. देश हित को अपना हित समझिए

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देश हित को अपना हित समझिए

 जिस प्रकार एक उद्यान को सुरभित एवं आकर्षक बनाने के लिए अगणित बीजों को अपने अस्तित्व को मिटाना पड़ता है , उसी प्रकार किसी समाज अथवा देश को उन्नत एवं विकसित करने के लिए उसके सदस्यों एवं निवासियों को अनेक बलिदान करने पड़ते हैं अपने व्यक्तिगत हितों को देश हित की वेदी पर बलिदान करना होता है . हिमालय की चट्टानें और उपेक्षित  भूखण्डों में पाए जाने वाले अवशेष इस तथ्य के साक्षी हैं कि प्रस्तुत विकास की स्थिति को प्राप्त करने के लिए प्रकृति को कितने सफल और असफल प्रयोग करने पड़े हैं सामान्य उदाहरण है एवरेस्ट विजय का हिलेरी और तेनसिंह के पहले कितने उत्साही अज्ञात नामों के पर्वतारोहियों ने उस ओर ले जाने वाले मार्ग को प्रशस्त करते हुए अपने को मिटाया है हमें स्वतन्त्रता का अमृत फल प्रदान करने के लिए आजादी के अगणित दीवाने लगभग 100 वर्षों तक अपने तन , मन , धन को भारतमाता के चरणों पर न्योछावर करते रहे ।

         विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले भारतीय खिलाड़ियों के मस्तिष्क में यदि उक्त तथ्य होता , तो हमें प्रत्येक स्तर पर न लज्जित होना पड़ता और न यह करने के लिए विवश होना पड़ता कि हमारे खिलाड़ी व्यक्तिगत स्वार्थों को धन एवं यश सम्बन्धी लाभों को ध्यान में रखकर खेलते हैं , देश के हित के लिए नहीं उसके सम्मान की रक्षा एवं उसके यश में वृद्धि के लिए नहीं खेलते हैं . अभी कल की बात है जब एम्सटलवीन में भारत को आठ देशों के रैबो बैंक हॉकी टूर्नामेण्ट में सातवें आठवें स्थान के लिए संघर्ष करना पड़ा और कोच राजिंदर सिंह जूनियर को यह कहना पड़ा कि तथाकथित स्टार खिलाड़ी खेल के मूल भूत सिद्धान्तों का भी पालन नहीं करते हैं इसी बात को सामान्यजन इस प्रकार कहते हैं कि हमारे खिलाड़ी देश लिए नहीं , बल्कि अपने लिए खेलते हैं . कोई भी देख सकता है कि हमारे खिलाड़ियों का ध्यान व्यक्तिगत प्रदर्शन पर केन्द्रित रहता है यानी वे अकेले ही गेंद लेकर बढ़ने की कोशिश करते हैं और केवल अपने बलबूते पर गोल करने का प्रयत्न करते हैं . वे यह याद करने का , अथवा जानने का प्रयत्न नहीं करते हैं कि जब भारत हॉकी के खेल में विश्व का सिरमौर था , तब हमारे खिलाड़ी किस प्रकार का खेल खेलते थे और गोलों   का ढेर लगा दिया करते थे . उत्तर है वे देश के लिए टीम भावना से भरकर खेलते थे , गेंद को अनावश्यक रूप से पलभर भी अपने पास नहीं रखते थे , वे इस बात की प्रतीक्षा नहीं करते थे कि उनसे गेंद छीनने के लिए विपक्षी खिलाड़ी उन पर आक्रमण करे , वे अवसर की आवश्यकतानुसार जिसे मौके की नज़ाकत कहा जाता को तुरन्त सर्वाधिक सुरक्षित साथी भेज दिया करते थे और यही कारण था कि भारतीय खिलाड़ी छोटे - छोटे पासों वाली हॉकी के लिए प्रसिद्ध थे और अच्छे से अच्छे विपक्षी खिलाड़ी को चकरघिन्नी बना है , गेंद के पास दिया करते थे .                      हॉकी की कला के जादूगर दादा ध्यानचन्द गेंद को हॉकी से चिपकाकर तेज भागने के लिए प्रसिद्ध थे , परन्तु वह भी अकेले चने की भाँति भाड़ फोड़ने का प्रयत्न नहीं करते थे , वे गेंद को अविलम्ब रूप सिंह , बाबू आदि किसी खिलाड़ी साथी के पास पहुँचा देते थे और इस प्रकार उनके लिए गोल करने के मौके तैयार कर देते थे . इस प्रक्रिया में भारत के नाम गोल भी बनते रहते थे और खिलाड़ियों के नाम भी गोल लिखे जाते रहते थे उन दिनों रिकॉर्डों का ढिंढोरा पीटने का इतना रिवाज़ भी नहीं था . एक बात और है . बर्लिन ( जर्मनी की (राजधानी ) में ध्यानचन्द का जादुई खेल देखकर तानाशाह हिटलर ने ध्यानचन्द के सम्मुख सेना में एक अत्यन्त उच्च पद पर नियुक्ति का प्रस्ताव रखा था , परन्तु ध्यानचन्द ने देश की सेवा के नाम पर सम्मुख प्रस्तुत प्रस्ताव को विनम्रतापूर्वक एवं सादर अस्वीकार कर दिया था . क्या हमारे देश में आज ऐसा कोई भी खिलाड़ी उपलब्ध हो सकेगा , जो इस प्रकार के प्रस्ताव को अस्वीकार करने की बात सोच सके ? इसके विपरीत हमारे अनेक श्रेष्ठ खिलाड़ी केवल हॉकी के ही नहीं प्रायः सभी खेलों के इस जुगाड़ में रहते हैं कि विदेशों में खेलने अथवा कोच बनने का अवसर कब मिले , क्योंकि वहाँ आर्थिक एवं जीवन की अन्य सुविधाएं प्राप्त होती हैं . आज स्थिति यह है कि प्रत्येक खेल के सन्दर्भ में भारत को पराजयों का सामना करना पड़ रहा है . यह देखकर विशेष क्षोभ होता है कि हमारे खिलाड़ी प्रायः अहं की सन्तुष्टि के लिए खेलते हुए देखे जाते हैं , कभी व्यक्तिगत रिकॉर्ड के लिए और कभी अनचाहे कप्तान की छवि धूमिल करने के लिए कहने की आवश्यकता नहीं है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी खेल में टीम की जय - पराजय देश की प्रतिष्ठा के साथ जुड़ गई है हम सब जानते हैं कि क्रिकेट के क्षेत्र में भारत की स्थिति बहुत बुरी है वर्षों पहले की बात है कि हमारे देश के विशेषकर एकदिवसीय क्रिकेट में कुछ ही क्रिकेटर सुनील गावस्कर , कपिल देव , अजीत वाडेकर , वेंगसरकर आदि देश के नाम की खातिर खेलते थे — वे टीम की आवश्यकता और मौके की नज़ाकत को ध्यान में रखकर खेला करते थे , फलतः भारतीय क्रिकेट की स्थिति सर्वोच्च शिखर पर थी- देश को विजयश्री प्राप्त होती थी और खिलाड़ियों के व्यक्तिगत स्कोर , रिकॉर्ड आदि भी बनते रहते थे आज स्थिति ठीक उलटी है . व्यक्तिगत हमारे खिलाड़ी खेल की गति धीमी कर देते शतक और अर्द्ध - शतक बनाने के फेर में हैं फलतः निर्धारित ओवरों की संख्या पूरी हो जाती है और अनेक खिलाड़ियों को मौका ही नहीं मिल पाता है : धन के लालच में वे देश की उपेक्षा करके विदेशों में जाकर खेलें , यहाँ तक तो सह्य है , परन्तु वे धन के लालच में मैच फिक्सिग करें यानी जानबूझकर टीम को हराने में योगदान करें , यह बात किसी भी रूप में सह्य नहीं हो सकती है , इस सन्दर्भ में कुछ अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है , पिछले कुछ दिनों में एक नई बीमारी सामने आई है . हमारे अनेक खिलाड़ी प्रतिबन्धित दवाओं के सेवन के दोषी पाए गए हैं और दण्डित किए गए हैं . इसे हम शर्मनाक और देश के प्रति विश्वासघात ही कह सकते हैं . खेल के लिए विदेश जाते समय भी उनका ध्यान टीम के प्रदर्शन पर बल्कि परिवार के साथ सैर - सपाटे पर केन्द्रित रहता है . विडम्बना यह है कि लगातार असंतोष जनक प्रदर्शन होने पर भी पीछे हटकर नए युवा खिलाड़ियों को अवसर देने की बात भी नहीं सोचते हैं . बात वही है - व्यक्तिगत हित एवं स्वार्थ को वरीयता प्रदान करने की मनो वृत्ति इसके विपरीत गावस्कर ने उस समय अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया , जब वह ख्याति के सर्वोच्च शिखर पर थे . कारण पूछने पर उनका उत्तर था - अभी तो आप पूछ रहे हैं क्यों जा रहे हो ? कुछ समय बाद आप पूछेंगे - कब जा रहे हो ? मैं उस अवसर की प्रतीक्षा नहीं करना चाहता हूँ . खेल जगत से सम्बन्धित प्रत्येक स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति को स्मरण रखना चाहिए कि-

 "मिटादे अपनी हस्ती गर तू मरतबा चाहे ।

 कि दाना खाक में मिलकर ,गुले गुलजार बनता है।"