथ कई बाण धनुष पर चढ़ाकर बाणों के लगते ही वह गंधर्व मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर तब अर्जुन उसे उठाकर अपने भाई युधिष्ठिर के पास ले गये । उसी समय गंधर्व की स्त्री अपने पति की रक्षा के लिए युधिष्ठिर की शरण में आकर कहने लगी , हे धर्मराज , मेरे पति को छोड़ दीजिये । मैं आपका हमेशा यश गाऊँगी । ' युधिष्ठिर ने स्त्री की दीन पुकार को सुनकर अर्जुन से कहा , ‘ भाई , देखो , यह स्त्री अपने पति की रक्षा के लिए प्रार्थना कर रही है । इसलिए तुम अब इसको छोड़ दो । ' इतने ही में उस गंधर्व की मूर्छा भी दूर हो गयी । ( अपने बड़े भाई की आज्ञा पाते ही अर्जुन ने उस गंधर्व को छोड़ दिया और बोले , ' हे गंधर्वराज , महाराज युधिष्ठिर ने तुम्हें छुड़ा दिया है । अब तुम निर्भय होकर जहाँ चाहो जाओ । ' अर्जुन की बात सुनकर गंधर्व ने हाथ जोड़कर कहा , ' वीरवर , तुमने मेरी जान बचायी है , इसलिए मैं तुम्हारे साथ मित्रता करना चाहता हूँ और तुम्हारे इस उपकार के बदले में तुम्हें गंधर्व विद्या सिखाना चाहता हूँ । इस विद्या को ' चाक्षुषी विद्या ' भी कहते हैं । इस विद्या के प्रभाव से तीनों लोकों की जिन - जिन चीज़ों को देखना चाहोगे , उन सबको देख सकोगे । ' ऐसा कहकर गंधर्वराज ने अर्जुन को गंधर्व - विद्या सिखा दी और बहुत से गंधर्व - जाति के घोड़े भी भेंट किये । वहाँ से रवाना होकर पांडव लोग पांचाल देश की ओर चले गये ।
द्रौपदी - स्वयंवर:-
चलते - चलते द्रुपद नगर थोड़ी ही दूर रह गया था । पर पांडव लोग बहुत थक गये थे । इसलिए कुछ देर आराम करने के लिए पेड़ के नीचे बैठ गये । उसी समय ब्राह्मणों का एक दल वहाँ पहुँचा । कुशल समाचार पूछने के बाद ब्राह्मणों ने पूछा , ' भाई , तुम लोग कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जाओगे ? " युधिष्ठिर ने कहा , ' हम पाँचों भाई अपनी माता के साथ एकचक्रा नगरी से आ रहे हैं और द्रुपद नगर को जाएँगे । ' ब्राह्मणों ने कहा , ' तब तो तुम लोग हमारे साथ आज ही द्रुपद नगर को चलो । वहाँ राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर होनेवाला है । द्रौपदी बहुत सुंदर है । उसकी सुंदरता की बात सुनकर देश - विदेश के बड़े - बड़े राजकुमार उससे विवाह करने के लिए आएंगे । बड़े - बड़े विद्वान और पंडित , महात्मा , साधु , संत , ऋषि , मुनि सभी वहाँ उपस्थित होंगे । हम सब वहीं जा रहे हैं । तुम लोग भी हमारे साथ चलो । ब्राह्मणों को खूब दान और दक्षिणा मिलेगी । तुम सब सुन्दर और राजकुमार जैसे मालूम होते हो । शायद द्रौपदी तुममें से किसी एक को वर ले । तुम्हारा यह छोटा भाई ( अर्जुन ) बड़ा ही बहादुर मालूम होता है । हो सकता है यह द्रौपदी को जीत ले । ब्राह्मणों की बातें सुनकर माता सहित पांचों पांडव उनके साथ हो लिये और ठीक समय पर द्रुपद - नगरी में जा पहुँचे । वहाँ पहुँचकर एक कुम्हार के घर में पांडवों ने डेरा डाला और ब्राह्मणों का वेश बनाकर भीख मांगकर खाने लगे । इसलिए वहाँ के लोग इन्हें न पहचान सके । राजा द्रुपद की बहुत दिनों से इच्छा थी कि मैं अपनी पुत्री अर्जुन को दूं । अर्जुन का उन्होंने बहुत पता लगाया , पर उनका कहीं पता न लगा । इसलिए उन्होंने एक बड़ा भारी धनुष बनवाया , जिसको सिवाय अर्जुन के और कोई भी नहीं उठा सकता था । इस स्वयंवर में देश - देश के राजकुमार आये । राजा द्रुपद ने उन सबका स्वागत किया और उन्हें अच्छे - अच्छे आसनों पर बैठाया । दुर्योधन और कर्ण भी आये । राजा द्रुपद ने उनका भी आदर - सत्कार किया । ब्राह्मण के वेश में अर्जुन भी अपने भाइयों के साथ स्वयंवर में शामिल हुए । नगर के बाहर एक बड़े मैदान में सभा मंडप बनवाया गया था । उसके चारों ओर दीवार बनवायी गयी थी , जिसमें जगह - जगह पर दरवाज़े थे । सारा मण्डप बन्दनवार , फूल - पत्तों से सजाया गया था । बड़े - बड़े फ़र्श , कालीन - गलीचे , तकिये - मसनद , सिंहासन , मृगछाला आदि जगह - जगह बिछाये गये थे । सारी रंगभूमि में गुलाबजल का छिड़काव किया गया था । आनेवालों की सेवा के लिए जगह - जगह पर टहलुए तैनात थे । सभा - मण्डप के ठीक बीचों - बीच एक बड़े खंभे पर नाचती हुई मछली का एक यंत्र बनवाया गया । खंभे के नीचे एक कड़ाहे में तेल भरकर रखा गया था । वहीं पर एक धनुष और पाँच बाण रखे थे । जब वह सभा - मण्डप दर्शकों से खचाखच भर गया तब राजकुमारी द्रौपदी हाथ में जयमाला लिये अपनी सहेलियों के साथ रंगशाला में आयी । उस समय बाज़ों को बन्द कराकर ऊँची आवाज़ में राजा द्रुपद के पुत्र राजकुमार धृष्टद्युम्न ने कहा ' हे राजकुमारो , यह धनुष , ये पाँच बाण और वह चक्र में घूमती हुई मछली है । जो राजकुमार इन पाँच बाणों से ऊपर नाचती हुई मछली को नीचे तेल में उसकी परछाई देखकर वेध देगा उसी वीर राजकुमार के साथ मेरी बहन द्रौपदी का विवाह होगा । ऐसा कहकर धृष्टद्युम्न ने द्रौपदी को बैठे हुए सभी राजकुमारों के कुल , गोत्र ओर नाम बताये । उस समय आये हुए सभी राजकुमार अपना बल और कौशल दिखाकर द्रौपदी को पाने की कोशिश करने लगे । श्रीकृष्ण और बलदेव भी उस सभा में आये थे । श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों के वेश में बैठे हुए अर्जुन और उनके भाइयों पहचान लिया । द्रौपदी के रूप - लावण्य को देखकर अर्जुन भी उसपर मुग्ध हो गये । दुर्योधन सबसे पहले उठा और मछली बेधने के लिए लेकिन उसका निशाना ख़ाली गया और लजाकर पर जा बैठा । फिर वारी - बारी से सभी को बेधने की कोशिश की । लेकिन कोई भी राजकुमार उस घूमती हुई मछली को न बेध सका बड़े - बड़े महारथी कर्ण , शल्य , जरासंध , शिशुपाल आदि अपना - अपना जोर आज़माकर हार गये । बाण मारा । अपनी जगह राजकुमार उठे और सवने मछली इस तरह सब राजाओं को निराश होते देख अर्जुन से न रहा गया । वे ब्राह्मण मण्डली से उठ खड़े हुए । उन्हें उठता हुआ देखकर ब्राह्मणों में शोर मचने लगा । वे लोग आपस में कानाफूसी करने लगे कि भाई , जिस निशाने को दुर्योधन , कर्ण , शल्य , शिशुपाल आदि वीर मार न सके , उसको यह ब्राह्मण कैसे मारेगा ? लेकिन कुछ ब्राह्मण यह कह रहे थे कि इसमें कुछ तो बल और साहस होगा , जिसके बूते पर यह उठा है । उन्होंने उस मछली की इधर ब्राह्मण - मण्डली में ये बातें हो रही थीं , उधर वीर अर्जुन अपने पूज्य बड़े भाई युधिष्ठिर आज्ञा लेकर उठे और खंभे पर नाचती हुई मछली के पास जा खड़े हुए । धनुष को बड़ी आसानी से उठाया और नीचे तेल में परछाई देखकर एक ही तीर से खंभे पर नाचती हुई मछली को बेध दिया । सब तरफ़ से ' वाह - वाह ' ' शाबाश , ' की आवाज़ आने लगी । अर्जुन के ऊपर फूल बरसने लगे । ब्राह्मण लोग अपने दुपट्टे और कमंडल हिला हिलाकर अपनी प्रसन्नता को प्रगट करने लगे और कहने लगे , ' देखो , जो काम बड़े - बड़े राजकुमार न कर सके उसे एक ब्राह्मण ने कर दिखाया । ' ये ब्राह्मण इसके बाद श्रीकृष्ण उठ खड़े हुए और बीच सभा में आकर कहने लगे , ' हे राजा द्रुपद , द्रौपदी का यह बड़ा सौभाग्य है कि उसे अर्जुन जैसा पति मिला है । के वेश में छिपे हुए महाराज पांडु के पुत्र अर्जुन हैं । का नाम सुनकर दुर्योधन , कर्ण आदि एक दूसरे का मुँह अर्जुन ताकने लगे ।
एक ही तौर से खंभे पर नाचती हुई मछली को बेध दिया। अर्जुन दूसरे जो राजकुमार धनुष को न चढ़ा सके थे, उनकी छाती पर मानों साँप ही लोटने लगा । लज्जा से उन राजकुमारों के मस्तक झुक गये । ब्राह्मण और पुरोहित आशीर्वाद देने लगे । द्रौपदी ने प्रसन्न मन से अर्जुन के गले में जयमाला डाल दी और बड़ी धूम-धाम के साथ उनका विवाह हो गया ।
राज्य प्राप्ति
पांडव बहुत दिनों तक द्रुपदराज के यहाँ रहे। धर्मराज युधिष्ठिर ने राजा द्रुपद से कहा, 'महाराज, हम लोग एक दिन आपके यहाँ बड़े आराम से रह रहे हैं और अब अपने राज्य को लौट जाना चाहते हैं । कृपा करके हमें जाने की आज्ञा दीजिये ।' युधिष्ठिर की ये बातें सुनकर महाराज को बहुत दुख हुआ, पर लाचार होकर उन्होंने बहुत सा धन-दौलत, हाथी, घोड़े, रथ आदि देकर अपनी प्यारी बेटी द्रौपदी को पांडवों के साथ विदा किया। पांडवों के हस्तिनापुर आने का समाचार सुनकर उनके स्वागत के लिए महाराजा धृतराष्ट्र ने विकर्ण, चित्रसेन और दूसरे कौरवों को भेजा । पांडवों को आया हुआ जानकर हस्तिनापुर के लोग फूले अंग न समाये । पांडवों को देखकर प्रजा का शोक और दुख दूर हो गया । कुछ समय के बाद एक दिन भीष्म और धृतराष्ट्र ने पांडवों को अपने पास बुलाकर युधिष्ठिर से कहा, 'हे बेटा, तुम्हारे भाइयों में और दुर्योधन आदि भाइयों में फिर किसी तरह का मनमुटाव न हो, इसलिए तुम खांडवप्रस्थ में अपनी राजधानी बनाकर रहो। आधा राज्य लेकर तुम वहाँ राज्य करो मुझे विश्वास है कि तुम्हें वहाँ पर किसी भी प्रकार की तकलीफ़ न होगी। धृतराष्ट्र की बात मानकर पांडव लोग खांडवप्रस्थ में अपनी राजधानी बनाकर सुख से रहने लगे। युधिष्ठिर ने बड़ी अच्छी तरह से प्रजा का पालन करना शुरू किया। थोड़े ही दिनों में पांडवों के राज्य की प्रशंसा चारों ओर फैल गयी । उनके राज्य में दूर-दूर से ब्राह्मण, क्षत्रिय और व्यापार-कुशल वैश्य आ आकर बसने लगे। पांडवों की इस प्रकार से बढ़ती हुई संपत्ति को देखकर दुर्योधन मन ही मन जलने लगा । सुख और शांतिपूर्वक राज्य करते हुए पांडवों को कई वर्ष बीत गये । एक दिन की बात है कि कुछ चोर एक ब्राह्मण के घर में घुसे और उसकी गायें चुराकर ले जाने लगे । जब ब्राह्मण ने चोरों को देखा तो उसे बड़ा क्रोध आया और राजदरबार में आकर पांडवों को भला-बुरा कहने लगा । उसने कया, 'आपके राज्य में रहनेवाले चोर मुझ गरीब ब्राह्मण की गायों को चुराकर लिये जाते हैं, और आप सुख की नींद सो रहे हैं। जो राजा प्रजा की आय का छठा भाग लेकर
उसकी रक्षा नहीं करता वह घोर पाप का भागी होता है। मालूम पड़ता है कि दुनिया से सब धर्म कर्म जाता रहा। ऐसा कहकर रोते हुए ब्राह्मण ने गायों की रक्षा की प्रार्थना की। उस गरीब ब्राह्मण का इस प्रकार वार-वार रोना सुनकर अर्जुन बाहर निकल आये और उस ब्राह्मण को धैर्य दिलाते हुए बोले, 'घबढ़ाओ मत, में तुम्हारी गायों को अभी छुड़ाकर लिये आता है, थोड़ा सत्र करो। किंतु जिस घर में पांडवों के अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, उसी घर में युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ अकेले बैठे बातचीत कर रहे थे । अर्जुन बड़े असमंजस में पड़ गये । वे सोचने लगे, अगर अस्त शस्त्र निकालने जाता हूँ तो भाई को कष्ट पहुँचाना होगा और यदि नहीं जाता हूँ तो चोर ब्राह्मण की गायें ले जाएंगे। अंत में उन्होंने सोचा कि इस वक़्त राजधर्म ही प्रधान है। इस ब्राह्मण की रक्षा करना ही मेरा धर्म है। भाई अगर नाराज भी होंगे तो उनको समझा लूंगा; उनसे माफ़ी माँग लूंगा। ऐसा सोचकर वे अस्त्रागार में चले गये और वहाँ से हथियार उठाकर लाये फिर चोरों से गायें छुड़ाकर उस ब्राह्मण को दे दीं।
अर्जुन की यात्रा
अर्जुन ब्राह्मण की गायें छुड़ाकर, सीधे अपने बड़े भाई युधिष्ठिर के पास पहुँचे और बड़े विनीत भाव से बोले, महाराज, मैंने जान-बूझकर, मगर विवश होकर अपनी प्रतिज्ञा का उल्लंघन किया है । इसलिए प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे बारह वर्ष तक वन में व्रत अनुष्ठान आदि करने की आज्ञा दीजिये । युधिष्ठिर अपने छोटे भाई की ऐसी बातें सुनकर घबरा गये और दुखी होकर बोले, 'अर्जुन, मेरी समझ में नहीं आता कि तुम वन जाने की बात क्यों कर रहे ? तुमने तो कोई नियम नहीं तोड़ा । आफ़त में फँसे हुए एक ब्राह्मण की रक्षा करने के लिए तुमने अस्त्रागार में प्रवेश किया था । मैं तुमसे इसके लिए तनिक भी नाराज नहीं हूँ । बड़ा भाई हूँ । मैं तो तुम्हारा क्या बड़े भाई के सामने छोटे भाई का आना बुरा है ? हाँ, बड़े भाई का जाना अवश्य कायदे के ख़िलाफ़ है । इसलिए तुम्हारे ऐसा करने से न तो तुम्हारी धर्म- हानि ही हुई है और न मेरी मर्यादा ही घटी है।' अर्जुन ने कहा, 'राजन्, मैंने आपके ही मुख से सुना है कि धर्म में छल नहीं करना चाहिए । आप भाई के मोह में पड़कर मुझसे ऐसा कह रहे हैं । लेकिन, मैं आपको धर्म से विचलित न होने दूंगा । ' अर्जुन की तर्कपूर्ण बात को सुनकर युधिष्ठिर चुप रहे । उन्होंने बड़े दुखी मन से अर्जुन को वन जाने की आज्ञा दी । अर्जुन की यात्रा युधिष्ठिर से आज्ञा पाकर ब्राह्मण का वेश धारण कर वन में रहने के लिए चल दिये । जंगल में अर्जुन अनेक ऋषि- मुनियों के दर्शन करते और अनेक रमणीय सरोवरों और तीर्थ- स्थानों को देखते हुए ब्राह्मण
सुभद्रा का विवाह
अर्जुन अनेक देश-देशांतरों में घूमते हुए एक सरोवर पर पहुँचे । वह स्थान बहुत ही रमणीय था । चारों तरफ़ सुंदर फुलवारी लगी हुई थी । फिर भी वहाँ कोई नज़र नहीं आया । जगह की शांति और शोभा तो मुनियों के वासस्थान की याद दिला रही थी। इससे उनके मन में कौतूहल पैदा हुआ कि इधर-उधर चलकर देखना व जानना चाहिए कि यह किसका स्थान है । ऐसा सोचकर अर्जुन कुछ दूर पर निवास करनेवाले ऋषि-मुनियों के पास पहुँचे । तपस्वियों ने कहा, 'हे अर्जुन, वहाँ सौभद्र नाम के पांच सरोवर हैं । उनमें बड़े-बड़े पाँच मगर रहते हैं, जिन्होंने कई तपस्वियों को खा लिया है। इसलिए वहाँ कोई नहीं रहता और न कोई नहाने ही जाता है । हम लोगों का तुमसे यही कहना है कि तुम भी उन सरोवरों में स्नान न करना।' लेकिन अर्जुन उन बातों को क्यों सुनने लगे ! वे एक कुंड में स्नान करने के लिए कूद पड़े । अर्जुन का कूदना था कि एक ज़बर्दस्त मगर ने उनके पैर को पकड़ लिया। अपने पैर को मगर के मुख में पकड़ा हुआ जानकर वीरवर अर्जुन उस महा भयंकर शक्तिशाली जंतु को खींचते हुए बाहर ले आये। लेकिन देखते क्या हैं कि ज़मीन पर आते ही वह मगर एक परम सुंदर रूपवती स्त्री के रूप में बदल गया ! तब अर्जुन उससे बड़े विस्मय के साथ पूछा, 'सुंदरी, तुम कौन हो ? किसलिए इस सरोवर में मगर के रूप में रहती हो ?' उस स्त्री ने कहा, 'मैं देववन में रहनेवाली अप्सरा हूँ । मेरा नाम वर्गा है । एक दिन में अपनी चार सखियों के साथ कहीं जा रही थी कि रास्ते में हमने एक तपस्या करते हुए ब्राह्मण को देखा । हम सबने मिलकर उनके मन को चंचल कर अपनी ओर आकर्षित करने का विचार किया। ऐसा सोचकर हम सब नाच-गाकर उन्हें रिझाने की कोशिश करने लगीं । लेकिन हे वीर, उस मुनि का मन हमें देखकर ज़रा भी नहीं डिगा । घोर तपस्या में डूबे हुए वे महात्मा हमारी इन हरकतों से क्रोधित हो उठे। उन्होंने हमें शाप दिया कि तुम ग्राह बनकर पानी में सौ बरस तक रहोगी और अर्जुन से तुम्हारा उद्धार होगा । हे पांडुनंदन, यह स्थान हमें स्वयं देवर्षि नारद बता गये थे। हम उन्हीं के आज्ञानुसार यहाँ आयी थीं । आप चलकर मेरी उन चार सखियों का भी उद्धार कीजिये । यह सुनकर अर्जुन उन चारों सरोवरों में गये और जिस यह सुनकर अर्जुन उन चारों सरोवरों में गये और जिस तरह पहली अप्सरा का उद्धार किया था, उसी तरह उन चारों अप्सराओं का भी उद्धार किया । इस प्रकार घुमते-फिरते अर्जुन उत्तर की और चले । वहाँ के पवित्र क्षेत्रों और तीर्थों में होते हुए अंत में प्रभास तीर्थ पहुँचे । भेंट हुई। प्रभास तीर्थ में अर्जुन की अपने परम मित्र श्रीकृष्ण से दोनों परस्पर गले मिले । श्रीकृष्ण के साथ रहते हुए एक दिन अर्जुन ने उनकी बहन सुभद्रा को देखा । सुभद्रा के सौंदर्य को देखकर वे उनपर मोहित हो गये । उन्होंने अपने मन की बात एक दिन अपने सखा श्रीकृष्ण से कही, 'वसुदेव की पुत्री और आपकी बहन सुभद्रा बहुत ही सुंदरी है। उसे देखकर किसका मन उसके साथ विवाह करना न चाहेगा ! अपने मित्र अर्जुन के मन की बात जानकर उन्होंने अपनी बहन सुभद्रा का विवाह उनके साथ करा दिया । इस प्रकार सुख-चैन से रहते हुए बारह वर्ष बीत गये । अब तो अर्जुन ने अपने राज्य को वापस जाने का प्रस्ताव श्रीकृष्ण के सामने रखा । आख़िरकार वसुदेव ने बहुत-से धन, हाथी, घोड़े, रथ आदि देकर बेटी सुभद्रा के साथ अर्जुन को बिदा किया । अर्जुन के साथ उनके प्रिय सखा श्रीकृष्ण भी उनकी राजधानी तक आये ।
गांडीव धनुष
अर्जुन और श्रीकृष्ण को एक साथ रहते हुए बहुत दिन बीत गये । एक दिन अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा, 'मित्रवर, आज हमारी इच्छा है कि हम लोग यमुना नदी के किनारे चलें । वहीं पर इष्ट मित्रों के साथ जल क्रीड़ा करें और वन-भोज भी हो । इस प्रकार सारा दिन नदी के किनारे वृक्षों की छाया में हँस- खेलकर बितायें और शाम होते-होते नगर को वापस लौट आवें ।' अर्जुन की बात सुनकर श्रीकृष्ण ने बड़ी खुशी से अपनी स्वीकृति दे दी । अर्जुन और श्रीकृष्ण दोनों आपस में सलाह करके धर्मराज युधिष्ठिर से आज्ञा लेकर, बंधु-बांधवों को ले यमुना नदी के किनारे पहुँचकर जल-क्रीड़ा और वन-क्रीड़ा का आनंद लेने लगे ! जब श्रीकृष्ण और अर्जुन एक पेड़ की छाया में बैठे मन बहला रहे थे तब अग्नि देवता ब्राह्मण का रूप धारण कर उनके पास आये और बोले, 'तुम दोनों महापुरुष हो । संसार के सब वीरों में वीर हो । में बहुत खानेवाला ब्राह्मण हूँ। इस समय तुमसे भोजन की भिक्षा माँगने आया हूँ ।' श्रीकृष्ण ने कहा, ' हे ब्राह्मण देवता, बताइये, आप किस प्रकार का भोजन चाहते हैं ?' अग्निदेव बोले, 'मैं साधारण अन्न खानेवाला ब्राह्मण नहीं । मैं अग्निदेव हूँ । जो आहार मेरे योग्य हो वही मुझे दीजिये । इस खांडववन में बड़े-बड़े भयानक जीवजंतु रहते हैं, जो लोगों को हमेशा सताया करते हैं । इंद्र का सखा तक्षक नाग भी अपने साथियों के साथ इसी वन में रहता है । पर देवराज इंद्र उसकी रक्षा करते हैं । मैं इन सब हिंसक जंतुओं का नाश कर देना चाहता हूँ । मैंने इसे कई बार जलाकर भस्म करने की कोशिश भी की। लेकिन इंद्र ने हर बार मेरे इस कार्य में बाधा डाली। इसलिए अब मैं तुम्हारे पास आया हूँ; तुम लोग मेरी सहायता करो तो मैं इस वन को जला डालूँ । मैं तुमसे यही अन्न चाहता हूँ । बरसते हुए पानी को, और जो जीवजंतु यहाँ से भाग जाना चाहें उनको तुम अपनी बहादुरी और हथियारों से रोके रखना । ' तब अर्जुन बोले, ' हे अग्निदेव, मेरे पास असंख्य दिव्य अस्त्र हैं । उनकी सहायता से मैं इंद्र के साथ भी युद्ध कर सकता हूँ । लेकिन इंद्र से लड़ने लायक़ कोई मज़बूत धनुष मेरे पास नहीं है । मेरे पास जो रथ है वह भी बाणों को रखने के लिए काफी
नहीं हैं। हमें एक सुंदर, मजबूत, सूर्य के तेज के समान देदीप्यमान रथ भी चाहिए। इसलिए कोई ऐसा उपाव कीजिये कि जिससे हम आपकी सहायता कर सकें। वीरता का जो कार्य है उसे हम खुशी के साथ करने के लिए तैयार हैं । ' अर्जुन की बात सुनकर अग्निदेव वरुण के पास गये। उनके पास से एक अद्भुत धनुष लाये जिसका नाम गांडीव था । इस धनुष का यह गुण था कि इसपर बाण चढ़ाकर चलाने से उन बाणों को सहने की शक्ति देवता, दानव, गंधर्व आदि किसीमें गांडीवधनुष थी। शत्रु सेना तो उसकी टंकार सुनते ही घबड़ा जाती थी। उस धनुष के साथ एक तरकस भी था। उसमें रखे हुए बाण कभी ख़ाली ही नहीं होते थे । उसे अक्षयतरकस कहते थे । ये दोनों गांडीवधनुष और अक्षयतरकस अग्निदेव ने लाकर अर्जुन को भेंट किये। हवा और मन के समान तेज चलनेवाले, सूर्य के समान चमकीले, गंधर्व देश के घोड़े जिसमें जुते हुए थे, ऐसा कपिध्वज नाम का एक सुंदर रथ भी दिया। 'अब तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर और रथ पर सवार हो अर्जुन ने अग्निदेव से कहा, हम के लिए तैयार हैं। आपकी सहायता अर्जुन और श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर अग्निदेव ने बढ़ा विकराल रूप धारण कर खांडववन में प्रवेश किया । जब अग्निदेव वन को जलाने लगे, तब वीरवर अर्जुन और श्रीकृष्ण वन के दोनों ओर बड़े होकर भागते हुए प्राणियों को रोकने लगे। अब तो बहुत-से भयानक जीवजंतु उस अग्नि में गिर-गिरकर भस्म होने लगे। अपने मित्र तक्षक को भी उसके साथ जलता जानकर उसको बचाने के लिए इंद्र ने बादलों को भेजा। लेकिन अग्नि इतनी प्रचंड थी कि बादलों का पानी आकाश में ही भाप बनकर उड़ गया । अब तो इंद्र ने अधिक क्रोधित होकर बड़े जोर से पानी बरसाना शुरू किया। ऐसी मूसलधार वृष्टि को देखकर अर्जुन ने सारे खांडव वन को बाणों से ढँक दिया और एक बूँद पानी भी आग में न गिरने दिया । इस तरह बहुत देर तक इंद्र और अर्जुन में युद्ध होता रहा पर अर्जुन और श्रीकृष्ण के सामने इंद्र न ठहर सके । इतने में इंद्र को एक आकाशवाणी सुनाई पड़ी—तुम क्यों कृष्णार्जुन से व्यर्थ युद्ध कर रहे हो ? तुम्हारा मित्र तक्षक इस वन में नहीं है वह कुरुक्षेत्र चला । गया है। आकाशवाणी सुनकर इंद्र ने युद्ध बंद कर दिया और अर्जुन का युद्ध कौशल देखकर प्रसन्न हो बोले कि मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो वर माँगो । अर्जुन ने कहा, 'देवराज, यदि वास्तव में आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे और भी अनेक दिव्य अस्त्र प्रदान कीजिये । ' इंद्र ने कहा, 'तुम जैसे अस्त्र चाहते हो वैसे मेरे पास नहीं हैं। तुम भगवान शंकर की तपस्या करो।' अपनी इच्छा पूर्ण हो जाने पर अग्निदेव कृष्णार्जुन पर बहुत प्रसन्न हुए और अनेकों वरदान देकर उनसे बिदा ली । अग्निदेव के चले जाने पर कृष्ण और अर्जुन भी अपनी राजधानी को वापस चले आये ।
शकुनी की धूर्तता
पांडवों की बढ़ती हुई लक्ष्मी और राज्य-सुख को देखकर नीच, कपटी दुर्योधन दिन-रात दुखी और उदास रहने लगा । उसने अपने मामा शकुनी पर अपने विचार प्रकट किये और पांडवों को वरवाद करने का उपाय पूछा। शकुनी बड़ा ही धूर्त था । वह जुआ खेलने में बहुत होशियार था । अपनी कपट भरे दाँव से हर किसीको हरा देने का उसको घमंड था । इसलिए उसने दुर्योधन से कहा कि पांडवों को पासा खेलने के लिए निमंत्रित किया जाए । हार तो वे जाएँगे ही। इसलिए उनके सामने ऐसी शर्तें रखी जाएं कि वे भिखारी बन देश छोड़ जाएं, और उन्हें फिर कभी लौटने का मौक़ा ही न मिले । दुर्योधन को यह सलाह पसंद आयी । उसने अपने पिता धृतराष्ट्र को उलटा-सीधा समझाकर उनसे जुआ खेलने की अनुमति ले ली। भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर आदि सब गुरुजनों ने बहुत कुछ मना किया; पर उसने किसीकी एक भी न मानी। दुर्योधन ने एक दूत खांडवप्रस्थ भेजकर पांडवों को द्रौपदी सहित हस्तिनापूर बुलवा भेजा । सच्चे और सीधे-सादे पांडव दुर्योधन की चालबाजी न समझ सके और आनंदपूर्वक हस्तिनापुर चले आये । कुछ दिनों तक पांडवों के सुख और आनन्दपूर्वक हस्तिनापुर में रहने के बाद एक दिन दुर्योधन ने उन्हें चौपड़ खेलने के लिए मजबूर किया । युधिष्ठिर को भी चौपड़ खेलने का शौक था; लेकिन उन्हें जुआ खेलने में झूठ बोलना और कपट करना नहीं आता था । कौरवों की ओर से पासा फेंकने के लिए शकुनी और पांडवों की ओर से युधिष्ठिर बैठे । कुछ देर तक बिना दाँव के जुआ होता रहा; लेकिन धीरे-धीरे कुछ पैसा भी दाँव पर रखा जाने तगा । शकुनी पासा फेंकने में बड़ा चालाक था । युधिष्ठिर को चकमा देकर झट अपनी जीत कर लेता था । युधिष्ठिर की हार पर हार होने लगी । थोड़ी देर में युधिष्ठिर धन, गाय, भूमि, राज्य आदि सब जुए में हार गये । जुअ खेलनवाला आदमी हारकर उठना पसंद नहीं करता । वह यही सोचता है कि अब की जरूर ही जीतेंगे- अब की ज़रूर ही मेरी जीत होगी। इतना होने पर भी युधिष्ठिर का चसका न छूटा और पाँचों भाइयों और स्त्री द्रौपदी को भी हार बैठे । इस तरह चौपड़ ने पांडवों को पूरी तरह से चौपट कर दिया ।
दुयोंधन पांडवों की इस प्रकार बुरी हार को देखकर मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ। लेकिन अब भी उसका मन नहीं भरा था। उसने दुधिष्ठिर से कहा, 'एक बार मैं तुमको इस शर्त अगर पर खेलने का मौका और देता हूँ कि अगर तुम्हारी जीत हो तो तुमको सारा राज्य और जो कुछ तुम हार गये हो वह सब वापस कर दिया जाए, और अगर हार हो तो बारह वर्ष तक वनवास और एक वर्ष तक अज्ञातवास करना पड़े । अज्ञातवास के समय में पता लग जाने पर फिर उसी तरह का बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़े। जुए में बार-बार शकुनी की धूर्तता हारने के कारण युधिष्ठिर की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी । इसीसे उन्होंने इस शर्त को भी मान लिया और पासा फेंका गया। इस बार युधिष्ठिर की जीत हुई। लेकिन शकुनि ने युधिष्ठिर की आँख बचाकर पासा पलट दिया और चिल्ला उठा' युधिष्ठिर, इस बार भी तुम्हारी हार हुई !" अब तो दुर्योधन के मन की हो गयी । द्रौपदी सहित पांडव अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार राज्य छोड़कर वन की ओर चल दिये ।
पांडव वनवास :-
युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी को साथ लेकर साधुओं के वेश में काम्यक वन आकर रहने लगे । जब पांडवों के वनवास की ख़बर द्वारका पहुँची तब श्रीकृष्ण को बड़ा दुख हुआ, और वे पांडवों से मिलने के लिए काम्यक वन आये । अपने प्रिय सखा अर्जुन तथा अन्य पांडवों को संन्यासियों के वेश में देखकर श्रीकृष्ण अपने क्रोध को नहीं रोक सके और बोले, 'मैं कौरवों के इस अन्याय को कभी भी सहन नहीं कर सकता । मैं अकेले ही उनका नाश करूंगा।' जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण को बहुत क्रोध करते देखा तो उन्हें अनेक प्रकार से समझा-बुझाकर शांत किया। श्रीकृष्ण अर्जुन के समझाने पर शांत होकर कहने लगे, 'अर्जुन, तुम मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ । जो कुछ मेरा है उसपर तुम्हारा पूरा अधिकार है । जो लोग तुमसे दुश्मनी या दोस्ती रखते हैं वे मेरे भी दुश्मन और दोस्त हैं । कौरवों के पापों का घड़ा भर गया है। अब तुम बहुत ही जल्दी उनको हराकर अपना राज्य वापस पाओगे।' इसके बाद अनेक प्रकार की सुख-दुख की बातें करके पांडवों को धीरज देते हुए श्रीकृष्ण द्वारकापुरी चले गये । श्रीकृष्ण के चले जाने के बाद एक दिन युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा, 'भैया अर्जुन, फिर से राज्य पाने के लिए युद्ध के अलावा और कोई उपाय दिखाई नहीं पड़ता । हमारा ख्याल है कि आगे होनेवाले महायुद्ध में कौरवों का सामना पांडव वनवास तुमको ही करना होगा। इसके लिए अभी से तुम्हें तैयार हो जाना चाहिए।' भाई की बात मानकर अस्त्र-शस्त्र विद्या प्राप्त करने के लिए अर्जुन देवताओं के रहने की जगह हिमालय पर्वत पर गये । गंधमादन पर्वत आदि दुर्गम स्थानों को पारकर अन्त में वे कैलास पर्वत पर पहुँचे । कैलास पर्वत पर अभी कुछ ही दूर चढ़े होंगे कि उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी - 'ठहरो ।' इधर-उधर घूमकर जो देखा तो मालूम हुआ कि एक पेड़ के नीचे लंबी-लंबी जटाओंवाला एक दुबला-पतला तपस्वी खड़ा है । तपस्वी ने पूछा, 'तुमने संन्यासी का वेष धारण किया है, फिर भी हथियार क्यों बाँधे हैं ? यह शांत चित्तवाले तपस्वियों का स्थान है । तुम इस वीर वेश में किधर जा रहे हो ? धनुष- बाण छोड़कर इस पुण्यमार्ग का अवलंबन करो । ' अर्जुन अपनी बात और व्रत के पक्के थे। वे उस तपस्वी की बात सुनकर जरा भी नहीं घबरा । अर्जुन दृढ़ता और उत्साह देखकर खुश होकर बोले वह तपस्वी प्रसन्न होकर बोला, 'अर्जुन, मैं देवराज इन्द्र हूँ । तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए यहाँ आया था । मैं तुम्हारे दृढ़ निश्चय को देखकर बड़ा खुश हूँ । तुम मुझसे वर माँगो । ' अर्जुन ने इंद्र को प्रणाम किया, और हाथ जोड़कर बड़े विनीत भाव से बोले, 'यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि आप मुझे सब तरह की देवविद्या सिखला दोजिए । ' अर्जुन के दृढ़ निश्चय की परीक्षा लेने के लिए इन्द्र ने कहा, 'पुत्र, तुम्हें अस्त्रों की क्या जरूरत ? मर्त्यलोक में रहनेवाले सब लोग इन्द्रलोक को पाने की इच्छा रखते हैं। समय उसका पाना तुम्हारे हाथ में है। इस अर्जुन ने कहा, मैंने लोभ और काम के वश में होकर इस कठिन मार्ग को पार नहीं किया है । मेरे भाई बड़े दुख से वनवास कर रहे हैं। उन्हींका उद्धार करने के लिए मुझे इन दिव्यास्त्रों की जरूरत है । अर्जुन की दृढ़ता और उत्साह को देखकर इंद्र प्रसन्न होकर बोले 'अगर तुम भगवान शंकर के दर्शन कर लो तो तुमको सब अस्त्र प्राप्त हो सकते हैं। इसलिए अब तुम उन्हीं महादेव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करो। उनके दर्शन होने से ही तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी । ' देवराज इंद्र के उपदेश को मानकर अर्जुन कैलास पर्वत की एक गुफा में बैठकर घोर तपस्या करने लगे। प्रकार डूब गये कि खाना-पीना सब कुछ भूल गये ।
किरात और अर्जुन का युद्ध:-
एक दिन जब कि अर्जुन तपस्या कर रहे थे, उन्होंने सामने से एक जंगली सुअर को अपनी ओर आते देखा । एक किरात उसका पीछा करता हुआ आ रहा था। अर्जुन ने सुअर को निशाना बनाकर एक तीर छोड़ दिया । ठीक उसी समय किरात ने भी उसपर बाण चलाया। सुअर एक बड़ा भारी चीत्कार करके उसी जगह गिरकर मर गया। उधर से क्रोधित होकर किरात अर्जुन से बोला, ' इस सुअर को पहले मैंने ही अपना निशाना बनाया था, फिर क्यों तुमने इसपर बाण चलाया ? क्यों, तुम्हें अपने प्राणों की ज़रा भी चिता नहीं है ? तुमने शिकार के नियम के खिलाफ काम किया है । इसलिए मैं तुम्हें अवश्य ही मारूंगा ।' किरात की बात सुनकर अर्जुन ने हँसते हुए कहा, तुम बड़े घमंडी मालूम पड़ते हो । इस जानवर को तो पहले मैंने ही अपने बाण का निशाना बनाया था। तुम्हारा तीर तो पीछे से आ करके लगा है । किरात अर्जुन की ऐसी बातें सुनकर क्रोधित हो बोला, “ यह तुम कैसे कहते हो कि तुम्हारा तीर पहले लगा । मैं कहता हूँ कि मेरा तीर पहले लगा । तुम झूठ बोलते हो । झूठ बोलने का नाम सुनकर अर्जुन को गुस्सा आया और बोले, ' तू मुझे झूठा बतला रहा है ? देखता नहीं है, यह मेरा तीर पहले लगा था ? अगर अब ज़रा भी बोला तो तेरी ख़ैर नहीं । ' इधर किरात भी गुस्से में आ गया और बोला, ' ख़बरदार, क्या तूने मुझे कोई मामूली आदमी समझ रखा है ? जानता नहीं है । इस जंगल का मैं राजा हूँ । अच्छा, ठहर, मैं अभी तुझे इसका मजा चखाता हूँ अर्जुन इसको न सह सके और धनुष पर तीर चढ़ाकर छोड़ने लगे । लेकिन वह किरात अर्जुन के बाणों को खुशी के साथ खड़ा हुआ सहता रहा । यह देखकर अर्जुन और भी क्रोधित हो उसपर बाण बरसाने लगे । इधर अग्निदेव का दिया हुआ अर्जुन का तरकस ख़ाली होता जा रहा था और वह किरात खड़ा हुआ हँस "हस रहा था। तब तो अर्जुन ताज्जुब हुआ । लेकिन अर्जुन ने हिम्मत नहीं हारी । फिर बाण चलाने शुरू किये। थोड़ी ही देर में उनके सब बाण ख़तम हो गये । अब तो वे धनुष की नोक से ही युद्ध करने लगे । परंतु उस किरात ने उनके गांडीव को भी पकड़ लिया । अब अर्जुन तलवार चलायी, लेकिन वह भी उसके सिर से लगकर टुकड़े- टुकड़े हो गयी। अर्जुन मल्लयुद्ध करने लगे । मल्लयुद्ध करते हुए किरात ने अर्जुन को एक ऐसा धक्का मारा कि वे दूर बेहोश होकर गिर पड़े। जब अर्जुन को होश आया तो वे शंकर का ध्यान करने लगे । इतने ही में वे देखते क्या हैं कि उनके सामने जटाजूटधारी स्वयं त्रिशूलपाणी शंकर खड़े हैं । अर्जुन एकदम आनंदित हो शिवजी के चरणों में गिर पड़े।
अर्जुन तपस्या के कारण अर्जुन बहुत दुबले और कमज़ोर हो गये थे। फिर भी उनके युद्ध और उत्साह को देखकर महादेवजी बहुत प्रसन्न हुए । वे हँसकर बोले, 'अर्जुन, हम तुम्हारे साहस और दृढ़ संकल्प को देखकर बहुत खुश हुए। तुम्हारी जो इच्छा हो माँगो ।। अर्जुन बोले, 'भगवान' अगर आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे आप भविष्य में होनेवाले कौरवों के युद्ध में भीष्म, द्रोण आदि वीरों के साथ युद्ध करने योग्य अस्त दीजिये । महादेवजी ने प्रसन्न होकर अर्जुन को बहुत से दिव्यास्त दिये । अपना एक विशेष अस्त्र भी दिया, जिसे पाशुपत अस्त कहते हैं, और उसके चलाने का और वापस ले लेने का मंत्र भी सिखा दिया। अर्जुन भी शिवजी से दिव्यास्त्र पाकर बड़े प्रसन्न हुए । इसी समय इंद्रदेव अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार देवताओं के साथ वहाँ आये । इंद्र ने भी उन्हें अनेक प्रकार के दिव्यास्त्र दिये और कहा, 'अर्जुन, तुम क्षत्रियों में श्रेष्ठ हो । इन हथियारों की सहायता से युद्ध में हमेशा तुम्हारी जीत होगी। ' अर्जुन ने बड़ी नम्रता के साथ उनके सब दिव्यास्त्रों को पाकर अपने को कृतार्थ माना । इंद्र ने फिर कहा, 'अर्जुन, तुम्हारा काम तो हो गया । अब देवताओं का काम करने के लिए तुम्हें एक बार इंद्रलोक चलना होगा । इसलिए तैयार हो जाओ । हमारा सारथी किरात और अर्जुन का युद्ध मातलि जल्द ही तुम्हारे लिए रथ लाएगा । इधर हम तुम्हारे भाइयों के पास महर्षि लोमश को भेजते हैं । वे जाकर तुम्हारी सिद्धि और सफलता का समाचार युधिष्ठिर को देंगे, और तुम्हारे देर से पहुँचने का कारण बतलाकर उनकी चिंता दूर करेंगे।'
अर्जुन इंद्रलोक में :-
अर्जुन इंद्रलोक में जाने के लिए तैयार हो गये । इतने ही में बादलों की तरह गरजता हुआ एक सुंदर रथ लेकर मातलि वहाँ पर आ पहुँचा और अर्जुन उस रथ पर सवार होकर इंद्रलोक चल दिये । थोड़ी ही देर में अर्जुन इंद्र की राजधानी अमरावती में जा पहुँचे। इंद्रपुरी की शोभा देखकर अर्जुन बहुत खुश हुए और मन में कहने लगे, 'वाह ! यह तो पुण्यात्मा महापुरुषों को ही प्राप्त होता है, कैसा सुंदर स्थान है ! मेरा सौभाग्य है कि मैं यहाँ आ सका हूँ ।' इंद्रलोक में पहुँचते ही वहाँ के रहनेवाले देवताओं ने अर्जुन का बड़ा स्वागत किया, और आदर के साथ इंद्र- भवन में ले गये । गंधर्व और अप्सराएँ नाचने-गाने लगीं, बाजे बजने लगे। चारों ओर आनंद छा गया । अर्जुन इंद्रपुरी में बड़े सुख से अपने दिन बिताने लगे । एक दिन की बात है कि किसी बात पर वहाँ की ऊर्वशी नाम की एक अप्सरा अर्जुन पर अप्रसन्न हो गयी । उसने गुस्से में आकर अर्जुन को शाप दिया - तुमने जिस प्रकार से हम स्त्रियों का निरदार किया है उसी तरह तुमको भी अपनी इज्जत खोकर औरतों के बीच में रहना होगा, और जनानों की तरह नाचना पड़ेगा ; तुम नपुंसक कहलाओगे । ऊर्वशी के शाप से अर्जुन बहुत घबराये । वे चित्रसेन को अर्जुन इंद्रलोक में साथ लेकर इंद्र के पास पहुँचे और उससे सारा हाल कहा । अर्जुन की घबड़ाहट को देखकर इंद्र ने कहा, 'अर्जुन, घबड़ाओं मत । तुम्हारी माता कुंती धन्य है, जिसने तुम जैसे वीर पुत्र को जन्म दिया है। बेटा, तुमने अपने धैर्य से बड़े-बड़े ऋषियों और मुनियों को भी परास्त कर दिया है । ऊर्वशी ने तुमको जो शाप दिया है उसकी कोई चिन्ता न करो, इससे भी तुम्हारा भला हो होगा। जब तुम्हारा बारह वर्ष का वनवास ख़त्म हो जाएगा और जब एक साल अज्ञातवास करना होगा उस समय यह शाप तुम्हें बड़ा काम देगा । '